राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 234, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहारावत प्रतापसिंह १८५ पिपलोदे पर चढ़ाई की और वहां के दुर्ग को घेर लिया। डोडियों ने भी वीरतापूर्वक महारावत की सेना का मुक़ाबला किया। अन्त में महारावत के भाई मोहकमसिंह ने क़िले में प्रवेश कर वहां अधिकार कर लिया। फिर डोडियों ने अपने अपराध के लिए क्षमा याचना कर लूट-मार न करने की प्रतिज्ञा की। तब महारावत ने उनको माफ़कर पीछा उनका इलाक़ा उन्हें सौंप दिया¹। बादशाह औरंगज़ेब के समय शाहज़ादे मुअज्ज़म का दूसरा पुत्र अज़ीमुश्शान बंगाल की तरफ़ नियत था। उसने बादशाह की तरफ़ से अपने पास रहनेवाले एक नाज़िर को, जो महारावत का शेरबुलंदखां को अपने यहां आश्रय देना बादशाह का कृपापात्र और ख़बरनवीसी का कार्य करता था, अपने सेवक शेरबुलंदखां-द्वारा मरवा डाला। इसपर बादशाह ने शेरबुलंदखां को बंदी करने का हुक्म भेजा, जिससे अज़ीमुश्शान को बड़ी चिंता हुई। फिर उसने महारावत प्रतापसिंह के नाम पत्र भेजा कि शेरबुलंदखां को वहां आश्रय दिया जावे। अज़ीमुश्शान के इस पत्र के पहुंचने पर महारावत के सरदारों में दो दल हो गये। एक शेरबुलंदखां को आश्रय देने के पक्ष में और दूसरा इसके विपक्ष में था। अंत में महारावत के भाई मोहकमसिंह-द्वारा दृढ़ सम्मति मिलने पर महारावत ने मोहकमसिंह को ही शेरबुलंदखां के स्वागत को भेजकर उसे अपने यहां बुला लिया²। वि० सं० १७६२ (ई० स० १७०६) में बांसवाड़ा के स्वामी महा- रावल अजवसिंह का देहांत हो गया और उसका पुत्र भीमसिंह वहां का बादशाह का महारावत को शाही दरबार में बुलाना स्वामी हुआ, परंतु उन दिनों बादशाह औरंगज़ेब के दक्षिण में होने और फिर उसकी वि० सं० १७६३ (ई० स० १७०७) में मृत्यु हो जाने तथा शाह- (१) महाराज बहादुरसिंह; रावत प्रतापसिंह ने मोहकमसिंह हरिसिंघोत, देवगढ़ रा धणी री वार्ता; पृ० २६-६६ । (२) वही; पृ० १६-२४ । २४