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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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पृष्ठ 320

: महारावत सामन्तसिंह २६३ फिर दुःख-सागर में गोते खाता रहा। वि० सं० १८६५ मार्गशीर्ष वदि ५ (ई० स० १८०८ ता० ८ नवंबर) को महारावत के कुंवर दीपसिंह की भिणायवाली कुंवराणी के उदर से भंवर केसरीसिंह और दल- भंवर केसरीसिंह¹ और मार्गशीर्ष सुदि ६ (ता० २६ पतसिंह का जन्म नवंबर) शनिवार को फ़तहगढ़ (किशनगढ़ राज्य)- वाली कुंवराणी के उदर से भंवर दलपतसिंह² का जन्म हुआ। एक ही महीने में भिन्न-भिन्न कुंवराणियों के उदर से दो पौत्र उत्पन्न होने का समाचार सुनकर महारावत के हर्ष का पारावार न रहा और इस अवसर पर उसने अपने राज्य की स्थिति के अनुसार बहुत कुछ उदारता प्रकट की। लार्ड हेस्टिंग्ज़ के समय अंग्रेज़ सरकार की नीति में परिवर्त्तन (१) कविराजा बांकीदास; ऐतिहासिक बातें; संख्या २५७३। (२) वही; संख्या २५७४। प्रतापगढ़ राज्य से प्राप्त बड़वे की ख्यात में भंवर केसरीसिंह का कोठारिया (मेवाड़) के सरदार रावत सामन्तसिंह की पुत्री और संग्रामसिंह की पौत्री रत्नकुंवरी से उत्पन्न होना बतलाया है तथा ऐसा ही प्रतापगढ़ राज्य से आई हुई प्राचीन ख्यात में भी लिखा है; परन्तु कोठारिया के सरदारों में सामन्तसिंह नामक कोई व्यक्ति नहीं हुआ। संग्रामसिंह कोठारिया का रावत अवश्य हुआ था, जो महारावत सामन्तसिंह का सम- कालीन था। संभव है सामन्तसिंह उसका कुंवर हो, पर हमारे संग्रह में कोठारिया के स्वामियों की जो वंशावली है, उसमें संग्रामसिंह के पीछे मुहकमसिंह का नाम दिया है, जो उस (संग्रामसिंह) की मृत्यु के बाद वहां का रावत हुआ था। उपर्युक्त ख्यातों में कुंवर दीपसिंह का भिणाय (अजमेर) के इस्तमरारदार राजा उदयभाण की पुत्री और दलेल- सिंह की पौत्री राजकुंवरी से भी विवाह होना लिखा है। ऐसी अवस्था में केसरीसिंह का भिणायवाली कुंवराणी के उदर से अथवा कोठारियावाली कुंवराणी के उदर से जन्म हुआ, इसका निर्णय होना कठिन है। बड़वा भाटों की ख्यातों में कई स्थल पर उन्नीसवीं शताब्दी तक के वृत्तान्तों में विभिन्नता पाई जाती है। केसरीसिंह के भिणाय ठिकाने का भागिनेय होने का कथन हीं विश्वसनीय मानना पड़ेगा, क्योंकि कविराजा बांकीदास ने यह संग्रह अपने जीवनकाल में लिखा था और वह महारावत सामन्तसिंह का सम- कालीन भी था।