राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] महारावत प्रतापसिंह १८७
समझा। वादशाह ने उसका पहले का अपराध क्षमाकर उसको साढ़े तीन हज़ारी मंसब देकर जागीर में सोजत, सिवाणा और फलोधी के पर- गनों का फ़रमान कर दिया एवं जोधपुर तथा मेड़ता आदि पर शाही- ख़ालसा भेज दिया। वहीं आंबेर से सवाई जयसिंह भी जाकर वादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ। वादशाह ने उस (जयसिंह) की सेवा स्वीकार कर उसको अपने सरदारों में शुमार किया और आंबेर पर हुसेनअलीखां को बंदोबस्त के लिए भेज दिया। फिर बहादुरशाह वहां से दोनों राजाओं को साथ लेकर अपनी राजधानी पहुंचा। उन्हीं दिनों बहादुरशाह के पास उसके भाई कामबख़्श के दक्षिण में अपने को वादशाह घोषित कर फ़साद उठाने की ख़बर पहुंची। निदान वह कामबख़्श को सज़ा देने के लिए दक्षिण की ओर रवाना हुआ। उस समय राठोड़ दुर्गादास-सहित महाराजा अजीतसिंह और सवाई जयसिंह अपने-अपने राज्य मिलने की आशा से मंडेश्वर (मंडलेश्वर, नर्मदा के तट पर) तक वादशाह के साथ रहे, परंतु जब देखा कि राज्य मिलने की कोई आशा नहीं है और उनपर वादशाह की तरफ़ से निगरानी की जाती है, तब उसे बिना सूचना दिये ही वे अपने डेरे-डंडे वहीं छोड़कर उदयपुर की ओर चले गये। मार्ग में देवलिया में पहुंचने पर महारावत प्रतापसिंह ने उनका उचित आतिथ्य कर उन्हें उदयपुर को रवाना किया, जहां महाराणा अमरसिंह (दूसरा) ने उन्हें अपने यहां सम्मानपूर्वक रक्खा¹। उदयपुर में उनके पहुंचने की ख़बर पाकर शाहज़ादे मुईज़ुद्दीन जहां- दारशाह ने महाराणा को लिखा कि उन्हें अपने पास नौकर न रक्खे और [हाशिया: किशनगढ़ के राजा राजसिंह का देवलिया जाकर रहना] उन्हें समझा दे कि वे वादशाह के पास अर्जियां भेजें; मैं उनके अपराध क्षमा करा दूंगा और जागीरें दिलवा दूंगा। वहां से महाराणा अमरसिंह की सहा- यता पाकर महाराजा अजीतसिंह ने जोधपुर आदि पर और सवाई जयसिंह ने आंबेर आदि पर अपना अधिकार कर लिया। उन दिनों बादशाह, काम-
[Footnote] (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ७६८-७८। जोधपुर राज्य की ख्यात; जि० २, पृ० ८३-४।