राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत सालिमसिंह २५१ मेहता अगरचंद को क़ैद कर दिया१। तोपों और बंदूकों के सामने खड़े होकर तलवारों और बरछियों से वीरता दिखलाने का मेवाड़ी राजपूतों का यह अन्तिम युद्ध था। इसके बाद पारस्परिक संघर्ष से उनकी स्थिति ऐसी हो गई कि वे फिर न संभल सके। उज्जैन के युद्ध में माधवराव ने महाराणा की सेना को परास्त कर वहीं से अपने लश्कर को उदयपुर की तरफ़ मोड़ा और शीघ्र ही उदयपुर को घेर लिया। उज्जैन के युद्ध में महाराणा की बहुत सी सेना का नाश हो गया था, फिर भी उसके पास सेना की कमी नहीं थी। वैतनिक सिंधी सेना के अतिरिक्त उसके पास बहुत से लड़ मरनेवाले स्वामिभक्त राजपूत विद्यमान थे, जिनके बल पर उसने उदयपुर नगर की चारों ओर से मोर्चाबंदी कर उसकी रक्षा का यथेष्ट प्रबंध कर लिया। छः महीने के लगभग महाराणा के सरदारों ने सिंधिया का मुक़ाबला किया। जब उदयपुर पर अधिकार करने में सिंधिया को सफलता न मिली, तब उसने साढ़े तिरसठ लाख रुपये सैन्य-व्यय के महाराणा से लेना तय कर उदयपुर से घेरा उठाना और रत्नसिंह का साथ छोड़ना स्वीकार किया। फलतः ज़ेवर, नक़द आदि मिलाकर साढ़े तैंतीस लाख रुपये तो उस समय पूरे कर दिये गये और बाकी रक़म के एवज़ में जावद, जीरण, नीमच, मोरवण आदि मेवाड़ के ज़िले, जबतक रुपये अदा न हों तबतक के लिए, सिंधिया को सौंप दिये गये२। इसके बाद कुछ और सरदार विद्रोहियों का साथ छोड़कर महा- राणा से जा मिले, जिससे कृत्रिम रत्नसिंह की ताक़त घट गई; फिर भी उसके पक्षपातियों ने उपद्रव में कमी न आने दी और वि० सं० १८२६ (ई० स० १७७०) में टोपला गांव के पास तथा वि० सं० १८२८ (ई० स० १७७१) ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १४५५-८ । मेरा उदयपुर राज्य का इति- हास; जि० २, पृ० ६५२-३ । ( २ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग; पृ० १४६०-६६ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ६५४-७ ।