राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास [हाशिया: महारावत के समय के शिलालेख और दानपत्र] कुछ दानपत्रों की नक़लें और शिलालेखों की छापें हमारे पास आई हैं, जिनका आशय नीचे लिखे अनुसार है— ( १ ) वि० सं० १७३१ फाल्गुन सुदि ७ ( ई० स० १६७५ ता० २१ फ़रवरी ) रविवार का देवलिया में भोगीदासजी की बावड़ी के ताक में लगा हुआ शिलालेख, जिसमें सीसोदिया वंशी गोपाल के पौत्र और जोधा के पुत्र भोगीदास का उक्त बावड़ी बनवाकर महारावत प्रतापसिंह के राज्य- काल में उसकी प्रतिष्ठा करने का उल्लेख है¹। ( २ ) वि० सं० १७३२ फाल्गुन वदि १३ (ई० स० १६७६ ता० १ फ़रवरी) का मागसा गांव का गढ़वी गोकल के नाम का दानपत्र, जिसमें मागसा गांव चारण गोकल को उक्त महारावत-द्वारा मिलने का उल्लेख है। ( ३ ) पाटणया गांव का वि० सं० १७३३ माघ सुदि १५ ( ई० स० १६७७ ता० ७ फ़रवरी ) का दानपत्र, जिसमें महारावत प्रतापसिंह का पाट- णया गांव मेहता जयदेव को दान करने का उल्लेख है²। यह दानपत्र संस्कृत ( १ ) देखो ऊपर पृ० १६३ टिप्पण संख्या ४। ( २ ) ॰॰॰॰॰॰॰॰॰महेंद्रसमेन श्रीमन्महाराजाधिराजमहाराजरावतश्री- प्रतापसिंहदेवेनालोच्येदेमुक्तं । वाताभ्रविभ्रममिदं वसुधाधिपत्यमापातमात्र- मधुरोविषयोपभोगः। प्राणास्तृणाग्रजलबिंदुसमा नराणां धर्मः सखा पर- महो परलोकयाने। तथा। या स्वसद्मनि पद्मेपिदिनावधि विराजते इन्दिरा मन्दिरे न्यस्य कथं स्थास्यति सा चिरमितो निःसारं संसारमाकलय्य सहेतुकसकलदुःखनाशकसकलनित्यानित्यसुखसाधकसाधनाग्रेसरकृतोभयै- कादशीव्रतोद्यापने द्यमाघशुक्लैका[द]श्यां मया प्रतापसिंहनृपेण महत्तर- जयदेवद्विजाय मतिपितृदत्तविद्यारायापरनाम्ने पाटणपुराख्यो ग्रामः स्वसीमा- वृक्षपर्वतजलाशयकार्मुकहल[ इमं ]राजामात्यादि सर्वलागटस्वीयपरकीय- टंकीचतुराघाटैः सह पञ्चशताधिकनिवर्त्तनोपेतः स्वस्तिपत्रेण चंद्रार्क- यावत् श्रीकृष्णार्पणेन दानवाक्येन दत्तः ॰॰॰॰॰॰॰॰वैजवापायनसगोत्रः