राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Page Header] महारावत पृथ्वीसिंह २०३
[Margin Note 1: L2-L6] महारावत का अपने कुंवर पहाड़सिंह को उदयपुर भेजना.
[Main Text] उस समय राजपूताना के नरेशों में महाराणा संग्रा- मसिंह (दूसरा) बड़ा ही मिलनसार था । वह बादशाह से भी अच्छा संबंध रखकर फ़ायदा उठाना चाहता था और उधर मरहटों से भी उसका मेल था । राजपूताना के प्रमुख राज्य जयपुर, जोधपुर, बीकानेर आदि के नरेशों से उसका व्यवहार अच्छा था । वि० सं० १७७३ (ई० स० १७१६) के लगभग महारावत पृथ्वीसिंह के ज्येष्ठ कुंवर पहाड़सिंह ने भी उदयपुर जाकर पहले के सब द्वेष को मिटा दिया । महाराणा ने उसको धरियावद का परगना देने की आज्ञा दी, किन्तु उक्त कुंवर का उदयपुर में रहते समय ही परलोकवास हो गया १ ।
इस संबंध में महाराजा सवाई जयसिंह के पास वहां के ख़बरनवीसों ने ता० ६ शव्वाल सन् जुलूस ४ हि० स० ११२८ (वि० सं० १७७३ आश्विन सुदि ७ = ई० स० १७१६ ता० १२ सितंबर) को यह समाचार भेजा कि मंदसोर सरकार की घटना से यह पता लगा है कि अपने पुत्र के राणा संग्रामसिंह (दूसरा) के पास चले जाने के कारण रुपयों की कमी हो जाने का बहाना कर देवलिया के रावत पृथ्वीसिंह ने अपनी जागीर के महाजनों से रुपयों की मांग की है। इस वजह से वहां के बहुत से ग़रीब और असमर्थ लोग भाग गये और भाग रहे हैं एवं उसके आगमन से बोहरे आदि व्यापारी भी भाग गये हैं । इसपर बादशाह ने शमसुद्दौला ख़ानदौराँ को (महाराजा जयसिंह से) दर्याफ़्त करने का हुक्म दिया २ ।
महारावत पृथ्वीसिंह की उपर्युक्त कार्यवाही से अनुमान होता है कि बादशाह फ़र्रुख़सियर की पीछे से उसपर अप्रसन्नता हो गई। ता० ४ ज़िल्हिज
[Margin Note 2: L24-L28] आंबेर और बूंदी के नरेशों का बादशाह से महारावत की शिकायत करना
सन् जुलूस ४ हि० स० ११२८ (वि० सं० १७७३ मार्ग- शीर्ष सुदि ५ = ई० १७१६ ता० ८ नवंबर) को आंबेर (जयपुर) के राजा सवाई जयसिंह और बूंदी के महाराव
[Footnotes] (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६३ । (२) बादशाह फ़र्रुख़सियर के समय के अख़बारात-इ-दरबार-इ-मुअल्ला से ।