राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
महारावत सालिमसिंह २५३ सम्मान बढ़ाया । “वीरविनोद” के लेखक महामहोपाध्याय कविराजा श्या- मलदास ने इस विषय को अधिक स्पष्ट करने के लिए अपने बृहद् ग्रंथ में प्रतापगढ़ राज्य के इतिहास के प्रसङ्ग में निम्नलिखित उल्लेख किया है— “जब माधवराव सिंधिया ने उदयपुर को विक्रमी १८२५ ( हि० स० ११८२ = ई० स० १७६८ ) में जा घेरा, तब रावत सालिमसिंह भी अपनी सेना लेकर महाराणा अरिसिंह के पास गये और घेरा उठने के बाद तक मददगार रहे। इस खैरख्वाही के एवज़ में इनको महाराणा अरिसिंह ने धरियावद का परगना जागीर में दे दिया और 'रावत राव' का ख़िताब भी, जो बादशाह ने दिया था, इनके नाम पर बहाल रक्खा¹ ।” उपर्युक्त कथन से प्रत्यक्ष है कि मेवाड़ के गृहकलह के समय प्रतापगढ़ राज्य से केवल सेना ही नहीं, प्रत्युत् महारावत सालिमसिंह भी स्वयं उदयपुर के सिंधिया-द्वारा घेरे जाने पर महाराणा अरिसिंह की सहायतार्थ गया था और युद्ध के अवसर पर उसने वीरता प्रदर्शित की थी। संभव है कि उस समय के भी इतिहास के साधन पूरे न मिलने से “भीमविलास” के लेखक कवि कृष्ण अहाड़ा और कर्नल टॉड ने महारावत की सहायता का उल्लेख छोड़ दिया हो । महारावत सालिमसिंह का वि० सं० १८३१ कार्तिक वदि ७ ( ई० स० १७७४ ता० २६ अक्टोबर ) को देहांत होना पाया जाता है । महारावत का देहांत और उसके ग्यारह राणियां थीं², जिनमें से एक उसकी राणियां आदि कुन्दनकुंवरी आमझरा³ के राव लालसिंह की पुत्री और जसरूपसिंह की पौत्री थी । उक्त राणी के ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग; पृ० १०६४ । प्रतापगढ़ राज्य की कुछ ख्यातों में भी धरियावद का परगना मेवाड़ के गृहकलह के समय महारावत सालिमसिंह-द्वारा महाराणा अरिसिंह को सहायता देने के एवज़ में मिलने का उल्लेख है, परन्तु हमारे अनु- मान से धरियावद का परगना महारावत गोपालसिंह के समय मिला था । इस विषय के विस्तृत विवेचन के लिए देखो ऊपर पृ० २२४, टिप्पण संख्या १ तथा पृ० २४२ । ( २ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ८-६ । ( ३ ) आमझरा, दक्षिणी मालवे में गुजरात की सीमा से मिला हुआ वर्तमान
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उधर से कुंवर सामन्तसिंह का जन्म हुआ । महारावत के अन्य कुंवर रोड़सिंह, विजयसिंह, गजसिंह, महतावसिंह, लालसिंह तथा मयाकुंवरी और रूपकुंवरी नामक दो कन्याएं हुई थीं। उनमें से रोड़सिंह से महतावसिंह तक के चारों कुंवर बाल्य-काल में ही मृत्यु' को प्राप्त हुए और सामन्तसिंह तथा लालसिंह' उस (सालिमसिंह) की मृत्यु के पीछे विद्यमान थे । उस (सालिमसिंह) के समय के निम्नलिखित शिलालेख और ताम्रपत्र मिले हैं- ( १ ) वि० सं० १८१३ माघ सुदि १ ( ई० [महारावत के समय के] [शिलालेख, दानपत्र आदि] स० १७५७ ता० २० जनवरी ) की देवद और करा- इ़ठा गांव की कुंवर दौलतसिंह ( कल्याणपुरा ) के नाम की सनद, जिसमें सेवा के एवज़ देवद और कराइ़ठा गांव प्रदान करने और बदले में एक हज़ार रुपये वार्षिक खिराज जमा कराने का उल्लेख है । ( २ ) वि० सं० १८१४ भाद्रपद सुदि १२ ( ई० स० १७५७ ता० २६ अगस्त ) का व्यास हरिराम, खीमराम, नाथूराम और भवानीशंकर के नाम का ३० बीघा ज़मीन का ताम्रपत्र, जिसमें महारावत का उपर्युक्त व्यक्तियों को नीनोर गांव में ज़मीन देने का उल्लेख है । ( ३ ) वि० सं० १८१५ श्रावण सुदि १ ( ई० स० १७५८ ता० ४ अग- स्त ) की शाह सुंदर के नाम की सनद, जिसमें उसकी जागीर और मान-
झाबुआ राज्य के निकट एक राठोड़ राज्य था, जहां के स्वामी जोधपुर राज्य के स्वामी मालदेव के ज्येष्ठ पुत्र राम के वंशधर थे । मुग़ल साम्राज्य की अवनति के समय आम- झरा मरहटा-युद्ध का केन्द्र रहा और वहीं पर मालवा की रक्षार्थ मरहटी सेना से युद्ध करते हुए मालवा के सूबेदार राजा गिरधरबहादुर और दयाबहादुर मारे गये थे । तद- नन्तर उक्त राज्य सिंधिया का खिराजगुज़ार रहा और वि० सं० १६१४ ( ई० स० १८५७ ) के सिपाही विद्रोह में वहां का स्वामी बख़्तावरसिंह बाग़ी दल से मिल गया । इसपर अंग्रेज़ सरकार ने उसको गिरफ़्तार कर इंदौर में फांसी का दंड दिया और उक्त राज्य ज़ब्त कर सिंधिया ( ग्वालियर राज्य ) को दे दिया । ( १ ) लालसिंह के वंशज अरण्योद के स्वामी हैं ।
