राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 300, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहारावत सालिमसिंह २४५ महारावत का व्यक्तित्व उसका अपने राज्य की उन्नति की तरफ़ पूरा ध्यान था। व्यापार की वृद्धि के लिए वह बाहर से व्यापा- रियों को बुलवाकर अपने राज्य में आबाद करता और उनपर किसी प्रकार का अत्याचार न हो, इसका सदैव ध्यान रखता था । प्रजा पर भविष्य में अत्याचार न हो, इस दृष्टि से उसने शिलालेख लगवा दिये थे। वह समय की गति के अनुसार आचरण करता था। उसने उस समय के प्रबल राजनीतिज्ञ, महाराष्ट्र के कर्णधार पेशवा बाजीराव की प्रीति सम्पादन की, जिसका परिणाम यह हुआ कि मालवे में चारों तरफ़ मरहटों का उपद्रव होने पर भी उसका राज्य, जो मालवे से मिला हुआ था, क्षति से बचा रहा। पेशवा उसका बड़ा सम्मान करता और उसकी बात मानता था। आपत्तिकाल में महारावत अपने मित्रों की सहायता करना अपना परम कर्त्तव्य समझता था। उसने डूंगरपुर पर महाराणा और पेशवा के आक्रमणों के समय समझौते का प्रयत्न किया तथा बीकानेर पर जोध- पुर के महाराजा की चढ़ाई के समय, जब महाराणा अपनी सेना के साथ जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह की सैन्य-योजना को सफल बनाने के लिए गया, वह भी अपनी सेना के साथ जाकर उसके शामिल हुआ। वह दानी राजा था। उसने कई गांव आदि दान में दिये थे। उसने अपने नाम पर प्रतापगढ़ में गोपालगंज नामक मोहल्ला आबाद किया एवं देवलिया में एक महल भी बनवाया, जिसको गोपाल-महल कहते हैं। सालिमसिंह महारावत गोपालसिंह का परलोकवास होने पर उसका कुंवर राज्य-प्राप्ति सालिमसिंह वि० सं० १८१३ (ई० स० १७५६) के लगभग अपने पिता का उत्तराधिकारी हुआ। इसके कुछ वर्ष बाद ही वह (सालिमसिंह) दिल्ली गया और तत्कालीन बादशाह शाहआलम से मिला, जिसने उसे चंवर आदि राज-