राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास किया। इसके बाद अरिसिंह ने कुछ लोगों के बहकाने पर झाला राघवदेव को भी रत्नसिंह से मिला हुआ होने के संदेह में मरवा डाला१ । इससे जो सरदार महाराणा के पास उपस्थित हो गये थे, वे भी पीछा विपक्षियों से जा मिले। इस अवसर पर रघुजी पायगिया और दौला मियां भी, अपनी- अपनी सेनाओं के साथ अरिसिंह से जा मिले और जब महाराणा ने उनके बल पर विरोधियों पर अधिक दबाव डाला, तब माधवराव ने भी उदयपुर की तरफ़ प्रयाण करना निश्चय कर लिया । इसपर अरिसिंह ने माधवराव के मेवाड़ में पहुंचने के पूर्व ही अपनी सेना उज्जैन भेजकर वहीं उस(माधवराव) से युद्ध करने की योजना बनाई और वि० सं० १८२५ (ई० स० १७६८) के शीतकाल में अपनी बीस हज़ार सेना उज्जैन रवाना की। पौष सुदि ६ (ई० स० १७६६ ता० १३ जनवरी) को क्षिप्रा के तट पर माधवराव की सेना से महाराणा की सेना का मुक़ाबला हुआ। तीन दिन तक बराबर युद्ध होता रहा। मेवाड़ी सेना ने वीरतापूर्वक युद्ध कर शत्रु सैन्य को हटा दिया और विजयोन्मत्त हो नगर में लूटमार आरंभ की। इतने में ही जयपुर से देवगढ़ के रावत जसवंतसिंह की भेजी हुई पंद्रह हज़ार नांगों, की सेना ने जाकर अरिसिंह की सेना पर धावा बोल दिया, जिससे उसमें भगदड़ मच गई । फिर भी महाराणा के सरदारों, रघुजी पायगिया तथा दौला मियां ने शत्रु पक्ष का वीरता से मुक़ाबला किया। अंत में सलूंबर के रावत पहाड़सिंह, शाहपुरा के राजा उम्मेदसिंह, बनेड़ा के राजा रायसिंह, रघुजी पायगिया, दौला मियां आदि कई सरदारों के मारे जाने और झाला ज़ालिमसिंह, रावत मानसिंह तथा मेहता अगरचंद के घायल होकर युद्धक्षेत्र में गिर जाने पर अरिसिंह की सेना भाग गई । शत्रुओं ने झाला ज़ालिमसिंह, रावत मानसिंह और नाम का वि० सं० १८२१ आश्विन वदि १४ (ई० स० १७६८ ता० ६ अक्टूबर) का प्रार्थनापत्र । (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १४५५ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ६५१ ।