राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास उस (गोपालसिंह) के समय के वि० सं० १७७८ से १८१२ (ई० स० महारावत के समय के १७२१ से १७५५) तक के शिलालेख और दानपत्र शिलालेख और दानपत्र आदि मिले हैं, जिनमें से निम्नलिखित इतिहास के लिए उपयोगी हैं— (१) वि० सं० १७७८ आषाढ सुदि १३ (ई० स० १७२१ ता० २६ जून) का वसाड़ गांव के पटेल लाभा दवेचा नरसिंहदास के नाम का आज्ञापत्र, जिसमें दवे गोरधन को अडाण (कुआं) ज़मीन बीघा ८ देने का उल्लेख है। इसमें महारावत गोपालसिंह को 'महाराजा', और 'रावतजी- श्री' लिखा है एवं यह सनद दुए शाह चंद्रभाण होने का उल्लेख है। इस- पर जो छाप लगी हुई है उसमें 'श्रीमहारावत श्रीगोपालसिंहजी दुए शाह चंद्रभाणजी' लेख अंकित है, जिससे पाया जाता है कि हूंवड़ जाति का महाजन चंद्रभाण उक्त महारावत का मंत्री था। (२) वि० सं० १७७८ श्रावण सुदि १३ (ई० स० १७२१ ता० २५ जुलाई) का सेखड़ी गांव का गुंसाईं गंगागिरि के नाम का ताम्रपत्र, जिसमें महारावत पृथ्वीसिंह-द्वारा वि० सं० १७७३ ज्येष्ठ सुदि १५ (ई० स० १७१६ ता० २५ मई) को दिये हुए नाथूखेड़ी गांव के एवज़ में उसको गोपालसिंह का उदयपुर की यात्रा के समय उक्त गांव प्रदान करने का उल्लेख है¹। (३) वि० सं० १७७६ वैशाख सुदि २ (ई० स० १७२२ ता० ६ अप्रेल) का भट्टावर के नाम गांव अचलेसर में अट्ठारह बीघा खेत देने का आज्ञापत्र। इसमें उक्त महारावत को श्रीमंत महाराजाधिराज महारावत और दुए शाह चंद्रभाण लिखा है तथा विद्या शिरोमणि-द्वारा यह आज्ञापत्र लिखे जाने का उल्लेख है। पुरानी ख्यात (पृ० ११-१२) में महारावत की रानियों की संख्या १० दी है और बख़्तावरसिंह को चतुर्थ पुत्र लिखा है। उसमें कुंवरियों के नाम नहीं दिये हैं। उसमें दिये हुए कुछ रानियों के नाम और पितृकुल भी भिन्न हैं। (१) देखो ऊपर पृ० २१८, टिप्पण संख्या १।