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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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२५६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास


न कर मेवाड़ के गृह-कलह के समय स्वयं उदयपुर जाकर महाराणा अरिसिंह को सैनिक सहायता दी। यह भी उसके लिए गौरवप्रद बात है। वह नीति-कुशल, दानी और शांतिप्रिय शासक था। उसके समय राज्य के वैभव में अच्छी वृद्धि हुई। पड़ोस के इंदौर आदि राज्यों के साथ उसका संबंध अच्छा रहा। वि० सं० १८१८ और १८२० (ई० स० १७६१ और १७६३) में वहां होल्कर की चढ़ाइयां हुईं, पर अंत में सम्मानपूर्वक समझौता हो जाने से उसके राज्य की अधिक क्षति नहीं हुई। वह होल्कर के यहां किसी वैवाहिक कार्य के अवसर पर वि० सं० १८२४ (ई० स० १७६७) में इंदौर भी गया था; परंतु इसका वर्णन इंदौर राज्य के इतिहास में नहीं मिलता है, जिसका कारण यही हो सकता है कि वहां के इतिहास लेखकों ने ऐसी घटनाओं को उपयुक्त न समझ छोड़ दिया हो। उसने प्रतापगढ़ क़स्बे में अपने नाम से सालिमपुरा नामक मोहल्ला आबाद कर जनता के साथ किसी प्रकार की अनुचित छेड़-छाड़ न की जावे, इस दृष्टि से वहां पर पाषाण लेख खुदवाकर लगा दिया, जो प्रताप- गढ़ के सूरजपोल दरवाज़े के बाहर एक चबूतरे पर विद्यमान है। अपने नाम से उसने सालिमगढ़ गांव बसाया, जो वहां के प्रथम वर्ग के सरदारों का एक ठिकाना है। उसने देवलिया के दुर्ग का जीर्णोद्धार कराने के अति- रिक्त वहां एक महल और प्रतापगढ़ क़स्बे का प्राकार भी बनवाया एवं द्वारिका में अपनी तरफ़ से सदाव्रत जारी किया, जो उसकी धार्मिक रुचि और कृष्ण-भक्ति का परिचायक है।

सामन्तसिंह

महारावत सामन्तसिंह का जन्म वि० सं० १८२४ आश्विन सुदि १३ (ई० स० १७६७ ता० ५ अक्टूबर) को हुआ था और वह वि० सं० १८३१ कार्तिक वदि ७ (ई० स० १७७४ ता० २६ अक्टूबर) [राज्य-प्राप्ति] को सात वर्ष की आयु में प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी हुआ। उसकी बाल्यावस्था के कारण राजमाता कुंदनकुंवरी की