राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास नहीं बढ़ने दिया, जो उसकी बुद्धिमत्ता का सूचक है १। उदार स्वभाव का राजा होने के कारण उसने बीकानेर में विवाह के अवसर पर त्याग आदि बंटवाने में अच्छी ख्याति प्राप्त की थी । वह धर्मात्मा और दयालु राजा था। प्रजा की भावनाओं का वह सदा आदर करता तथा उत्तम आचरण रखता था। फलतः उसने देवलिया में प्रत्येक अष्टमी को कुम्हारों-द्वारा आवा न पकाने एवं चतुर्दशी को जीव-हिंसा न करने और मांस न बेचने की आज्ञा जारी कर पाषाण-लेख लगवा दिये थे। इन कार्यों से पाया जाता है कि उसके राज्य-काल में वहां जैन धर्मावलंबियों का पूरा प्रभाव रहा होगा। महारावत के ऐसे कार्यों से बाहर से आकर उसके राज्य में व्यापारी लोग बसने लगे, जिससे राज्य में समृद्धि बढ़ी और थोड़े ही दिनों में उसका बसाया हुआ प्रतापगढ़ क़स्बा अच्छा आबाद हो गया एवं देवलिया की ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६२ । प्रतापगढ़ राज्य-की कुछ ख्यातों में कुछ स्थल पर ऐसा भी लिखा मिलता है कि मेवाड़ के महाराणाओं ने बादशाही सेवा स्वीकार कर लेने के कारण अप्रसन्न होकर कांठल का इलाक़ा जोधपुर के कुंवर रामसिंह को दहेज में दे दिया, जिसपर वह वहां अधिकार करने के लिए गया, परंतु महारावत के एक पिपाड़ा राजपूत के द्वारा मारा गया । उसकी छत्री बमोतर में अंबा- माता के पास विद्यमान है। इस कथन की पुष्टि किसी शिलालेख अथवा उदयपुर और जोधपुर राज्य के इतिहासों से नहीं होती। देवलिया का राज्य सोलहवीं शताब्दी में स्थापित हो गया था और वह एक प्रकार से स्वतंत्र था। मुग़ल बादशाहों के समय उसका शाही दरबार से संबंध था । जहांगीर और औरंगज़ेब के समय उसके कुछ परगनों का मेवाड़ के महाराणाओं के नाम फ़रमान भी हुआ; परंतु उनका अधिकार वहां अस्थायी ही रहा और फिर वे बादशाही दरबार से देवलियावालों को मिल गये । इस अवस्था में मेवाड़ के महाराणाओं का यह राज्य अपने दामाद जोधपुर के राजकुमार रामसिंह को दे देने और उसके वहां जाने पर मारे जाने की बात निर्मूल है । अंबामाता में, जहां रामसिंह की छत्री बताई जाती है, कोई लेख नहीं हैं, न जोधपुर राज्य की ख्यातों में महा- रावत प्रतापसिंह के समकालीन राजकुमारों की नामावली में रामसिंह का नाम है । अतएव उपर्युक्त कथन में संदेह होना स्वाभाविक है, क्योंकि जिस राज्य पर अधिकार नाम मात्र का न हो, वह राज्य दहेज में देना अस्वाभाविक बात है । संभव है इस छत्री का संबंध मालवे के किसी राठोड़ राजा या राजकुमार से हो, जिसके राज्य की सीमा प्रतापगढ़ राज्य से मिलती हो ।