भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 319, कुल 534 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 319

२६२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास शर्त तीसरी-राजा अंग्रेज़ सरकार के शत्रुओं को अपना शत्रु सम- झेंगे और वे प्रतिज्ञा करते हैं कि उन्हें अपने इलाक़े में रहने न देंगे। शर्त चौथी-सारी अंग्रेज़ी सेना और उसके लिए प्रत्येक प्रकार का सामान बिना रोक-टोक तथा महसूल के राजा के इलाक़े में होकर गुज़रेगा। इसके अतिरिक्त राजा प्रतिज्ञा करते हैं कि वे हर प्रकार से उसकी सहा- यता और रक्षा करेंगे। शर्त पांचवीं-राजा के इलाक़े से मल्हारगढ़ में पांच हज़ार मन चावल, दो हज़ार मन चना और तीन हज़ार मन ज्वार दी जायगी, जिसे सौंप देने पर अंग्रेज़ सरकार उचित मूल्य देगी, जिसका आधा तो चौदह और बाकी अट्ठाइस दिनों में चुका दिया जायगा। शर्त छठी-इस विश्वास से कि राजा ऊपर लिखी हुई शर्तों पर पूरी तरह से अमल करेंगे अंग्रेज़ी सेना का अफ़सर कर्नल मरे प्रतिज्ञा करता है कि न तो वह स्वयं कोई सहायता रुपये, मवेशी या ग़ल्ले की लेगा और न अंग्रेज़ी सेना के जत्थों को, जो उनके अधीन होंगे, ऐसा करने देगा। शर्त सातवीं-राजा इक़रार करते हैं कि अंग्रेज़ी सेना में सिक्के की आवश्यकता होने पर, उसके अफ़सर जितनी चांदी भेजेंगे, उसका सिक्का प्रतापगढ़ की टकसाल से तैयार करके वे भेज देंगे। उसका उचित व्यय अंग्रेज़ सरकार देगी। शर्त आठवीं-यह संधिपत्र शीघ्र मान्यवर गवर्नर-जनरल के हस्ताक्षर के लिए भेजा जायगा, किन्तु उपर्युक्त शर्तों का पालन हस्ताक्षर होकर आने तक अंग्रेज़ सरकार के अफ़सर और राजा को उचित और आवश्यक होगा। उपर्युक्त संधिपत्र चंबल नदी के किनारे अंग्रेज़ सरकार की सेना के अफ़सर कर्नल मरे के कैम्प में तय होकर लिखा गया, परंतु तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड कॉर्नवालिस की देशी राज्यों के प्रति उदासीनता की नीति के कारण स्वीकृत नहीं हुआ१ और चौदह वर्ष तक प्रतापगढ़ राज्य (१) एचिसन; ट्रीटीज़ एंगेजमेंट्स एण्ड सनद्ज़; जि० ३, पृ० ४५८-६०।