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मर्यादा बनी रहने का उल्लेख है । ( ४ ) वि० सं० १८१६ भाद्रपद वदि १४ ( ई० स० १७६२ ता० १८ अगस्त ) बुधवार की गांव अंबेली की पाडलिया शाह कपूरचंद के नाम की सनद, जिसमें अंबेली गांव राजकीय सेवा के एवज़ में प्रदान किये जाने का उल्लेख है । ( ५ ) वि० सं० १८१६ आश्विन सुदि १० ( ई० स० १७६२ ता० २७ सितंबर ) का नीनोर गांव के शिव-मंदिर का शिलालेख, जिसमें सात हज़ार पैंतीस रुपये के व्यय से वीसलनगरा नागर ब्राह्मण खीमज तथा हरनाथ-द्वारा व्यापार में लाभ होने पर महारावत सालिमसिंह के समय वह मंदिर बनवाये जाने का उल्लेख है । अपने पूर्वजों के समान ही महारावत सालिमसिंह उदार विचार का राजा था । उसने शाही दरबार में अपना प्रभाव बढ़ाया और प्रतापगढ़ महारावत का व्यक्तित्व : राज्य में टकसाल खोलने की इजाज़त प्राप्त की । फलतः महारावत के कुंवर सामंतसिंह के राज्य- काल में वादशाह शाहआलम (द्वितीय) के समय उक्त बादशाह के सन् जुलूस १५ में नवीन सिक्का ढलकर जारी हुआ, जो “सालिमशाही” नाम से प्रसिद्ध है । इस नवीन सिक्के के निर्माण से पाया जाता है कि प्रतापगढ़ राज्य उस समय मालवे के राज्यों में समृद्ध था और छोटा होने पर भी वहां का सिक्का आस-पास के बहुधा सब राज्यों-डूंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर, सीतामऊ, रतलाम, जावरा, ग्वालियर के मंदसोर परगने और टोंक के नींवाहेड़े परगने—में चलता था। यही नहीं अंग्रेज़ सरकार ने भी संधि के समय आवश्यकता पड़ने पर प्रतापगढ़ की टकसाल से सालिमशाही रुपये ढलवाकर दिये जाने की विशेष शर्त रक्खी । इससे उक्त राज्य का महत्त्व प्रकट होता है । महारावत के समय प्रतापगढ़ राज्य पर भी होल्कर का आक्रमण हुआ, परंतु वह अक्षुण्ण बना रहा । यह उक्त रावत की नीति-कुशलता का सूचक है। मालवा में उसका राज्य सिंधिया के इलाक़े से मिला हुआ होने पर भी उसने माधवराव का कुछ भी भय
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न कर मेवाड़ के गृह-कलह के समय स्वयं उदयपुर जाकर महाराणा अरिसिंह को सैनिक सहायता दी। यह भी उसके लिए गौरवप्रद बात है। वह नीति-कुशल, दानी और शांतिप्रिय शासक था। उसके समय राज्य के वैभव में अच्छी वृद्धि हुई। पड़ोस के इंदौर आदि राज्यों के साथ उसका संबंध अच्छा रहा। वि० सं० १८१८ और १८२० (ई० स० १७६१ और १७६३) में वहां होल्कर की चढ़ाइयां हुईं, पर अंत में सम्मानपूर्वक समझौता हो जाने से उसके राज्य की अधिक क्षति नहीं हुई। वह होल्कर के यहां किसी वैवाहिक कार्य के अवसर पर वि० सं० १८२४ (ई० स० १७६७) में इंदौर भी गया था; परंतु इसका वर्णन इंदौर राज्य के इतिहास में नहीं मिलता है, जिसका कारण यही हो सकता है कि वहां के इतिहास लेखकों ने ऐसी घटनाओं को उपयुक्त न समझ छोड़ दिया हो। उसने प्रतापगढ़ क़स्बे में अपने नाम से सालिमपुरा नामक मोहल्ला आबाद कर जनता के साथ किसी प्रकार की अनुचित छेड़-छाड़ न की जावे, इस दृष्टि से वहां पर पाषाण लेख खुदवाकर लगा दिया, जो प्रताप- गढ़ के सूरजपोल दरवाज़े के बाहर एक चबूतरे पर विद्यमान है। अपने नाम से उसने सालिमगढ़ गांव बसाया, जो वहां के प्रथम वर्ग के सरदारों का एक ठिकाना है। उसने देवलिया के दुर्ग का जीर्णोद्धार कराने के अति- रिक्त वहां एक महल और प्रतापगढ़ क़स्बे का प्राकार भी बनवाया एवं द्वारिका में अपनी तरफ़ से सदाव्रत जारी किया, जो उसकी धार्मिक रुचि और कृष्ण-भक्ति का परिचायक है।
सामन्तसिंह
महारावत सामन्तसिंह का जन्म वि० सं० १८२४ आश्विन सुदि १३ (ई० स० १७६७ ता० ५ अक्टूबर) को हुआ था और वह वि० सं० १८३१ कार्तिक वदि ७ (ई० स० १७७४ ता० २६ अक्टूबर) [राज्य-प्राप्ति] को सात वर्ष की आयु में प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी हुआ। उसकी बाल्यावस्था के कारण राजमाता कुंदनकुंवरी की
महारावत सामन्तसिंह
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महारावत सामन्तसिंह २५७ तत्त्वावधानता में शासन-कार्य शाह कपूर पाडलिया, महारावत का मामा सरदारसिंह, राघव बख्शी और शाह गुमान चलाते थे। यह ऊपर बतलाया जा चुका है कि उन दिनों प्रतापगढ़ के स्वामी के पास उदयपुर राज्य की तरफ़ से धरियावद् की जागीर थी, जिसके एवज़ में वहां से उदयपुर में सेवा के लिए सेना भेजनी पड़ती थी। सामन्तसिंह की बाल्यावस्था के कारण राजमाता ने उदयपुर में सेना भेजना बंद कर दिया और महारावत ने वय प्राप्त होने पर भी सेना भेजना जारी नहीं किया। उन दिनों उदयपुर राज्य की स्थिति भी अत्यंत कमज़ोर हो गई थी। वि० सं० १८२६ (ई० स० १७७३) में महाराणा अरिसिंह का देहांत होने पर उसके दोनों पुत्रों हम्मीरसिंह (दूसरा) और भीमसिंह के क्रमशः बालक अवस्था में महाराणा होने के कारण राज्यरक्षा के