राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास महारावत का दिल्ली जाकर बादशाह से सम्मान प्राप्त करना चिह्न, ज़री का निशान और नक़ारा रखने का सम्मान तथा प्रतापगढ़ में टकसाल खोलकर नवीन सिक्का, जो 'सालिमशाही' कहलाता है, बनाने का हक़ प्रदान किया । दिल्ली से लौटते हुए महारावत ने उदयपुर जाकर वहां के तत्कालीन महाराणा राजसिंह (दूसरा) से भेंट की । उस समय तक प्रतापगढ़ राज्य मरहटों के आक्रमणों से अछूता रहा था और वह चौथ आदि से मुक्त था। पेशवा के तीन प्रमुख सेनापति तुकोजी का देवलिया पर घेरा डालना सिंधिया, होल्कर और पंवार के बीच मालवे के परगनों का विभाग होकर प्रतापगढ़ राज्य की चौथ होल्कर के हिस्से में रखी गई। अतएव चौथ की वसूली के लिए मल्हारराव होल्कर की तरफ़ से उसके सेनापति तुकोजी ने ससैन्य प्रतापगढ़ पर चढ़ाई कर वि० सं० १८१८ (ई० स० १७६१) में उसे चारों तरफ़ से घेर लिया, किंतु महारावत की कुशलता से होल्कर के सेनापति को सफलता नहीं मिली। इसी बीच रामपुरा पर अधिकार करने के लिए मल्हारराव होल्कर और उदयपुर राज्य के बीच संघर्ष छिड़ गया तथा उदयपुर के महाराणा की सेना होल्कर के मुक़ाबले के लिए अमरदास चीडक (चंडक, माहेश्वरी वैश्य) की अध्यक्षता में जावद में एकत्रित हुई १। फलतः उस समय होल्कर की सेना को वहां से अपना घेरा उठाना पड़ा। दो वर्ष पीछे जब मल्हारराव होल्कर वि० सं० १८२० (ई० स० १७६३) में उदयपुर की तरफ़ सेना लेकर बढ़ा, तब उसने प्रतापगढ़ पर घेरा डालकर वहां से कुछ धन वसूल किया २। (१) कान्होड़ के रावत जगतसिंह के नाम उदयपुर राज्य के मंत्री सदाराम देपुरा (माहेश्वरी वैश्य) का वि० सं० १८१८ फाल्गुन सुदि ८ (ई० स० १७६२ ता० ३ मार्च) का पत्र। (२) प्रतापगढ़ राज्य से मरहटों (होल्कर) को खिराज किस वर्ष से मिलना आरंभ हुआ, इसका विवरण प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों और मरहटा-काल के इतिहासों से नहीं पाया जाता। इसलिए इस विषय में निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कहा