राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत सामन्तसिंह २६५ शर्त तीसरी-देवलिया प्रतापगढ़ के राजा अपनी और अपने वारिसों की ओर से प्रतिज्ञा करते हैं कि वे अंग्रेज़-सरकार को अपनी रक्षा के एवज़ में इतना खिराज और नज़राना देंगे, जितना वे अब तक मल्हार राव होल्कर को दिया करते थे। यह खिराज नीचे लिखे अनुसार अदा किया जायगा- प्रथम वर्ष ई० स० १८१८-१६, हि० स० १२२६, वि० सं० १८७५ रु० ३५००० द्वितीय वर्ष ... ... ... रु० ४५००० तृतीय वर्ष ... ... ... रु० ५५००० चतुर्थ वर्ष ... ... ... रु० ६५००० पांचवें वर्ष खिराज की पूरी रक़म अर्थात् ७२७०० रुपये सालिम- शाही, दो किश्तों में अदा की जायगी। आधी माघ तथा आधी जेठ अर्थात् मार्च और जुलाई में । शर्त चौथी-राजा यह भी स्वीकार करते हैं कि वे अरबों और मकरानियों को नौकर न रक्खेंगे, पर वे पचास सवार और दो सौ सैनिक प्रतापगढ़ इलाक़े के निवासियों में से नौकर रक्खेंगे। जब कभी प्रतापगढ़ इलाक़े के समीप इन सवारों और पैदल सेना की आवश्यकता होगी, तब ये अंग्रेज़ सरकार की सेवा में रख दिये जावेंगे। शर्त पांचवीं-प्रतापगढ़ के राजा अपने राज्य के स्वामी रहेंगे और लुटेरी जातियों का दमन करने एवं पुनः शांति एवं सुशासन स्थापित करने के अतिरिक्त उनके प्रबंध में अंग्रेज़ सरकार कभी हस्तक्षेप न करेगी। राजा इक़रार करते हैं कि वे अंग्रेज़ सरकार की राय पर चलेंगे और अपने देश में टकसाल या सौदागरों तथा व्यापार की वस्तुओं पर कोई अनुचित कर न लगावेंगे। शर्त छठी-अंग्रेज़ सरकार इक़रार करती है कि वह प्रतापगढ़ के राजा के उन बंधु-बांधवों या संबंधियों की सहायता न करेगी जो उनकी आज्ञा न मानेंगे, बल्कि उनका दमन करने में राजा को सहायता देगी। शर्त सातवीं-अंग्रेज़ सरकार इक़रार करती है कि वह मीनों, भीलों आदि के दमन करने में राजा की सहायता करेगी। ३४