राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत सामन्तसिंह २६१ लगे। उनमें से सिंधिया का प्रभाव तो उस समय बहुत बढ़ा हुआ था और दिल्ली के नाम मात्र के बादशाह शाह आलम का जीवन भी सिंधिया के दिये हुए धन पर ही अवलंबित था। वह समय केवल राजपूताना में ही नहीं वरन् भारतवर्ष भर में पूर्ण अशांति का था और चारों तरफ़ लूट-खसोट और अत्याचार का बाज़ार गर्म था। राजपूताना के राज्यों में अंग्रेज़ सरकार से संधि होने के पूर्व होल्कर और सिंधिया का बड़ा ज़ोर था और समय-समय पर उनके आक्रमणों से राजपूताना के तीन प्रधान राज्यों उदयपुर, जयपुर और जोधपुर की बड़ी दुर्दशा हुई थी। उन दिनों शक्तिशाली अंग्रेज़ जाति के पैर भारत में अच्छी तरह जम गये थे। उनकी सैनिक शक्ति और नीति-युक्त शासन-प्रणाली से मरहटे अफ़सर भी उनको युद्ध में अजेय मानकर अपने बचाव का मार्ग ढूंढ़ने लगे। अंग्रेज़ सरकार से जसवंतराव होल्कर का युद्ध छिड़ जाने पर उसको निरंतर हार खानी पड़ी। अंत में जसवन्तराव होल्कर का घमंड नष्ट करने का अंग्रेज़ सरकार ने दृढ़ संकल्प कर लिया। महारावत सामन्तसिंह ने भी अपने दुःखों से त्राण पाने का यह उपयुक्त अवसर समझा, क्योंकि होल्कर आदि के जुल्म से उसका राज्य भी जर्जर हो गया था। उसने अंग्रेज़ सरकार के संरक्षण में जाने का विचार कर वि० सं० १८६१ (ई० स० १८०४) में संधि का प्रस्ताव किया। गुजरात और मालवा के अंग्रेज़ सेनापति कर्नल मरे-द्वारा संधि की बातचीत तय होकर ता० २५ नवंबर (मार्गशीर्ष वदि ८) को दोनों के बीच आठ शर्तों का निम्नलिखित संधिपत्र लिखा गया— शर्त पहली—जसवंतराव होल्कर की अधीनता तथा बड़प्पन को राजा सब प्रकार से अस्वीकार करते हैं। शर्त दूसरी—राजा प्रतिज्ञा करते हैं कि वे जितना खिराज पहले जसवंतराव होल्कर को देते थे, उतना अंग्रेज़ सरकार को दिया करेंगे और यह खिराज उस समय दिया जायगा, जब सम्माननीय गवर्नर जनरल इसके वसूल किये जाने की आज्ञा देना उचित समझेंगे।