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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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महारावत गोपालसिंह २४१ महारावत गोपालसिंह भी जाकर सम्मिलित हो गये¹, किंतु जयसिंह ने महाराणा के पहुंचने के पूर्व ही जोधपुर पहुंच वहां घेरा डाल दिया। जयपुर की सेना-द्वारा जोधपुर के घेरे जाने का समाचार पाकर अभयसिंह बीकानेर का घेरा उठाकर जोधपुर लौट गया और फिर संधि की बातचीत होने पर उन्नीस लाख रुपये लेकर जयसिंह ने जोधपुर का घेरा उठाकर जयपुर की तरफ़ प्रयाण किया। इस बीच महाराणा भी अजमेर की सीमा में जा पहुंचा और मार्ग में जयसिंह तथा जोरावरसिंह जाकर उससे मिले²। फिर महाराणा और डूंगरपुर एवं प्रतापगढ़ के स्वामी भी अपने- अपने स्थानों को लौट गये। महारावत गोपालसिंह का वि० सं० १८१३ (ई० स० १७५६) के लगभग देहांत हुआ³। उसके ग्यारह राणियां थीं, जिनसे चार कुंवर— [महारावत का देहांत और] बख़्तावरसिंह, सालिमसिंह, रत्नसिंह और जैत- [राणियां आदि] सिंह—एवं सूरजकुंवरी तथा एजनकुंवरी नामक दो कुंवरियां हुईं⁴। (१) ठा० चतुरसिंह; चतुरकुल चरित्र; द्वितीय भाग, पृ० १३२। (२) देखो मेरा राजपूताने का इतिहास; पांचवी जिल्द; प्रथम खंड, पृ० ३१६। (३) "वीरविनोद" (द्वितीय भाग, पृ० १०६३) में तथा कुछ दूसरे स्थलों पर वि० सं० १८१४ (ई० स० १७५७) में उक्त महारावत का देहांत होना लिखा है और एक स्थान पर उसकी मृत्यु उसी वर्ष श्रावण वदि १४ (ता० १५ जुलाई) को दी है, जो ठीक नहीं है; क्योंकि उक्त महारावत के उत्तराधिकारी सालिमसिंह की एक सनद वि० सं० १८१३ माघ सुदि १ (ई० स० १७५७ ता० २० जनवरी) की कल्याणपुरा के ठाकुर फ़तहसिंह के छोटे पुत्र दौलतसिंह के नाम देवद और कराड्या गांव जागीर में देने की विद्यमान है। ऐसी अवस्था में उक्त महारावत का वि० सं० १८१४ में देहांत होने का कथन नितान्त असङ्गत है। प्रतापगढ़ से प्राप्त शिलालेखों आदि की सूची में उक्त महारावत का अन्तिम लेख वि० सं० १८१२ वैशाख वदि ३ (ई० स० १७५५ ता० ३० मार्च) का दिया है, अतएव महारावत गोपालसिंह का देहांत वि० सं० १८१३ (ई० स० १७५६) में मानना पड़ेगा। (४) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ७-८। प्रतापगढ़ राज्य की एक ३१