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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 534 में से

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२०४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास राजा बुधसिंह की बादशाह के पास अर्जियां पहुंचीं कि देवलिया-प्रतापगढ़ का पृथ्वीसिंह शाही सेवकों के साथ ठीक आचरण नहीं कर रहा है और देवलिया के अहल्कारों को रखने में शाही अफ़सरों का बाधक हो रहा है। इसके उत्तर में शाही दरबार से उक्त दोनों राजाओं के पास पृथ्वीसिंह की बेजा कार्रवाई रोकने के लिए फ़रमान भेजा गया¹। ता० १२ ज़िल्हिज सन् जुलूस ४ हि० स० ११२८ (वि० सं० १७७३ मार्गशीर्ष सुदि १३ = ई० स० १७१६ ता० १६ नवंबर) को बादशाह के पास [हाशिया: शिकायतों की जांच के लिए कुतुबुलमुल्क का भेजा जाना] अर्ज़ी पहुंची कि देवलिया के ज़मींदार पृथ्वीसिंह के पास शाही सनद नहीं पहुंची है और वह अपनी जागीर के इलाक़े पर अधिकृत है। पहले वह सर- कार में ८००० रुपये देता था और नाज़िम के पास ज़ाबते के लिए पैदल और सवारों को रखता था। अब वह अपना कार्य नहीं कर रहा है एवं उसने बादशाही ज़मीन पर अधिकार कर लिया है। इसपर बादशाह ने कुतुबुलमुल्क को इस विषय में जांच करने की आज्ञा दी²। बादशाह फ़र्रुख़सियर के समय उदयपुर के महाराणा संग्रामसिंह (दूसरा) ने चन्द्रावतों का रामपूरे का इलाक़ा अपने नाम पर लिखवा


(१) बादशाह फ़र्रुख़सियर के समय के अख़बारात-इ-दरबार-इ-मुअल्ला से। उपर्युक्त संवाद से स्पष्ट है कि बादशाह फ़र्रुख़सियर की महारावत पृथ्वीसिंह पर अप्रसन्नता हो गई थी, जिससे बादशाह ने वहां पर ज़ब्ती भेज दी, परंतु महारावत ने शाही अहल्कारों का अधिकार नहीं होने दिया। (२) वही। बादशाह फ़र्रुख़सियर के राज्यारंभ में बूंदी का महाराव राजा बुधसिंह शाही दरबार में नहीं गया था। इसपर बादशाह ने नाराज़ होकर बूंदी का राज्य कोटा के महाराव भीमसिंह को प्रदान कर दिया। इसलिए महाराव राजा बुधसिंह जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह के साथ मालवे में रहकर बादशाह को प्रसन्न कर पुनः राज्य-पाने का प्रयत्न करता था। "वंशभास्कर" में वि० सं० १७७२ (ई० स० १७१५) के मार्गशीर्ष मास में बुधसिंह को पीछा बूंदी का राज्य मिलने का उल्लेख है (जि० ३, पृ० ३०५३) है। इस संवाद से पाया जाता है कि वि० सं० १७७३ (ई० स० १७१५) के पीछे भी महाराव राजा बुधसिंह, महाराजा सवाई जयसिंह के साथ मालवे की ओर रहा होगा।

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