लिए राजपूत- सैनिकों की पूरी आवश्यकता रहती थी। ऐसी स्थिति में महारावत का अपनी सेना उदयपुर में सेवा के लिए न भेजना महाराणा और उसके मुसाहबों आदि को अखरने लगा। वि० सं० १८४० (ई० स० १७८४) में उदयपुर से महाराणा भीमसिंह अपना विवाह करने के लिए दूसरी बार ईडर गया। वहां से पीछा लौटते समय उक्त महाराणा ने डूंगरपुर पर घेरा डाल दिया और फिर वहां से वह बांसवाड़ा की तरफ़ रवाना हुआ। जब माही नदी के तट पर महाराणा की सेना का मुक़ाम हुआ तो बांसवाड़ा के स्वामी महारावल विजयसिंह ने गढ़ी के ठाकुर जोधसिंह की मार्फ़त तीन लाख रुपये दंड के भेजकर महाराणा से सुलह कर ली। उसी स्थान पर महारावत सामंतसिंह ने भी महाराणा की सेवा में अपने वकील के साथ तीन लाख रुपये भेज, धरियावद् की जागीर छोड़ देने का इक़रार लिख भेजा। इसपर महाराणा ने वहां से अपनी राजधानी की ओर प्रस्थान किया और धरियावद की जागीर महाराणा प्रतापसिंह (प्रथम) के वंशधर राणावत रघुनाथसिंह को प्रदान की¹, जिसके वंशजों का अब भी वहां अधिकार है। (१) प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में महारावत सामन्तसिंह-द्वारा धरियावद की ३३
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पेशवा बाजीराव बल्लाल के समय से ही मालवा के इलाके पर मर- हठों का आधिपत्य हो गया था । फिर बालाजी बाजीराव को उक्त सूबे पर [होल्कर का प्रतापगढ़ राज्य से खिराज स्थिर करना] अधिकार रखने की बादशाह की तरफ़ से सनद भी मिल गई, जिसपर उसने मालवा अपने सरदारों में बांट दिया; परंतु इसके पूर्व ही पेशवा तथा उसके सेनापतियों ने आतंक जमाकर मालवा तथा राजपूताने के राजाओं से चौथ की वसूली का सिलसिला शुरू कर दिया था । प्रतापगढ़ राज्य से चौथ की वसूली का स्वत्व होल्कर का रहा, किन्तु पेशवाओं के साथ महारावत गोपालसिंह की मित्रता होने से उसपर चौथ की बावत अधिक दबाव न पड़ा । विभिन्न ख्यातों के लेखों से पाया जाता है कि देव- लिया प्रतापगढ़ राज्य की ओर से पहले शाही दरबार में पंद्रह हज़ार रुपये वार्षिक खिराज के दिये जाते थे । बादशाहत की निर्बलता देख महा- रावत ने वह होल्कर को देना स्वीकार कर लिया था; किंतु होल्कर ने केवल पंद्रह हज़ार रुपये वार्षिक खिराज पर ही संतोष न किया और संभवतः महारावत सामन्तसिंह के समय में दबाव डाल वार्षिक ७२७२० रुपये सालिमशाही लेना स्थिर किया¹, जो अंग्रेज़ सरकार से संधि होने के पूर्व तक वहां से होल्कर को मिलते रहे ।
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जागीर छोड़ देने का उल्लेख तो इसी प्रकार मिलता है, परन्तु उनमें महाराणा को तीन लाख रुपये देने का वर्णन नहीं है । महाराणा भीमसिंह के समय अढ़ाड़ा कवि किशन ने 'भीमविलास'-नामक काव्य की रचना की । उसमें इस घटना का निम्नलिखित वर्णन है— ∙∙∙ऊपरि मुकाम तट महिय आय, घर बंसवार आतंक पाय । रावल विजेस करि मंत्र साम, कर जोध भेज त्रय लक्ख दाम । ताही मुकाम सामंत राव, भेजिय वकील महरान पाव । तिन सीस दंड मनमान थप्प, त्रय लक्ख दाम इक ठाम अप्प । छंडाय धरावद ग्राम लीन, रघुनाथ राव कहूं पटे दीन ∙∙∙॥२६॥ पृ० ११६ । ( १ ) के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० १६६ । माल्कम की
महारावत सामन्तसिंह २५६ निरन्तर उपद्रवों के कारण उस समय प्रतापगढ़ राज्य की स्थिति संतोषप्रद न थी और महारावत इतना अधिक वार्षिक खिराज होल्कर होल्कर सरकार को खिराज सरकार को देने में सर्वथा असमर्थ था । खिराज की रक़म न देने से बहुधा चढ़ भी जाया करता था, जिसकी वसूली कुंवर दीपसिंह का के लिए होल्कर को अपनी सेना भेजनी पड़ती थी, ओल में जाना जिससे राज्य को बहुत हानि होती थी और अंत में ज़ेवर, सामान, घोड़े आदि देकर किसी तरह होल्कर की सेना को विदा किया जाता था। एक बार होल्कर की सेना के खिराज की वसूली के लिए प्रतापगढ़ राज्य में जाने पर अर्थ-संकट होने से महारावत की तरफ़ से खिराज न दिया जा सका और कई दिन तक होल्कर की सेना प्रतापगढ़ को घेरे रही । अंत में जब तक खिराज की रक़म बेबाक न हो, तब तक के लिए महारावत ने अपने तेरह वर्ष के कुंवर दीपसिंह को होल्कर की ओलो में देना तय किया। फिर होल्कर की सेना दीपसिंह को लेकर इंदौर पहुंची। दो-तीन वर्ष तक उक्त कुंवर होल्कर सरकार के यहां ओल में रहा । फिर वहां से विदा मिलने पर वह प्रतापगढ़ लौटा¹ । होल्कर सरकार का प्रतापगढ़ राज्य से खिराज का संबंध हो जाने से सिंधिया सरकार का प्रतापगढ़ राज्य से खिराज आदि का कोई प्रत्यक्ष सिंधिया की सेना का प्रताप- संबंध नहीं रहा था, परंतु उन दिनों भारत में 'जिस- गढ़ को घेरना की लाठी उसकी भैंस' वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी और न्याय तथा अन्याय का विचार न कर
