भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 534 में से

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महारावत प्रतापसिंह १६३ में है और-इतिहास के लिए उपयोगी है, क्योंकि इसके प्रारंभ में गुहिल से लगाकर भर्तृभट्ट तक गुहिल राजाओं के नाम दिये हैं और फिर क्षेमकर्ण से लगाकर हरिसिंह तक प्रतापगढ़ के नरेशों का यथाक्रम वर्णन दिया है। इसके अतिरिक्त महारावत की माता, पट्टराज्ञी, राजकुमारों, भाइयों, सर- दारों, राजगुरु, राजकवियों, मंत्रियों आदि के नाम भी उसमें मिलते हैं। (४) वि० सं० १७५३ श्रावण सुदि २ ( ई० स० १६९६ ता० २१ जुलाई) का देवलिया (देवगढ़) के कोतवाली चबूतरे के पास लगा हुआ शिलालेख, जिसमें महारावत-द्वारा प्रत्येक चतुर्दशी को जानवर मारने और मांस बेचने की मनाई का उल्लेख है¹। महारावत प्रतापसिंह वीर, दानशील, साहसी, उदार और विद्वान् राजा था। वह विद्वानों को आदरपूर्वक अपने राज्य में रखकर उनका महारावत का व्यक्तित्व यथोचित सम्मान करता था, जिससे उसके राज्य- काल में भी वहां साहित्यिक जीवन बना रहा। उसने शाही दरबार से अपना संबंध समयानुकूल रखा और संभव है कि युद्ध आदि अवसरों पर भी शाही सेना के साथ उसने अपनी फ़ौज भेजी हो। राजपूताने के बीकानेर और जोधपुर राज्यों से वैवाहिक संबंध जोड़कर उसने मेल बढ़ाया। उदयपुर के महाराणाओं से भी उसने विरोध प्रतापसिंहदेवो पाटणपुरग्रामं प्रतापपुराख्यां विधाय पञ्चशताधिकनिवर्त्त- नोपेतं वत्ससगोत्राय हरिदेव शिवदेव रंगदेव गोपालदेवादि पुत्रपौत्रादि सहिताय महत्तरजयदेवशर्म्मणे········इत्याचन्द्रार्कयावत् प्रददे···· । संवत् १७३३ वर्षे माघ सुदि पूर्णिमास्यां लिखितमिदम् । सोनी हीरो । मूल ताम्रपत्र की प्रतिलिपि से । (१) इस लेख के अतिरिक्त उक्त महारावत के समय का देवलिया में बड़े जैन मंदिर के बाहिर एक पाषाण लेख लगा हुआ है, जिसके संवत्, मिति आदि का भाग घिस गया है। २५