राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत प्रतापसिंहः १६५ भी उत्तरोत्तर वृद्धि होकर आगे जाकर वहां कई भव्य जिनालय बने। देव- लिया राज्य उसके समय में सम्पन्न रहा। उसका कांठल के मीणों पर पूरा आतंक था एवं चोर और लुटेरों को यथेष्ट दंड देकर उसने सर्वत्र शांति की स्थापना की। एक बार डोडियों ने एक ब्राह्मण को मार डाला, जिस- पर उसने डोडियों के गढ़ पिपलोदा पर चढ़ाई कर अपराधियों को दंड देने में किंचित् भी विलंब न किया। शरणागत-वत्सलता को वह क्षत्रियों का मुख्य धर्म समझता था। उसने बादशाह औरंगज़ेब के पौत्र और बहा- दुरशाह के पुत्र अज़ीमुश्शान के भेजे हुए शेरबुलंदखां नामक शाही सेवक को अपनी शरण में रखकर निर्भीकता का परिचय दिया। वह पूर्ण पितृभक्त और कर्त्तव्यपरायण राजा था। भाषा काव्य में उसकी गति अच्छी थी और रचना सरल होती थी। लोकोपयोगी कार्यों की ओर रुचि होने से उसके राज्य-समय में कई सार्वजनिक स्थानों का निर्माण हुआ। विष्णु का परमभक्त होने के कारण उसने श्रीकृष्ण नाम का साढ़े तीन करोड़ जप करवाया था¹, जिसकी समाप्ति उसने पूर्ण धूमधाम से कर सहस्रों रुपये व्यय-किये थे। उसका रतलाम के स्वामी से भी युद्ध होना ख्यातों में लिखा है, परंतु रतलाम के इतिहास से इसकी पुष्टि नहीं होती तो भी रतलामवालों के साथ युद्ध होने के संबंध में वहां निम्नलिखित पद्य प्रसिद्ध है— पातल थारा पीथला मत भेजे रतलाम। राठोड़े कागद लिख्यो महर करो दीवाण॥ (१) प्राकार्षीन्नितरां प्रतापनृपतिः श्रीदेवदुर्गे वरे स्मारं स्मारमनन्तनामविलसत्सार्धत्रिकोटिव्रतम्। तस्योद्यापनमद्भुतं च कृतवान् यादृङ् निबंधान् बहून् दृष्ट्वा तादृगिहोच्यते हरिपर श्रीमानसिंहाज्ञया॥ रामकृष्ण; नाग माहात्म्य।