"रिपोर्ट ऑन दि प्राविंस ऑव् मालवा एंड एडज्वाइर्निंग डिस्ट्रिक्ट्स" (पृ० २२५) में होल्कर का ७५००० रुपये सालिमशाही वार्षिक खिराज लेने का उल्लेख है। "वीरविनोद" (द्वितीय भाग, पृ० १०६५) में मलहारराव होल्कर का महारावत पर दबाव डाल खिराज की रक़म ७२००० रुपये स्थिर करने का ही उल्लेख है। मलहारराव की मृत्यु वि० सं० १८२३ (ई० स० १७६६) में हुई । उस समय प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी महारावत सालिमसिंह था। ऐसी अवस्था में महारावत सालिमसिंह के समय ही उपर्युक्त रक़म स्थिर होना मानना पड़ेगा । (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६५ ।
२६० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास सबल निर्बल को दबाने में कुछ भी संकोच नहीं करता था। ऐसे समय में सिंधिया का एक सेनापति जग्गु बापू सेना लेकर प्रतापगढ़ पर चढ़ गया और उसने वहां घेरा डाल दिया। इस अवसर पर कुंवर दीपसिंह ने सिंधिया की सेना का वीरतापूर्वक मुक़ाबला किया, जिससे सिंधिया की सेना का एक अफ़सर मारा गया। बीस दिन तक सिंधिया की सेना का वहां घेरा रहा और जब जग्गु बापू को प्रतापगढ़ राज्य से कुछ भी रुपया मिलने की आशा न दीख पड़ी तो वह वहां से लौट गया¹। मरहटे अफ़सरों की लूट-खसोट और आर्थिक शोषण की नीति से प्रतापगढ़ राज्य का भी अधिकतर भाग ऊजड़ हो गया था। धनी-मानी व्यक्तियों पर तो और भी अधिक विपत्ति थी तथा [हाशिया: अंग्रेज़ सरकार के साथ महारावत की प्रथम संधि] उनका इस अराजकता के युग में कोई रक्षक न था। प्रतापगढ़ राज्य में भी चारों तरफ़ दरिद्रता का निवास हो गया और आय के साधन बंद हो जाने से राज्य सम्बन्धी साधारण व्यय का चलना भी कठिन हो गया तथा खिराज की रक़म भी बराबर न पहुंचने लगी। परिणाम स्वरूप होल्कर सरकार द्वारा प्रताप- गढ़ राज्य में भी लूट-मार का बाज़ार गर्म रहा। इन कारणों से राजपूत राज्यों और मरहटे सरदारों के बीच पूरी शत्रुता उत्पन्न हो गई। मरहटे सरदारों की अनुदार नीति से वीरवर शिवाजी का संस्थापित मरहटा साम्राज्य, जिसकी उन्नति बुद्धिमान पेशवाओं द्वारा हुई थी, छिन्न-भिन्न होने लगा और उनमें परस्पर फूट उत्पन्न हो गई। पेशवा के सैनिक अफ़सरों में गायकवाड़, सिंधिया और होल्कर बड़े शक्तिशाली थे। उन्होंने अवसर पाते ही पेशवा की अधीनता से मुख मोड़कर अपनी जागीरों को स्वतंत्र राज्य का रूप दे दिया। उनकी देखा-देखी पेशवा के अन्य सैनिक अफ़सर परमार (धारवाला) आदि भी स्वतंत्र हो गये और उन्होंने जिस तरह हो सके रुपया वसूल करने की नीति से मध्यभारत और राजपूताने के राज्यों को सैनिक अड्डा बना लिया तथा वे वहां से अत्याचारपूर्वक रुपये वसूल करने ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६५ ।
महारावत सामन्तसिंह २६१ लगे। उनमें से सिंधिया का प्रभाव तो उस समय बहुत बढ़ा हुआ था और दिल्ली के नाम मात्र के बादशाह शाह आलम का जीवन भी सिंधिया के दिये हुए धन पर ही अवलंबित था। वह समय केवल राजपूताना में ही नहीं वरन् भारतवर्ष भर में पूर्ण अशांति का था और चारों तरफ़ लूट-खसोट और अत्याचार का बाज़ार गर्म था। राजपूताना के राज्यों में अंग्रेज़ सरकार से संधि होने के पूर्व होल्कर और सिंधिया का बड़ा ज़ोर था और समय-समय पर उनके आक्रमणों से राजपूताना के तीन प्रधान राज्यों उदयपुर, जयपुर और जोधपुर की बड़ी दुर्दशा हुई थी। उन दिनों शक्तिशाली अंग्रेज़ जाति के पैर भारत में अच्छी तरह जम गये थे। उनकी सैनिक शक्ति और नीति-युक्त शासन-प्रणाली से मरहटे अफ़सर भी उनको युद्ध में अजेय मानकर अपने बचाव का मार्ग ढूंढ़ने लगे। अंग्रेज़ सरकार से जसवंतराव होल्कर का युद्ध छिड़ जाने पर उसको निरंतर हार खानी पड़ी। अंत में जसवन्तराव होल्कर का घमंड नष्ट करने का अंग्रेज़ सरकार ने दृढ़ संकल्प कर लिया। महारावत सामन्तसिंह ने भी अपने दुःखों से त्राण पाने का यह उपयुक्त अवसर समझा, क्योंकि होल्कर आदि के जुल्म से उसका राज्य भी जर्जर हो गया था। उसने अंग्रेज़ सरकार के संरक्षण में जाने का विचार कर वि० सं० १८६१ (ई० स० १८०४) में संधि का प्रस्ताव किया। गुजरात और मालवा के अंग्रेज़ सेनापति कर्नल मरे-द्वारा संधि की बातचीत तय होकर ता० २५ नवंबर (मार्गशीर्ष वदि ८) को दोनों के बीच आठ शर्तों का निम्नलिखित संधिपत्र लिखा गया— शर्त पहली—जसवंतराव होल्कर की अधीनता तथा बड़प्पन को राजा सब प्रकार से अस्वीकार करते हैं। शर्त दूसरी—राजा प्रतिज्ञा करते हैं कि वे जितना खिराज पहले जसवंतराव होल्कर को देते थे, उतना अंग्रेज़ सरकार को दिया करेंगे और यह खिराज उस समय दिया जायगा, जब सम्माननीय गवर्नर जनरल इसके वसूल किये जाने की आज्ञा देना उचित समझेंगे।
