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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 534 में से

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महारावत प्रतापसिंह १६१ अपने पिता हरिसिंह की भांति महारावत प्रतापसिंह भी विद्याप्रेमी था। वह विद्वानों को आश्रय देकर अपने यहां रखता और उनका सम्मान महारावत का विद्यानुराग करता था। उसके राज्य-काल में कितने ग्रंथों का निर्माण हुआ इसका तो पता नहीं चलता, परंतु उसके समय में कल्याण कवि-रचित "प्रताप प्रशस्ति" नामक खंडित काव्य की रचना होने तथा अन्य जगह उसकी राजसभा में रहनेवाले विद्वान् सोमजीभट्ट, मन्नाभट्ट, विश्वनाथ, मेहता जयदेव, मेहता हरिदेव, भगवान- कवि, नृसिंहनागर, केशव पौराणिक, संतोपराय, रामकृष्ण, रामजी बाटी, विजयसूरि, नरू आदि का उल्लेख मिलता है। महारावत स्वयं भाषा में काव्य- रचना किया करता था । उसके रचे हुए कुछ दोहे प्राप्त हुए हैं, जो "काव्य कुसुम" के द्वितीय भाग में मुद्रित हुए हैं। दोहे अधिकतर भक्ति तथा ज्ञान संबंधी हैं एवं उनसे महारावत की अध्यात्म की तरफ़ रुचि होना प्रकट होता है। उसके बनाये हुए दोहों में कुछ शृंगार रस के भी हैं। रचना सरल है और विभिन्न अलंकारों का उनमें अच्छा समावेश है । कुछ दोहों में उसने अपने पिता महारावत हरिसिंह की दानशीलता की प्रशंसा करते हुए तुलनात्मक दृष्टि से मेवाड़ के स्वामी महाराणा जगत- सिंह (प्रथम) के बाद उसको स्थान दिया है१, जिससे पाया जाता है कि वह अपने पिता की विद्यमानता एवं महाराणा जगतसिंह के देहांत अर्थात् वि० सं० १७०६ (ई० स० १६५२) के पूर्व ही काव्य-रचना करने लग गया था। उसके बनाये हुए दोहों में भगवान कवि, हरिदेव, संतोषराय आदि की स्तुति की है, जिनके सत्संग से संभव है उसको काव्य संबंधी ज्ञान हुआ हो। महारावत प्रतापसिंह के समय के वि० सं० १७३१ से १७६४ (ई० स० १६७५ से १७०७) तक के कई दानपत्र और शिलालेख मिले हैं, जिनमें से (१) हरि-इंद जसवेँत-सिंघरा, बहु देणा दातार । जिण दिन नहिं राख्यो जगो, तिण दिन तो शिर भार ॥ काव्य कुसुम; भाग २, पृ० २।