राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास होकर देशी राज्यों को अंग्रेज़ सरकार के संरक्षण में लेना निश्चित हुआ अंग्रेज़ सरकार के साथ और मालवा तथा गुजरात से मिले हुए राज्यों से दूसरी संधि संधि करने का कार्य सर जॉन मालकम को सौंपा गया । महारावत सामन्तसिंह ने अपनी तरफ़ से पंडित रामचंद्र भाऊ को पूरे अधिकार के साथ संधि की बातचीत करने के लिए नीमच भेजा । अंत में कप्तान कॉल्फ़ील्ड और रामचंद्र भाऊ-द्वारा संधि की शर्तें तय होकर ई० स० १८१८ ता०५ अक्टोबर (वि० सं० १८७५ आश्विन सुदि ६ ) को नीचे लिखा संधिपत्र लिखा गया— शर्त पहली—राजा इक़रार करते हैं कि उनका दूसरे राज्यों के साथ जो ( राजनैतिक ) संबंध है, उसको वे त्याग देंगे और यथा संभव अंग्रेज़ सरकार की अधीनता करते रहेंगे । इसके एवज़ में अंग्रेज़ सरकार स्वीकार करती है कि वह उन्हें अपने राज्य में सुव्यवस्था स्थापित करने में सहायता देगी और अन्य राज्यों के दावों तथा ज्यादतियों से उनकी रक्षा करेगी । शर्त दूसरी—राजा इक़रार करते हैं कि वे कुल बाक़ी खिराज, जो मल्हारराव होल्कर को देना वाजिब है और जिसकी तादाद एक लाख चौबीस हज़ार छःसौ सत्तावन रुपये छःआने होती है, नीचे लिखे अनुसार अंग्रेज़ सरकार को देंगे— पहले वर्ष ई० स० १८१८-१६, हि० स० १२३४, वि० सं० १८७५ रु० १०००० दूसरे वर्ष ... ... ... रु० १५००० तीसरे वर्ष ... ... ... रु० २०००० चौथे वर्ष ... ... ... रु० २५००० पांचवें वर्ष ... ... ... रु० २५००० छठे वर्ष ... ... ... रु० २९६५७-६ आने राजा यह भी स्वीकार करते हैं कि ऊपर लिखी हुई रक़म अदा न होने की अवस्था में अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से एक प्रतिनिधि नियत होगा, जो प्रतापगढ़ शहर की चुंगी ( सायर ) की आय से उसे वसूल करेगा ।