राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास सबल निर्बल को दबाने में कुछ भी संकोच नहीं करता था। ऐसे समय में सिंधिया का एक सेनापति जग्गु बापू सेना लेकर प्रतापगढ़ पर चढ़ गया और उसने वहां घेरा डाल दिया। इस अवसर पर कुंवर दीपसिंह ने सिंधिया की सेना का वीरतापूर्वक मुक़ाबला किया, जिससे सिंधिया की सेना का एक अफ़सर मारा गया। बीस दिन तक सिंधिया की सेना का वहां घेरा रहा और जब जग्गु बापू को प्रतापगढ़ राज्य से कुछ भी रुपया मिलने की आशा न दीख पड़ी तो वह वहां से लौट गया¹। मरहटे अफ़सरों की लूट-खसोट और आर्थिक शोषण की नीति से प्रतापगढ़ राज्य का भी अधिकतर भाग ऊजड़ हो गया था। धनी-मानी व्यक्तियों पर तो और भी अधिक विपत्ति थी तथा [हाशिया: अंग्रेज़ सरकार के साथ महारावत की प्रथम संधि] उनका इस अराजकता के युग में कोई रक्षक न था। प्रतापगढ़ राज्य में भी चारों तरफ़ दरिद्रता का निवास हो गया और आय के साधन बंद हो जाने से राज्य सम्बन्धी साधारण व्यय का चलना भी कठिन हो गया तथा खिराज की रक़म भी बराबर न पहुंचने लगी। परिणाम स्वरूप होल्कर सरकार द्वारा प्रताप- गढ़ राज्य में भी लूट-मार का बाज़ार गर्म रहा। इन कारणों से राजपूत राज्यों और मरहटे सरदारों के बीच पूरी शत्रुता उत्पन्न हो गई। मरहटे सरदारों की अनुदार नीति से वीरवर शिवाजी का संस्थापित मरहटा साम्राज्य, जिसकी उन्नति बुद्धिमान पेशवाओं द्वारा हुई थी, छिन्न-भिन्न होने लगा और उनमें परस्पर फूट उत्पन्न हो गई। पेशवा के सैनिक अफ़सरों में गायकवाड़, सिंधिया और होल्कर बड़े शक्तिशाली थे। उन्होंने अवसर पाते ही पेशवा की अधीनता से मुख मोड़कर अपनी जागीरों को स्वतंत्र राज्य का रूप दे दिया। उनकी देखा-देखी पेशवा के अन्य सैनिक अफ़सर परमार (धारवाला) आदि भी स्वतंत्र हो गये और उन्होंने जिस तरह हो सके रुपया वसूल करने की नीति से मध्यभारत और राजपूताने के राज्यों को सैनिक अड्डा बना लिया तथा वे वहां से अत्याचारपूर्वक रुपये वसूल करने ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६५ ।