२६२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास शर्त तीसरी-राजा अंग्रेज़ सरकार के शत्रुओं को अपना शत्रु सम- झेंगे और वे प्रतिज्ञा करते हैं कि उन्हें अपने इलाक़े में रहने न देंगे। शर्त चौथी-सारी अंग्रेज़ी सेना और उसके लिए प्रत्येक प्रकार का सामान बिना रोक-टोक तथा महसूल के राजा के इलाक़े में होकर गुज़रेगा। इसके अतिरिक्त राजा प्रतिज्ञा करते हैं कि वे हर प्रकार से उसकी सहा- यता और रक्षा करेंगे। शर्त पांचवीं-राजा के इलाक़े से मल्हारगढ़ में पांच हज़ार मन चावल, दो हज़ार मन चना और तीन हज़ार मन ज्वार दी जायगी, जिसे सौंप देने पर अंग्रेज़ सरकार उचित मूल्य देगी, जिसका आधा तो चौदह और बाकी अट्ठाइस दिनों में चुका दिया जायगा। शर्त छठी-इस विश्वास से कि राजा ऊपर लिखी हुई शर्तों पर पूरी तरह से अमल करेंगे अंग्रेज़ी सेना का अफ़सर कर्नल मरे प्रतिज्ञा करता है कि न तो वह स्वयं कोई सहायता रुपये, मवेशी या ग़ल्ले की लेगा और न अंग्रेज़ी सेना के जत्थों को, जो उनके अधीन होंगे, ऐसा करने देगा। शर्त सातवीं-राजा इक़रार करते हैं कि अंग्रेज़ी सेना में सिक्के की आवश्यकता होने पर, उसके अफ़सर जितनी चांदी भेजेंगे, उसका सिक्का प्रतापगढ़ की टकसाल से तैयार करके वे भेज देंगे। उसका उचित व्यय अंग्रेज़ सरकार देगी। शर्त आठवीं-यह संधिपत्र शीघ्र मान्यवर गवर्नर-जनरल के हस्ताक्षर के लिए भेजा जायगा, किन्तु उपर्युक्त शर्तों का पालन हस्ताक्षर होकर आने तक अंग्रेज़ सरकार के अफ़सर और राजा को उचित और आवश्यक होगा। उपर्युक्त संधिपत्र चंबल नदी के किनारे अंग्रेज़ सरकार की सेना के अफ़सर कर्नल मरे के कैम्प में तय होकर लिखा गया, परंतु तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड कॉर्नवालिस की देशी राज्यों के प्रति उदासीनता की नीति के कारण स्वीकृत नहीं हुआ१ और चौदह वर्ष तक प्रतापगढ़ राज्य (१) एचिसन; ट्रीटीज़ एंगेजमेंट्स एण्ड सनद्ज़; जि० ३, पृ० ४५८-६०।
: महारावत सामन्तसिंह २६३ फिर दुःख-सागर में गोते खाता रहा। वि० सं० १८६५ मार्गशीर्ष वदि ५ (ई० स० १८०८ ता० ८ नवंबर) को महारावत के कुंवर दीपसिंह की भिणायवाली कुंवराणी के उदर से भंवर केसरीसिंह और दल- भंवर केसरीसिंह¹ और मार्गशीर्ष सुदि ६ (ता० २६ पतसिंह का जन्म नवंबर) शनिवार को फ़तहगढ़ (किशनगढ़ राज्य)- वाली कुंवराणी के उदर से भंवर दलपतसिंह² का जन्म हुआ। एक ही महीने में भिन्न-भिन्न कुंवराणियों के उदर से दो पौत्र उत्पन्न होने का समाचार सुनकर महारावत के हर्ष का पारावार न रहा और इस अवसर पर उसने अपने राज्य की स्थिति के अनुसार बहुत कुछ उदारता प्रकट की। लार्ड हेस्टिंग्ज़ के समय अंग्रेज़ सरकार की नीति में परिवर्त्तन (१) कविराजा बांकीदास; ऐतिहासिक बातें; संख्या २५७३। (२) वही; संख्या २५७४। प्रतापगढ़ राज्य से प्राप्त बड़वे की ख्यात में भंवर केसरीसिंह का कोठारिया (मेवाड़) के सरदार रावत सामन्तसिंह की पुत्री और संग्रामसिंह की पौत्री रत्नकुंवरी से उत्पन्न होना बतलाया है तथा ऐसा ही प्रतापगढ़ राज्य से आई हुई प्राचीन ख्यात में भी लिखा है; परन्तु कोठारिया के सरदारों में सामन्तसिंह नामक कोई व्यक्ति नहीं हुआ। संग्रामसिंह कोठारिया का रावत अवश्य हुआ था, जो महारावत सामन्तसिंह का सम- कालीन था। संभव है सामन्तसिंह उसका कुंवर हो, पर हमारे संग्रह में कोठारिया के स्वामियों की जो वंशावली है, उसमें संग्रामसिंह के पीछे मुहकमसिंह का नाम दिया है, जो उस (संग्रामसिंह) की मृत्यु के बाद वहां का रावत हुआ था। उपर्युक्त ख्यातों में कुंवर दीपसिंह का भिणाय (अजमेर) के इस्तमरारदार राजा उदयभाण की पुत्री और दलेल- सिंह की पौत्री राजकुंवरी से भी विवाह होना लिखा है। ऐसी अवस्था में केसरीसिंह का भिणायवाली कुंवराणी के उदर से अथवा कोठारियावाली कुंवराणी के उदर से जन्म हुआ, इसका निर्णय होना कठिन है। बड़वा भाटों की ख्यातों में कई स्थल पर उन्नीसवीं शताब्दी तक के वृत्तान्तों में विभिन्नता पाई जाती है। केसरीसिंह के भिणाय ठिकाने का भागिनेय होने का कथन हीं विश्वसनीय मानना पड़ेगा, क्योंकि कविराजा बांकीदास ने यह संग्रह अपने जीवनकाल में लिखा था और वह महारावत सामन्तसिंह का सम- कालीन भी था।
