राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 268, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहारावत उम्मेदसिंह २१५.
[हाशिया: महारावत के समय के ताम्रपत्र] के दो ताम्रपत्र मिले हैं, जिनसे पाया जाता है कि उपर्युक्त संवत् के आषाढ मास के पीछे उसका देहांत हुआ हो, जैसा कि ख्यातों में उल्लेख है¹। "वीरविनोद" में वि० सं० १७७४ (ई० स० १७१७) में उसकी गद्दीनशीनी और इसके छः महीने बाद मृत्यु होने का उल्लेख है², जो ठीक नहीं है; क्योंकि वि० सं० १७७५ मार्गशीर्ष वदि १२ (ई० स० १७१८ ता० ८ नवंबर) का तो महारावत पृथ्वीसिंह का ताम्रपत्र मिल चुका है, जिसका उल्लेख ऊपर आ गया है³। उम्मेदसिंह ऊपर लिखा जा चुका है कि महारावत संग्रामसिंह के कोई संतान नहीं थी। इसपर सरदारों आदि ने उस (संग्रामसिंह) के पितृव्य उम्मेद- [हाशिया: राज्यप्राप्ति और देहांत] सिंह को, जो महारावत पृथ्वीसिंह का छोटा पुत्र था, वि० सं० १७७६⁴ (ई० स० १७१६) में
परन्तु इन दोनों ताम्रपत्रों में उल्लिखित व्यक्ति विद्याशिरोमणि राय, शाह जीवराज और मेहता द्वारिकादास, महारावत संग्रामसिंह के समकालीन थे। ऐसी स्थिति में बिना किसी पुष्ट प्रमाण के इन दोनों ताम्रपत्रों की वास्तविकता में संदेह करना निर्मूल है। प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात और वहां से आई हुई प्राचीन ख्यात में महा- रावत संग्रामसिंह की रानियों के नाम नहीं हैं और उपर्युक्त प्राचीन ख्यात (पृ० १०) में उसकी बालक अवस्था में अविवाहित मृत्यु होना बतलाया है। (१) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ७ । प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० १०। (२) द्वितीय भाग, पृ० १०६३। (३) देखो ऊपर पृ० २११, टि० १ । (४) "वीरविनोद" (द्वितीय भाग, पृ० १०६३) में महारावत उम्मेदसिंह की गद्दीनशीनी का संवत् १७७४ (ई० स० १७१७) दिया है, जो ठीक नहीं है। वि० सं० १७७६ (ई० स० १७१६) के महारावत संग्रामसिंह के दानपत्र मिल चुके हैं, अतएव वि० सं० १७७४ (ई० स० १७१७) में उम्मेदसिंह का गद्दी पर बैठना संभव नहीं है।