राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 310, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ें- महारावत सालिमसिंह २५५
मर्यादा बनी रहने का उल्लेख है । ( ४ ) वि० सं० १८१६ भाद्रपद वदि १४ ( ई० स० १७६२ ता० १८ अगस्त ) बुधवार की गांव अंबेली की पाडलिया शाह कपूरचंद के नाम की सनद, जिसमें अंबेली गांव राजकीय सेवा के एवज़ में प्रदान किये जाने का उल्लेख है । ( ५ ) वि० सं० १८१६ आश्विन सुदि १० ( ई० स० १७६२ ता० २७ सितंबर ) का नीनोर गांव के शिव-मंदिर का शिलालेख, जिसमें सात हज़ार पैंतीस रुपये के व्यय से वीसलनगरा नागर ब्राह्मण खीमज तथा हरनाथ-द्वारा व्यापार में लाभ होने पर महारावत सालिमसिंह के समय वह मंदिर बनवाये जाने का उल्लेख है । अपने पूर्वजों के समान ही महारावत सालिमसिंह उदार विचार का राजा था । उसने शाही दरबार में अपना प्रभाव बढ़ाया और प्रतापगढ़ महारावत का व्यक्तित्व : राज्य में टकसाल खोलने की इजाज़त प्राप्त की । फलतः महारावत के कुंवर सामंतसिंह के राज्य- काल में वादशाह शाहआलम (द्वितीय) के समय उक्त बादशाह के सन् जुलूस १५ में नवीन सिक्का ढलकर जारी हुआ, जो “सालिमशाही” नाम से प्रसिद्ध है । इस नवीन सिक्के के निर्माण से पाया जाता है कि प्रतापगढ़ राज्य उस समय मालवे के राज्यों में समृद्ध था और छोटा होने पर भी वहां का सिक्का आस-पास के बहुधा सब राज्यों-डूंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर, सीतामऊ, रतलाम, जावरा, ग्वालियर के मंदसोर परगने और टोंक के नींवाहेड़े परगने—में चलता था। यही नहीं अंग्रेज़ सरकार ने भी संधि के समय आवश्यकता पड़ने पर प्रतापगढ़ की टकसाल से सालिमशाही रुपये ढलवाकर दिये जाने की विशेष शर्त रक्खी । इससे उक्त राज्य का महत्त्व प्रकट होता है । महारावत के समय प्रतापगढ़ राज्य पर भी होल्कर का आक्रमण हुआ, परंतु वह अक्षुण्ण बना रहा । यह उक्त रावत की नीति-कुशलता का सूचक है। मालवा में उसका राज्य सिंधिया के इलाक़े से मिला हुआ होने पर भी उसने माधवराव का कुछ भी भय