२६४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास होकर देशी राज्यों को अंग्रेज़ सरकार के संरक्षण में लेना निश्चित हुआ अंग्रेज़ सरकार के साथ और मालवा तथा गुजरात से मिले हुए राज्यों से दूसरी संधि संधि करने का कार्य सर जॉन मालकम को सौंपा गया । महारावत सामन्तसिंह ने अपनी तरफ़ से पंडित रामचंद्र भाऊ को पूरे अधिकार के साथ संधि की बातचीत करने के लिए नीमच भेजा । अंत में कप्तान कॉल्फ़ील्ड और रामचंद्र भाऊ-द्वारा संधि की शर्तें तय होकर ई० स० १८१८ ता०५ अक्टोबर (वि० सं० १८७५ आश्विन सुदि ६ ) को नीचे लिखा संधिपत्र लिखा गया— शर्त पहली—राजा इक़रार करते हैं कि उनका दूसरे राज्यों के साथ जो ( राजनैतिक ) संबंध है, उसको वे त्याग देंगे और यथा संभव अंग्रेज़ सरकार की अधीनता करते रहेंगे । इसके एवज़ में अंग्रेज़ सरकार स्वीकार करती है कि वह उन्हें अपने राज्य में सुव्यवस्था स्थापित करने में सहायता देगी और अन्य राज्यों के दावों तथा ज्यादतियों से उनकी रक्षा करेगी । शर्त दूसरी—राजा इक़रार करते हैं कि वे कुल बाक़ी खिराज, जो मल्हारराव होल्कर को देना वाजिब है और जिसकी तादाद एक लाख चौबीस हज़ार छःसौ सत्तावन रुपये छःआने होती है, नीचे लिखे अनुसार अंग्रेज़ सरकार को देंगे— पहले वर्ष ई० स० १८१८-१६, हि० स० १२३४, वि० सं० १८७५ रु० १०००० दूसरे वर्ष ... ... ... रु० १५००० तीसरे वर्ष ... ... ... रु० २०००० चौथे वर्ष ... ... ... रु० २५००० पांचवें वर्ष ... ... ... रु० २५००० छठे वर्ष ... ... ... रु० २९६५७-६ आने राजा यह भी स्वीकार करते हैं कि ऊपर लिखी हुई रक़म अदा न होने की अवस्था में अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से एक प्रतिनिधि नियत होगा, जो प्रतापगढ़ शहर की चुंगी ( सायर ) की आय से उसे वसूल करेगा ।
महारावत सामन्तसिंह २६५ शर्त तीसरी-देवलिया प्रतापगढ़ के राजा अपनी और अपने वारिसों की ओर से प्रतिज्ञा करते हैं कि वे अंग्रेज़-सरकार को अपनी रक्षा के एवज़ में इतना खिराज और नज़राना देंगे, जितना वे अब तक मल्हार राव होल्कर को दिया करते थे। यह खिराज नीचे लिखे अनुसार अदा किया जायगा- प्रथम वर्ष ई० स० १८१८-१६, हि० स० १२२६, वि० सं० १८७५ रु० ३५००० द्वितीय वर्ष ... ... ... रु० ४५००० तृतीय वर्ष ... ... ... रु० ५५००० चतुर्थ वर्ष ... ... ... रु० ६५००० पांचवें वर्ष खिराज की पूरी रक़म अर्थात् ७२७०० रुपये सालिम- शाही, दो किश्तों में अदा की जायगी। आधी माघ तथा आधी जेठ अर्थात् मार्च और जुलाई में । शर्त चौथी-राजा यह भी स्वीकार करते हैं कि वे अरबों और मकरानियों को नौकर न रक्खेंगे, पर वे पचास सवार और दो सौ सैनिक प्रतापगढ़ इलाक़े के निवासियों में से नौकर रक्खेंगे। जब कभी प्रतापगढ़ इलाक़े के समीप इन सवारों और पैदल सेना की आवश्यकता होगी, तब ये अंग्रेज़ सरकार की सेवा में रख दिये जावेंगे। शर्त पांचवीं-प्रतापगढ़ के राजा अपने राज्य के स्वामी रहेंगे और लुटेरी जातियों का दमन करने एवं पुनः शांति एवं सुशासन स्थापित करने के अतिरिक्त उनके प्रबंध में अंग्रेज़ सरकार कभी हस्तक्षेप न करेगी। राजा इक़रार करते हैं कि वे अंग्रेज़ सरकार की राय पर चलेंगे और अपने देश में टकसाल या सौदागरों तथा व्यापार की वस्तुओं पर कोई अनुचित कर न लगावेंगे। शर्त छठी-अंग्रेज़ सरकार इक़रार करती है कि वह प्रतापगढ़ के राजा के उन बंधु-बांधवों या संबंधियों की सहायता न करेगी जो उनकी आज्ञा न मानेंगे, बल्कि उनका दमन करने में राजा को सहायता देगी। शर्त सातवीं-अंग्रेज़ सरकार इक़रार करती है कि वह मीनों, भीलों आदि के दमन करने में राजा की सहायता करेगी। ३४
२६६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास शर्त आठवीं— अंग्रेज़ सरकार प्रतिज्ञा करती है कि वह राजा के प्रजा-संबंधी उचित तथा पुराने दावों में, जो प्राचीन प्रथा के अनुकूल होंगे, हस्तक्षेप न करेगी । शर्त नवीं— अंग्रेज़ सरकार इकरार करती है कि वह राजा के उन प्रजा-संबंधी स्वत्वों को, जो वाजिब होंगे और जिन्हें वे खुद हासिल न कर सकेंगे, प्राप्त करने में उनकी सहायता करेगी। शर्त दसवीं—यदि पड़ोस की किसी रियासत या आस-पास के ठाकुरों पर प्रतापगढ़ राज्य का कोई उचित दावा होगा तो अंग्रेज़ सरकार प्रतिज्ञा करती है कि वह उसको हासिल कराने या उसका फ़ैसला कराने में उन्हें अपनी ओर से मदद देगी । उनके तथा ऐसे राजाओं के बीच यदि कोई विरोध या झगड़ा पैदा होगा तो वह उसका निपटारा करने के लिए