राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास बख़्श को पराजित करने में व्यस्त था, इसलिए उन्होंने यह अवसर उपयुक्त देख शाही इलाक़े में भी उपद्रव करना चाहा। तब रूपनगढ़ (किशनगढ़) का स्वामी राजा राजसिंह (जो बादशाह का आज्ञाकारी सेवक था) उक्त दोनों राजाओं का साथ न देने से अपने इलाक़े की भी बरबादी समझ देवलिया में चला गया और जब तक उनका उपद्रव शांत नहीं हुआ, वह वहां के महारावत का मेहमान रहा। इस बीच उसने उपर्युक्त दोनों राजाओं के उपद्रवों को मिटाने के लिए उनके इलाक़े के फ़रमान उनके नाम हो जाने की बादशाह के पास शाहज़ादे अज़ीमुश्शान-द्वारा अर्जी भेजी, जो स्वीकृत होकर दोनों राजाओं के नाम के शाही फ़रमान उसके पास बादशाह की ओर से पहुंच गये। उनको लेकर वह देवलिया से विदा हुआ और उसने उक्त दोनों राजाओं को शाही फ़रमान देकर बढ़ता हुआ उपद्रव रोक दिया¹। लगभग ३५ वर्ष राज्य करने के पश्चात् अनुमान ७५ वर्ष की आयु में महारावत प्रतापसिंह का देहांत हुआ। एक जगह उसके देहांत का समय महारावत का परलोकवास वि० सं० १७६४ पौष वदि ३ (ई० स० १७०७ ता० ३० नवंबर) दिया है², जो ठीक नहीं है, क्योंकि "जोधपुर राज्य की ख्यात" एवं "वीरविनोद" के अनुसार, जैसा कि ऊपर बतलाया गया है, वि० सं० १७६५ के ज्येष्ठ मास (ई० स० १७०८ मई) के प्रारंभ में महाराजा अजीतसिंह तथा महाराजा सवाई जयसिंह के देवलिया में जाने पर महारावत प्रतापसिंह का उनका आतिथ्य करना स्पष्ट है³। ऐसी अवस्था में वि० सं० १७६४ (ई० स० १७०८) में उसका परलोकवास होना माना नहीं जा सकता। संभव है कि महारावत प्रतापसिंह का देहांत वि० सं० १७६५ के ज्येष्ठ (ई० स० १७०८ मई) मास के पीछे किसी समय हुआ हो और ख्यात-लेखकों ने वि० सं० १७६५ (१) जोधपुर राज्य की ख्यात; द्वितीय भाग, पृ० ६०। "वीरविनोद" से पाया जाता है कि महाराणा अमरसिंह (दूसरा) ने भी इस सम्बन्ध में यथेष्ट प्रयत्न किया था (द्वि० भा०, पृ० ७७३-८)। (२) पंडित जगन्नाथ शास्त्री; काव्यकुसुम (प्रस्तावना); पृ० २२। (३) देखो ऊपर पृ० १८७, टिप्पण १।