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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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१८६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास ज़ादे मुअज्जम (शाह आलम बहादुरशाह) और आज़म के बीच तख़्त के लिए झगड़ा होने आदि कारणों से बांसवाड़ा और देवलिया के स्वामी शाही दरबार में नहीं जा सके थे। बहादुरशाह ने बादशाह बनने पर ई० स० १७०८ के जनवरी (वि० सं० १७६४ माघ) मास में इन दोनों राज्यों के नरेशों को शाही दरबार में लाने के लिए दो शाही सेवकों को भेजा¹। इससे अनुमान होता है कि महारावत शाही दरबार में गया हो, पर इससे आगे का वृत्तांत अप्राप्य है। ऊपर बतलाया गया है कि वि० सं० १७६३ (ई० स० १७०७) में दक्षिण में बादशाह औरंगज़ेब का देहांत हो गया। उस समय उसके दोनों शाह- महाराजा अजीतसिंह और ज़ादे मुअज्जम और आज़म के बीच बादशाह बनने सवाई जयसिंह का देवलिया के लिए वि० सं० १७६४ (ई० स० १७०७) में जजाओ में जाना के मैदान में बड़ा भारी युद्ध हुआ, जिसमें शाहज़ादे मुअज्जम की विजय हुई और आज़म मारा गया। फिर मुअज्जम अपना नाम शाहआलम बहादुरशाह रखकर मुग़ल साम्राज्य का स्वामी हुआ। जजाओ के युद्ध में आंबेर का स्वामी महाराजा सवाई जयसिंह आज़म के पक्ष में और उसका भाई विजयसिंह मुअज्जम के पक्ष में रहकर लड़ा था। इस कारण बहादुरशाह ने बादशाह बनने पर जयसिंह के स्थान में विजयसिंह को आंबेर का स्वामी बनाना चाहा। उन्हीं दिनों जोधपुर के महाराजा अजीतसिंह ने औरंगज़ेब की मृत्यु से उत्पन्न अव्यवस्था से लाभ उठाकर अपने राज्य से शाही खालसा उठा दिया। इससे बहादुरशाह ने अजीतसिंह को दंड देकर जोधपुर पर पुनः अधिकार करने एवं आंबेर विजयसिंह को दिलाने के लिए अपने शाहज़ादे अज़ीमुश्शान और ख़ानखाना मुनइमखां आदि को ससैन्य रवाना किया और आप भी अजमेर होता हुआ जोधपुर के समीप जा पहुंचा। उस समय अजीतसिंह ने शाही सेना से मुक़ाबला करने में हानि समझ बादशाह के पास उपस्थित होना ही ठीक (१) बहादुरशाह के राज्य समय के अख़बारात-इ-दरवार-इ-मुअल्ला से। ये अख़बारात जयपुर राज्य के संग्रह में सुरक्षित हैं।