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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 303, कुल 534 में से

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पृष्ठ 303

२४८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास को कुंभलगढ़ ले जाकर उसको मेवाड़ का महाराणा घोषित किया और तटस्थ एवं अरिसिंह के पक्षपाती सरदारों को भी वे लोभ देकर अपनी तरफ़ मिलाने लगे । उधर अरिसिंह ने भी भेद-नीति का आश्रय लेकर कई बड़े-बड़े सरदारों को अपने पक्ष में कर लिया । विद्रोही सरदारों ने नागों (साधुओं) आदि को नौकर रखकर चारों तरफ़ लूट-मार आरम्भ की और मेवाड़ में कई स्थानों पर अपना अधिकार जमा लिया, पर शीघ्र ही अरिसिंह ने अपने सहायक सरदारों एवं वैतनिक सिन्धी सेना की सहायता से किसी क़दर उनका दख़ल उठा दिया¹ । मेवाड़ के इस गृह-कलह को बढ़ाने में जोधपुर के महाराजा विजयसिंह का भी हाथ था । जोधपुर राज्य की ख्यात में लिखा है कि अरिसिंह की तरफ़ से उक्त महाराजा के पास वकील पहुंचने पर उस(विजयसिंह) ने सेना-व्यय देने के इक़रार करने पर सिंघवी फ़तेचंद और भीमराज को अपनी सेना देकर रवाना किया और उनके साथ नागोर की फ़ौज भी भेज दी, जिसने जाकर भांडेसर (जोधपुर राज्य) में अपना मुक़ाम डाला। वहां कुंभलगढ़ से रत्नसिंह के वकील पहुंचे और उन्होंने कहा कि जितना रुपया अरिसिंह देगा उतना हम लोग दे देंगे, तुम उसकी मदद मत करो । फिर रत्नसिंह की तरफ़ से रुपये मिलने पर वह सेना हटा दी गई और सिंघवी फ़तेचंद तथा भीमराज दोनों जोधपुर चले गये । रत्नसिंह की तरफ़ से खींवसर के ठाकुर जोरावरसिंह के पास भी सहायता देने के लिए रक़म भेजी गई, जिससे वह अपने राजपूतों के साथ रत्नसिंह के शामिल हो गया । उसको दो वर्ष तक तो वह तनख़्वाह देता रहा और उसके बाद सेरा (सायरा) का परगना देना स्थिर हुआ² । संयोग से सात वर्ष की आयु होने पर शीतला रोग से रत्नसिंह का देहांत हो गया³ । उस समय उसके पक्षपाती सरदारों को विश्वास दिलाने (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १५५२। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ६५१ । (२) जोधपुर राज्य की ख्यात; जि० ३, पृ० ५७ । (३) देखो मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ६५४ ।