राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत सालिमसिंह २५३ सम्मान बढ़ाया । “वीरविनोद” के लेखक महामहोपाध्याय कविराजा श्या- मलदास ने इस विषय को अधिक स्पष्ट करने के लिए अपने बृहद् ग्रंथ में प्रतापगढ़ राज्य के इतिहास के प्रसङ्ग में निम्नलिखित उल्लेख किया है— “जब माधवराव सिंधिया ने उदयपुर को विक्रमी १८२५ ( हि० स० ११८२ = ई० स० १७६८ ) में जा घेरा, तब रावत सालिमसिंह भी अपनी सेना लेकर महाराणा अरिसिंह के पास गये और घेरा उठने के बाद तक मददगार रहे। इस खैरख्वाही के एवज़ में इनको महाराणा अरिसिंह ने धरियावद का परगना जागीर में दे दिया और 'रावत राव' का ख़िताब भी, जो बादशाह ने दिया था, इनके नाम पर बहाल रक्खा¹ ।” उपर्युक्त कथन से प्रत्यक्ष है कि मेवाड़ के गृहकलह के समय प्रतापगढ़ राज्य से केवल सेना ही नहीं, प्रत्युत् महारावत सालिमसिंह भी स्वयं उदयपुर के सिंधिया-द्वारा घेरे जाने पर महाराणा अरिसिंह की सहायतार्थ गया था और युद्ध के अवसर पर उसने वीरता प्रदर्शित की थी। संभव है कि उस समय के भी इतिहास के साधन पूरे न मिलने से “भीमविलास” के लेखक कवि कृष्ण अहाड़ा और कर्नल टॉड ने महारावत की सहायता का उल्लेख छोड़ दिया हो । महारावत सालिमसिंह का वि० सं० १८३१ कार्तिक वदि ७ ( ई० स० १७७४ ता० २६ अक्टोबर ) को देहांत होना पाया जाता है । महारावत का देहांत और उसके ग्यारह राणियां थीं², जिनमें से एक उसकी राणियां आदि कुन्दनकुंवरी आमझरा³ के राव लालसिंह की पुत्री और जसरूपसिंह की पौत्री थी । उक्त राणी के ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग; पृ० १०६४ । प्रतापगढ़ राज्य की कुछ ख्यातों में भी धरियावद का परगना मेवाड़ के गृहकलह के समय महारावत सालिमसिंह-द्वारा महाराणा अरिसिंह को सहायता देने के एवज़ में मिलने का उल्लेख है, परन्तु हमारे अनु- मान से धरियावद का परगना महारावत गोपालसिंह के समय मिला था । इस विषय के विस्तृत विवेचन के लिए देखो ऊपर पृ० २२४, टिप्पण संख्या १ तथा पृ० २४२ । ( २ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ८-६ । ( ३ ) आमझरा, दक्षिणी मालवे में गुजरात की सीमा से मिला हुआ वर्तमान