भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 316, कुल 534 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 316

महारावत सामन्तसिंह २५६ निरन्तर उपद्रवों के कारण उस समय प्रतापगढ़ राज्य की स्थिति संतोषप्रद न थी और महारावत इतना अधिक वार्षिक खिराज होल्कर होल्कर सरकार को खिराज सरकार को देने में सर्वथा असमर्थ था । खिराज की रक़म न देने से बहुधा चढ़ भी जाया करता था, जिसकी वसूली कुंवर दीपसिंह का के लिए होल्कर को अपनी सेना भेजनी पड़ती थी, ओल में जाना जिससे राज्य को बहुत हानि होती थी और अंत में ज़ेवर, सामान, घोड़े आदि देकर किसी तरह होल्कर की सेना को विदा किया जाता था। एक बार होल्कर की सेना के खिराज की वसूली के लिए प्रतापगढ़ राज्य में जाने पर अर्थ-संकट होने से महारावत की तरफ़ से खिराज न दिया जा सका और कई दिन तक होल्कर की सेना प्रतापगढ़ को घेरे रही । अंत में जब तक खिराज की रक़म बेबाक न हो, तब तक के लिए महारावत ने अपने तेरह वर्ष के कुंवर दीपसिंह को होल्कर की ओलो में देना तय किया। फिर होल्कर की सेना दीपसिंह को लेकर इंदौर पहुंची। दो-तीन वर्ष तक उक्त कुंवर होल्कर सरकार के यहां ओल में रहा । फिर वहां से विदा मिलने पर वह प्रतापगढ़ लौटा¹ । होल्कर सरकार का प्रतापगढ़ राज्य से खिराज का संबंध हो जाने से सिंधिया सरकार का प्रतापगढ़ राज्य से खिराज आदि का कोई प्रत्यक्ष सिंधिया की सेना का प्रताप- संबंध नहीं रहा था, परंतु उन दिनों भारत में 'जिस- गढ़ को घेरना की लाठी उसकी भैंस' वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी और न्याय तथा अन्याय का विचार न कर


"रिपोर्ट ऑन दि प्राविंस ऑव् मालवा एंड एडज्वाइर्निंग डिस्ट्रिक्ट्स" (पृ० २२५) में होल्कर का ७५००० रुपये सालिमशाही वार्षिक खिराज लेने का उल्लेख है। "वीरविनोद" (द्वितीय भाग, पृ० १०६५) में मलहारराव होल्कर का महारावत पर दबाव डाल खिराज की रक़म ७२००० रुपये स्थिर करने का ही उल्लेख है। मलहारराव की मृत्यु वि० सं० १८२३ (ई० स० १७६६) में हुई । उस समय प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी महारावत सालिमसिंह था। ऐसी अवस्था में महारावत सालिमसिंह के समय ही उपर्युक्त रक़म स्थिर होना मानना पड़ेगा । (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६५ ।