राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत पृथ्वीसिंह २०१
निवेदन करने पर यह आज्ञा तुम्हारी प्रतिष्ठा-वृद्धि के लिए भेजी जाती है । सदैव स्वामिभक्ति के मार्ग में सुदृढ़ और दत्तचित्त रहकर हमारी कृपाओं को अपने लिए लाभदायक समझो¹ ।'' उन्हीं दिनों जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह के पास से ता० २७ ज़िल्काद सन् जुलूस २ हि० स० ११२६ ( वि० सं० १७७१ मार्गशीर्ष वदि [हाशिया: महारावत का शाही इलाके में लूट-मार करना] १४ = ई० स० १७१४ ता० २४ नवंबर ) को समाचार पहुंचा कि भगवतीदास हरकारे ने खबर भेजी है कि दुश्मन नर्मदा के निकट पहुंच गये हैं² । इस पर वह वहां का स्वामी हुआ था । उसका शाही दरबार में अच्छा प्रभाव था, क्योंकि उसने जजाओ के युद्ध में बादशाह बहादुरशाह की तरफ़ रहकर अच्छी वीरता दिखलाई थी, जिससे पीछे से उसे बहादुरशाह ने "राजा बहादुर" की उपाधि दी थी ( वृंद कवि; सत्यरूपक; पृ० २६ ) । वह देवलिया-प्रतापगढ़ के स्वामी का दौहित्र होने से फ़र्रुख़सि- यर के समय देवलिया-प्रतापगढ़ के राजाओं का मददगार था । इस कारण से महारावत पृथ्वीसिंह ने उस (राजसिंह) के द्वारा ही शाही दरबार में अर्ज़ी भेजी होगी । "वंशभास्कर" ( जि० ४, पृ० ३०६४ ) से प्रकट है कि फ़र्रुख़सियर को मारने के षड्यन्त्र में कोटा का महाराव भीमसिंह तथा किशनगढ़ का स्वामी राजसिंह, कृतघ्न होकर महाराजा अजीतसिंह और सैयद बंधुओं से मिल गये थे ।
( १ ) बादशाह फ़र्रुख़सियर के महारावत पृथ्वीसिंह के नाम के फ़ारसी फ़रमान का अनुवाद । ( २ ) फ़र्रुख़सियर के समय के अख़बारात-इ-दरबार-इ-मुअल्ला से । उपर्युक्त संवाद से प्रकट है कि बादशाह फ़र्रुख़सियर के समय दक्षिण की तरफ़ से बढ़कर मरहटे मालवे में प्रवेश करना चाहते थे । वि० सं० १७६९ के माघ (ई० स० १७१३ फ़रवरी) मास में फ़र्रुख़सियर ने सिंहासनाारूढ़ होते ही आंबेर के महाराजा सवाई जयसिंह को मालवे का सूबेदार नियतकर आज्ञापत्र भेजा कि वह आंबेर से सीधा उज्जैन जाकर उधर का प्रबंध करे ( डॉ० रघुवीरसिंह; मालवा इन ट्रान्ज़िशन; पृ० ६६ एवं मालवा में युगांतर; पृ० १०६ )। "वंशभास्कर" ( जि० ४, पृ० ३०४२-३ ) से पाया जाता है कि रूपनगर ( किशनगढ़ राज्य ) के स्वामी महाराजा राजसिंह की सलाह से बादशाह ने महाराजा सवाई जयसिंह को उज्जैन का सूबेदार बनाया था और वह वि० सं० १७७० ( ई० स० १७१४ ) में बूंदी होता हुआ उज्जैन की तरफ़ गया था । २६