मध्यस्थ भी बनेगी । शर्त ग्यारहवीं— अंग्रेज़ सरकार इक़रार करती है कि वह खैरात की ज़मीन के मामलों में दखल न देगी और हमेशा राजा तथा प्रजा के धार्मिक रस्मों और दस्तूरों का पूरा लिहाज़ रक्खेगी । शर्त बारहवीं— इस संधिपत्र की तीसरी शर्त में राजा ने वादा किया है कि वे अंग्रेज़ सरकार को खिराज दिया करेंगे और इत्मीनान के लिए इक़रार करते हैं कि वे खिराज उस व्यक्ति को दे देंगे, जो उसे वसूल करने के लिए अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से नियत होगा और यदि उसके अदा होने में कोई ग़फ़लत होगी तो राजा मंजूर करते हैं कि अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से एक कार्यकर्त्ता मुक़र्रर किया जाय, जो प्रतापगढ़ शहर की चुंगी की आय से खिराज वसूल करे । यह अहदनामा, जिसमें बारह शर्तें दर्ज हैं, आज के दिन आनरेवल कम्पनी की ओर से ब्रिगेडियर-जेनरल सर माल्कम, के० सी० वी०, के० एल० एस०, की आज्ञानुसार कप्तान जेम्स कॉल्फ़ील्ड और देवलिया- प्रतापगढ़ के राजा सामन्तसिंह की ओर से रामचन्द्र भाऊ-द्वारा तय हुआ। कप्तान कॉल्फ़ील्ड ने अंग्रेज़ी, फ़ारसी तथा हिन्दी में इसकी एक नक़ल
महारावत सामन्तसिंह २६७ करा और उसपर अपनी मुहर तथा हस्ताक्षर करके उस(रामचन्द्र भाऊ)- को इसलिए दिया है कि वह उसे देवलिया-प्रतापगढ़ के राजा के पास भेज दे और रामचन्द्र भाऊ ने उसकी एक नक़ल अपने दस्तख़त तथा मुहर के साथ उक्त कप्तान को दी है। कप्तान कॉलफ़ील्ड इक़रार करता है कि माननीय गवर्नर जेनरल के तस्दीक़ किये हुए अहदनामे की एक प्रति, जो उस अहदनामे की जिसे अभी उसने स्वयं तैयार किया है अक्षरशः नक़ल होगी, दो महीने के अरसे में रामचंद्र भाऊ को इसलिए दी जायगी कि वह उसे देवलिया प्रतापगढ़ के राजा सामंतसिंह को दे और राजा को वह प्रति सौंप दी जाने पर ब्रिगेडियर-जेनरल सर जॉन माल्कम, के० सी० बी०, के० एल० एस०, की आज्ञा से कप्तान कॉलफ़ील्ड-द्वारा तैयार किया हुआ अहदनामा लौटा दिया जायगा। इसी प्रकार रामचंद्र भाऊ प्रतिज्ञा करता है कि उक्त अहदनामे की दूसरी प्रति, जिसपर देवलिया प्रतापगढ़ के राजा सामन्तसिंह का हस्ताक्षर होगा और जो उस अहदनामे की, जिसको रामचंद्र भाऊ ने स्वयं तैयार किया है, अक्षरशः नक़ल होगी, आज की तारीख़ से आठ दिन के अरसे में कप्तान काल्फ़ील्ड को दी जायगी, ताकि वह उसको माननीय गवर्नर जेनरल के सुपुर्द कर दे। ऐसा होने पर वह अहदनामा, जिसे रामचंद्र भाऊ ने, जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है अपने प्राप्त किये हुए अधिकार के अनुसार तैयार किया है, वापस कर दिया जायगा। आज ५ वीं अक्टोबर ई० स० १८१८ ता० ४ ज़िलहिज हि० स० १२३३ तदनुसार आसोज सुदि ६ वि० सं० १८७५ को तैयार हुआ। (दस्तखत) हेस्टिंग्ज़ ,, जी० डॉड्सवेल ,, जे० स्टूअर्ट ,, सी० एम० रिकेट्स आज ७ वीं नवम्बर ई० स० १८१८ (वि० सं० १८७५ कार्तिक सुदि १०) को फ़ोर्ट विलियम (कलकत्ता) में हिज़ एक्सेलेंसी मोस्ट नोबल
२६८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास गवर्नर-जेनरल ने कौंसिल में तस्दीक़ की¹ । (दस्तखत) जे० एडम, गवर्नमेंट का चीफ़ सेक्रेटरी अंग्रेज़ सरकार और देवलिया प्रतापगढ़ राज्य के बीच की यह संधि सूखती हुई कृषि के लिए वर्षा के समान लाभदायक सिद्ध हुई । प्रजा में नवजीवन का संचार हुआ। कृषि-जीवी तथा अन्य प्रतापगढ़ राज्य की आर्थिक व्यवसायी जन, जो उपद्रवों के कारण बाहर चले स्थिति में उन्नति होना गये थे, पुनः अपने देश में आकर बस गये, जिससे चारों तरफ़ खेती लहलहाने लगी। संधि होने के पूर्व इस राज्य की औसत आमदनी दो लाख रुपये थी। संधि होने के वर्ष ही आय में बयालीस हज़ार रुपये और दूसरे वर्ष लगभग पचासी हज़ार रुपये की वृद्धि हुई² । डूंगरपुर का महारावल जसवंतसिंह (दूसरा) दुर्बल-हृदय शासक था। उसके कोई कुंवर न था। निरन्तर विपत्तियों से ग्रसित रहने के कारण युवावस्था में ही उसको शासन-कार्य से दलपतसिंह का डूंगरपुर उदासीनता हो गई और अपना अपुत्र होना गोद जाना खटकने लगा । उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ के नरेश एक ही वंश के हैं, परंतु उदयपुर और प्रताप- गढ़ डूंगरपुर से पीढ़ियों में बहुत दूर जाकर मिलते हैं । प्रचलित रीति के अनुसार आवश्यकता के समय अपने समीपी बंधु-बांधवों में से ही दत्तक पुत्र ग्रहण किया जाता है। इसके विपरीत महारावल ने अपनी अविवेकता और अस्थिर-चित्तता के कारण प्रतापगढ़ के स्वामी सामंतसिंह के द्वितीय पौत्र दलपतसिंह को अपना दत्तक पुत्र बनाया³, (१) एचिसन; ट्रीटीज़ एंगेजमेंट्स ऐंड सनद्ज़; जि० ३, पृ० ४६०-६३ । (२) माल्कम; रिपोर्ट ऑन् दि प्रॉविंस ऑव् मालवा एंड दि एड्जॉइनिंग डिस्ट्रिक्ट्स; पृ० ३३४ । (३) प्रतापगढ़ राज्य से प्राप्त राजकीय पत्रादि से पाया जाता है कि वि० सं० १८७७
