राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास में गंगराड़ में उनका महाराणा की सेना से मुक़ाबला हुआ, जिसमें उनकी हार हुई और उनका बल टूट गया¹। तदनन्तर महाराणा ने विद्रोहियों के अधिकृत क़िलों पर अधिकार जमाना शुरू किया और चित्तोड़ पर भी अधिकार कर लिया²। प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में लिखा है कि मेवाड़ के इस गृह- कलह के समय महाराणा अरिसिंह की तरफ़ से आदेश पाते ही महारावत सालिमसिंह ने अपनी सेना भेज दी थी, जिसने युद्ध के प्रत्येक अवसर पर शत्रु-सैन्य से धीरतापूर्वक युद्ध किया था; किंतु इसका मेवाड़ के इतिहास में कहीं उल्लेख नहीं मिलता है। इतिहास के संरक्षण का अनुराग न होने से उस समय का क्रम-बद्ध वृत्तांत मिलना असंभव है। इसलिए प्रतापगढ़ के राजपूतों ने इस अवसर पर कब-कब और कहां-कहां युद्ध में भाग लिया इसपर अधिक प्रकाश नहीं डाला जा सकता। फिर भी यह कहा जा सकता है कि महारावत सालिमसिंह के पास उस समय मेवाड़ राज्य की तरफ़ से दिया हुआ धरियावद का परगना विद्यमान था, जिसके कारण युद्ध के अवसर पर उसका महाराणा के पास अपनी सेना भेजना असंभव नहीं है। इसकी पुष्टि महाराणा अरिसिंह के वि० सं० १८२८ फाल्गुन वदि ६ (ई० स० १७७२ ता० २७ फरवरी) गुरुवार के महारावत सालिमसिंह के नाम के परवाने से भी होती है, जिसमें बादशाह फ़र्रुखसियर-द्वारा महारावत पृथ्वी- सिंह को 'रावत राव' की उपाधि मिलने का उल्लेख है³। उपर्युक्त परवाने से स्पष्ट है कि मेवाड़ के इस गृहकलह में महारावत सालिमसिंह, महाराणा अरिसिंह का सहायक था, इसी कारण से उसकी दी हुई सहायता के पुरस्कार में उक्त महाराणा ने उसके नाम यह परवाना भेज, महारावत का (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १५६६। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ६५८। (२) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १५७०-७१। मेरा उदयपुर राज्य का इति- हास; जि० २, पृ० ६५६। (३) देखो ऊपर पृ० २२४-५, टिप्पण संख्या १।