राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰
पेशवा बाजीराव बल्लाल के समय से ही मालवा के इलाके पर मर- हठों का आधिपत्य हो गया था । फिर बालाजी बाजीराव को उक्त सूबे पर [होल्कर का प्रतापगढ़ राज्य से खिराज स्थिर करना] अधिकार रखने की बादशाह की तरफ़ से सनद भी मिल गई, जिसपर उसने मालवा अपने सरदारों में बांट दिया; परंतु इसके पूर्व ही पेशवा तथा उसके सेनापतियों ने आतंक जमाकर मालवा तथा राजपूताने के राजाओं से चौथ की वसूली का सिलसिला शुरू कर दिया था । प्रतापगढ़ राज्य से चौथ की वसूली का स्वत्व होल्कर का रहा, किन्तु पेशवाओं के साथ महारावत गोपालसिंह की मित्रता होने से उसपर चौथ की बावत अधिक दबाव न पड़ा । विभिन्न ख्यातों के लेखों से पाया जाता है कि देव- लिया प्रतापगढ़ राज्य की ओर से पहले शाही दरबार में पंद्रह हज़ार रुपये वार्षिक खिराज के दिये जाते थे । बादशाहत की निर्बलता देख महा- रावत ने वह होल्कर को देना स्वीकार कर लिया था; किंतु होल्कर ने केवल पंद्रह हज़ार रुपये वार्षिक खिराज पर ही संतोष न किया और संभवतः महारावत सामन्तसिंह के समय में दबाव डाल वार्षिक ७२७२० रुपये सालिमशाही लेना स्थिर किया¹, जो अंग्रेज़ सरकार से संधि होने के पूर्व तक वहां से होल्कर को मिलते रहे ।
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जागीर छोड़ देने का उल्लेख तो इसी प्रकार मिलता है, परन्तु उनमें महाराणा को तीन लाख रुपये देने का वर्णन नहीं है । महाराणा भीमसिंह के समय अढ़ाड़ा कवि किशन ने 'भीमविलास'-नामक काव्य की रचना की । उसमें इस घटना का निम्नलिखित वर्णन है— ∙∙∙ऊपरि मुकाम तट महिय आय, घर बंसवार आतंक पाय । रावल विजेस करि मंत्र साम, कर जोध भेज त्रय लक्ख दाम । ताही मुकाम सामंत राव, भेजिय वकील महरान पाव । तिन सीस दंड मनमान थप्प, त्रय लक्ख दाम इक ठाम अप्प । छंडाय धरावद ग्राम लीन, रघुनाथ राव कहूं पटे दीन ∙∙∙॥२६॥ पृ० ११६ । ( १ ) के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० १६६ । माल्कम की