महारावत सामन्तसिंह २६६ जिसको अंग्रेज़-सरकार ने भी स्वीकार कर लिया । इसका कारण यही हो सकता है कि डूंगरपुर के राज-कुटुंब में उस समय योग्य पुरुष का अभाव था और दलपतसिंह में बाल्यकाल से ही प्रतिभा विद्यमान थी । अंग्रेज़ सरकार से संधि होने के पीछे प्रतापगढ़ राज्य बाहरी आक- मणों से तो सुरक्षित हो गया, परंतु भीतरी उपद्रव; भील, मीणों आदि दुर्दम- नीय लोगों की लूट-खसोट या ग़ारतगिरी आदि से सेना-व्यय के एवज़ अंग्रेज़- सरकार को नक़द रुपये देने का क़रार होना मुक्त न था । ऐसे उपद्रवों को मिटाकर शांति स्था- पित करने के लिए सैनिक शक्ति की आवश्यकता ( ई० स० १८२० ) में महारावल जसवन्तसिंह ( दूसरा ) देवलिया आया, तब वह युवा था, तो भी उसने महारावत सामन्तसिंह से भंवर दलपतसिंह को अपने गोद देने - के लिए आग्रह किया। इसपर कई शर्तों के साथ दलपतसिंह डूंगरपुर गोद दे दिया गया, जिसको अंग्रेज़ सरकार के पोलिटिकल अफ़सरों ने भी स्वीकार किया । वि० सं० १८७८ ( ई० स० १८२१ ) में सर जॉन माल्कम उदयपुर गया, उस समय वहां के महाराणा भीमसिंह ने इस गोदनशीनी को ठीक नहीं बतलाया । इसपर उस (सर जान माल्कम)- ने उत्तर दिया कि मैं इतिहास से वाक़िफ़ न था, इसलिए ऐसा हुआ, परन्तु अब यह बात बदली नहीं जा सकती । इससे पाया जाता है कि वि० सं० १८७७ ( ई० स० १८२० ) के आसपास ही दलपतसिंह की गोदनशिनी की बात तय हो चुकी थी, अत- एव उस समय के बाद ही दलपतसिंह का डूंगरपुर में आना-जाना शुरू हुआ होगा और वि० सं० १८८१ से वह वहां स्थायी रूप से रहने लगा । डूंगरपुर राज्य से महारावल जसवन्तसिंह ( दूसरा ) की जन्मपत्री और वर्ष- फल प्राप्त हुए हैं। उनसे पाया जाता है कि उसका जन्म आषाढादि वि० सं० १८४५ शाके १७२१ ( चैत्रादि वि० सं० १८४६ ) अमांत वैशाख वदि १० उपरांत ११, (पूर्णिमांत ज्येष्ठ वदि १० उपरांत ११ = ई० स० १७६६ ता० २६ मई) बुधवार, उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र उपरांत रेवती को हुआ था। अतएव वि० सं० १८७७ में उक्त महा- रावल की आयु २१ वर्ष से अधिक नहीं हो सकती । अभिप्राय यह कि जसवन्तसिंह ने अपनी २१ वर्ष की आयु में ही दलपतसिंह को, जब कि वह केवल १२ वर्ष का था, अपना दत्तक बना लिया था। इतनी अल्प आयु में ही उस(जसवन्तसिंह)का दलपतसिंह को अपना उत्तराधिकारी बनाना निश्चय ही एक प्रकार का भ्रांति-मूलक विचार ही कहा जायगा ।
२७० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास थी। अतएव अंग्रेज़ सरकार की अध्यक्षता में सेना रखना निश्चय होकर वि० सं० १८८० मार्गशीर्ष सुदि ७ ( ई० स० १८२३ ता० ६ दिसंबर ) को संधिपत्र की तीसरी शर्त के अनुसार पचास सवार और दो सौ पैदल सेना रखने के एवज़ में १२[०००] रुपये सालिमशाही वार्षिक देने और वि० सं० १८८३ ( ई० स० १८२६-२७) से चौबीस हज़ार रुपये देते रहने का अंग्रेज़ सरकार के साथ कप्तान ए० मेकडॉनल्ड-द्वारा नीचे लिखा इक़रार- नामा हुआ- अहदनामे में दो सौ पैदल और पचास सवार दर्ज हैं, उनके खर्चे के लिए नियत किश्तों में एक हज़ार रुपये माहवार अर्थात् बारह हज़ार रुपये वार्षिक सरकार को दिये जायंगे। वि० सं० १८८३ ( ई० स० १८२६-७) से दो हज़ार रुपये माहवार अर्थात् चौबीस हज़ार रुपये वार्षिक कंपनी की सरकार को दिये जायेंगे और इससे विपरीत कभी न होगा। रुपये सालिमशाही होंगे १ । उपर्युक्त इक़रारनामे से प्रतापगढ़ राज्य पर चौबीस हज़ार रुपये वार्षिक का बोझ और भी बढ़ गया, जिसको देने में वह समर्थ न था। फिर भी वह किसी प्रकार खिराज आदि नियमित रूप से देकर अपने ऊपर ऋण न बढ़ने देता था। अन्त में वि० सं० १८४७ ( ई० स० १८४० ) में महारावत सामन्तसिंह के पौत्र दलपतसिंह के ( जब कि वह अपने बड़े भ्राता केसरीसिंह की मृत्यु हो जाने के कारण प्रतापगढ़ का भी भावी स्वामी मान लिया गया था ) अंग्रेज़ सरकार से लिखा-पढ़ी करने पर प्रतापगढ़ राज्य को इस बोझ के उठाने में असमर्थ देख इस अहदनामे को मंसूख कर दिया गया २ । महारावत सामंतसिंह ने अंग्रेज़ सरकार से संधि होने के पीछे अपनी वृद्धावस्था का विचार कर राज्य-कार्य अपने कुंवर दीपसिंह को ( १ ) एचिसन; ट्रीटीज़ एंगेजमेंट्स एण्ड सनद्ज़; जि० ३ पृ० ४६३ । ( २ ) एचिसन; ट्रीटीज़ एंगेजमेंट्स एण्ड सनद्ज़; जि० ३, पृ० ४४२ ।