राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास शर्त आठवीं— अंग्रेज़ सरकार प्रतिज्ञा करती है कि वह राजा के प्रजा-संबंधी उचित तथा पुराने दावों में, जो प्राचीन प्रथा के अनुकूल होंगे, हस्तक्षेप न करेगी । शर्त नवीं— अंग्रेज़ सरकार इकरार करती है कि वह राजा के उन प्रजा-संबंधी स्वत्वों को, जो वाजिब होंगे और जिन्हें वे खुद हासिल न कर सकेंगे, प्राप्त करने में उनकी सहायता करेगी। शर्त दसवीं—यदि पड़ोस की किसी रियासत या आस-पास के ठाकुरों पर प्रतापगढ़ राज्य का कोई उचित दावा होगा तो अंग्रेज़ सरकार प्रतिज्ञा करती है कि वह उसको हासिल कराने या उसका फ़ैसला कराने में उन्हें अपनी ओर से मदद देगी । उनके तथा ऐसे राजाओं के बीच यदि कोई विरोध या झगड़ा पैदा होगा तो वह उसका निपटारा करने के लिए मध्यस्थ भी बनेगी । शर्त ग्यारहवीं— अंग्रेज़ सरकार इक़रार करती है कि वह खैरात की ज़मीन के मामलों में दखल न देगी और हमेशा राजा तथा प्रजा के धार्मिक रस्मों और दस्तूरों का पूरा लिहाज़ रक्खेगी । शर्त बारहवीं— इस संधिपत्र की तीसरी शर्त में राजा ने वादा किया है कि वे अंग्रेज़ सरकार को खिराज दिया करेंगे और इत्मीनान के लिए इक़रार करते हैं कि वे खिराज उस व्यक्ति को दे देंगे, जो उसे वसूल करने के लिए अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से नियत होगा और यदि उसके अदा होने में कोई ग़फ़लत होगी तो राजा मंजूर करते हैं कि अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से एक कार्यकर्त्ता मुक़र्रर किया जाय, जो प्रतापगढ़ शहर की चुंगी की आय से खिराज वसूल करे । यह अहदनामा, जिसमें बारह शर्तें दर्ज हैं, आज के दिन आनरेवल कम्पनी की ओर से ब्रिगेडियर-जेनरल सर माल्कम, के० सी० वी०, के० एल० एस०, की आज्ञानुसार कप्तान जेम्स कॉल्फ़ील्ड और देवलिया- प्रतापगढ़ के राजा सामन्तसिंह की ओर से रामचन्द्र भाऊ-द्वारा तय हुआ। कप्तान कॉल्फ़ील्ड ने अंग्रेज़ी, फ़ारसी तथा हिन्दी में इसकी एक नक़ल