राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत सालिमसिंह २४७ महाराणा जगतसिंह (दूसरा) वि० सं० १८०८ (ई० स० १७५१) में परलोक सिधारा और उसके पीछे उसका कुंअर प्रतापसिंह (दूसरा) [महाराणा अरिसिंह की] उदयपुर राज्य का स्वामी हुआ, जिसकी थोड़े समय [सहायतार्थ महारावत का] बाद ही वि० सं० १८१० (ई० स० १७५४) में मृत्यु [सेना भेजना] हुई। तदनन्तर उस (प्रतापसिंह) का पुत्र राजसिंह (दूसरा) दस वर्ष की आयु में महाराणा हुआ, परन्तु वि० सं० १८१७ चैत्र वदि १३ (ई० स० १७६१ ता० ३ अप्रेल) को वह भी निःसंतान काल-कवलित हो गया। इसपर राज-महिषियों की आज्ञा से उस (राज- सिंह) का चाचा अरिसिंह, जो जगतसिंह का छोटा पुत्र और प्रतापसिंह का भाई था, मेवाड़ की गद्दी पर बैठाया गया। अरिसिंह आतुर और क्रोधी स्वभाव का था, अतएव गद्दीनशीनी के थोड़े दिनों बाद ही ऐसी घटना घटी, जिससे सरदारों आदि का उससे मनोमालिन्य हो गया और वहां विद्रोह की अग्नि प्रज्वलित हो गई। राज्य के अधिकांश बड़े-बड़े सरदारों ने अरि- सिंह को राज्यच्युत् करने के लिए राजगद्दी के दूसरे दावेदार रत्नसिंह का, जो राजसिंह की मृत्यु के पीछे उस (राजसिंह) की झाली राणी से उत्पन्न · हुआ था, पक्ष लिया। उन्होंने गुप्त रूप से उस शिशु राजकुमार को उदयपुर से निकालकर उसके नाना गोगूंड़े के स्वामी झाला जसवन्तसिंह के पास पहुंचाया १। महाराणा इस घटना से बड़ा नाराज़ हुआ और उसने सरदारों का दमन करना स्थिर कर संदेह ही संदेह में अपने पितृव्य बागोर के महाराज नाथसिंह को मरवा डाला और उसके कुछ समय बाद राज्य के सच्चे हितैषी सलूंवर के रावत जोधसिंह का भी प्राण हरण किया, जिससे कुछ सरदारों को छोड़कर कई बड़े-बड़े सरदार प्रत्यक्ष रूप से रत्नसिंह के पक्ष में मिल गये और कुछ तटस्थ रहकर तत्समयक स्थिति को देखने लगे। फिर वि० सं० १८२२ (ई० स० १७६५) में विद्रोही सरदारों ने शिशु रत्नसिंह जा सकता। महारावत गोपालसिंह की पेशवाओं से मित्रता थी, अतएव उसकी मृत्यु के बाद अर्थात् उक्त समय के आस-पास ही होल्कर के साथ वहां का खिराज स्थिर हुआ होगा। (१) देखो मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ६४८।