राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास महारावत लोकोपयोगी कार्यों की तरफ़ पूर्ण रुचि रखता था। उसने देवलिया में प्रतापवाव नामक बावड़ी और बाग बनवाया। यह बावड़ी देव- महारावत के समय के बने लिया के जलाशयों में सबसे उत्कृष्ट है और अकाल हुए लोकपयोगी कार्य के समय इस बावड़ी से देवलिया के निवासियों का काम चलता है। उसकी माता मनभावती ने केशव भटेवरा के निरीक्षण में मानसरोवर नामक सुरम्य जलाशय, जिसके आस-पास आम्रवृक्षों की प्रचुरता थी, बनवाया¹। उसकी राणी पाटमदें (धर्मकुंवरी) ने भी देवलिया में एक बावड़ी बनवाई तथा धमोतर के ठाकुर जोगीदास के भाई भोगीदास² ने भी वहां एक बावड़ी बनवाकर उक्त महारावत के समय उसका वास्तु-संस्कार किया था। पहले की बात का खंडन किया है। इस बात को स्पष्ट करने के लिये "जोधपुर राज्य की ख्यात" से मिलान करने पर पाया जाता है कि महाराजा अजीतसिंह का एक विवाह. वि० सं० १७६३ (ई० स० १७०७) में जोधपुर पर अधिकार होने के पूर्व देवलिया में हुआ था और उसके उदर से कुंवर उदोतसिंह का जन्म हुआ था, जो बादशाह औरंगज़ेब की मृत्यु के पीछे जोधपुर पर अधिकार होने के समय विद्यमान था। उसके. पीछे वि० सं० १७६६ (ई० स० १७०६) में उक्त महाराजा ने देवलिया में जाकर फिर अपना विवाह किया था। जोधपुर राज्य की ख्यात में जहां महाराजा अजीतसिंह की राणियों के नाम दिये हैं, वहां उसकी दो राणियों का देवलिया की होना बतलाकर एक को महारावत पृथ्वीसिंह की कुंवरी और प्रतापसिंह की पौत्री लिखा है, किंतु उसका नाम नहीं दिया है और दूसरी का कुछ भी परिचय नहीं दिया है। मुंशी देवीप्रसाद-द्वारा संगृहीत जोधपुर के राजाओं की राणियों और कुंवरों की नामावली में भी उक्त महाराजा के देवलिया की दो राणियां होना लिखा है, परंतु उनके नाम नहीं दिये हैं एवं एक राणी का वि० सं० १७८१ आषाढ़ सुदि ६ (ई० स० १७२४ ता० १६ जून) को विवाह होना लिखा है। ख्यातों के उपर्युक्त विभिन्न लेखों से इसका ठीक-ठीक निर्णय होना कठिन है; . परंतु यह कहा जा सकता है कि महाराजा अजीतसिंह का एक विवाह महारावत प्रतापसिंह की विद्यमानता में, जैसा कि कर्नल टॉड ने (जि० २, पृ० १०१० में) लिखा है, वि० सं० १७५३ (ई० स० १६९६) में उसकी किसी पुत्री अथवा पौत्री से हुआ हो और दो विवाह उक्त महाराजा के देवलिया की राजकुमारियों से पीछे से भी हुए हों। (१) देखो ऊपर पृ० १६६ टिप्पण संख्या २। (२) देखो ऊपर पृ० १६३ टिप्पण संख्या ५।