राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत सालिमसिंह २४६ पर बेदला का राव रामचंद्र, भींडर का महाराज मुहकमसिंह ( शक्तावत ) आदि सरदार और अमरदास देपुरा महाराणा के पास उपस्थित हो गये१; किंतु इससे बचे हुए रत्नसिंह के पक्षपाती सरदारों का साहस कम न हुआ और उन्होंने शिशु रत्नसिंह के स्थान में एक कृत्रिम लड़के को खड़ा कर उपद्रव ज्यों का त्यों जारी रक्खा। उन दिनों कोटा से झाला ज़ालिमसिंह भी जाकर महाराणा के शामिल हो गया। उस समय अरिसिंह का विरोधियों की अपेक्षा बल बढ़ गया था, इसलिए देवगढ़ के रावत जसवंतसिंह और उसके पुत्र राघवदेव ने माधवराव सिंधिया को उदयपुर पर अधिकार हो जाने पर सवा करोड़ रुपया देने का इक़रार कर अपना सहायक बना लिया। उधर महाराणा ने माधवराव के प्रतिद्वंद्वी बेहरजी ताकपीर और पंडित राघवराम के द्वारा पेशवा से बातचीत कर उन दोनों को अपनी तरफ़ मिला विपक्षियों का मूलोच्छेद हो जाने पर बीस लाख रुपया देना तय किया२। महाराणा अरिसिंह ने सलूंबर के रावत पहाड़- सिंह, देलवाड़ा के राज झाला राघवदेव और शाहपुरा के राजा उम्मेदसिंह को माधवराव सिंधिया के पास भेज रत्नसिंह का पक्ष छोड़ देने को कह- लाया३; किंतु लोभी माधवराव ने रत्नसिंह का पक्ष छोड़ना स्वीकार न ( १ ) महाराणा अरिसिंह का कानोड़ के रावत जगतसिंह के नाम का वि० सं० १८२५ श्रावण वदि ८ ( ई० स० १७६८ ता० ७ जुलाई ) गुरुवार का ख़ास रुक्का। कानोड़ के रावत जगतसिंह के नाम बेदला के राव रामचन्द्र, सलूंबर के रावत पहाड़- सिंह, देलवाड़ा के राज झाला राघवदेव और भींडर के महाराज मुहकमसिंह का वि० सं० १८२५ श्रावण वदि ८ ( ई० स० १७६८ ता० ७ जुलाई ) का पत्र। अमरदास देपुरा का कानोड़ के रावत जगतसिंह के नाम का वि० सं० १८२५ श्रावण वदि ६ ( ई० स० १७६८ ता० ८ जुलाई ) का पत्र। ( २ ) देखो मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ६४१। यह इक़रार- नामा वि० सं० १८२५ भाद्रपद सुदि.१५ ( ई० स० १७६८ ता० २५ सितम्बर ) को हुआ था। ( ३ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १५४५। सलूंबर के रावत पहाड़सिंह, देलवाड़ा के राज राघवदेव और शाहपुरा के राजा उम्मेदसिंह का महाराणा अरिसिंह के ३२