भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 314, कुल 534 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 314

महारावत सामन्तसिंह २५७ तत्त्वावधानता में शासन-कार्य शाह कपूर पाडलिया, महारावत का मामा सरदारसिंह, राघव बख्शी और शाह गुमान चलाते थे। यह ऊपर बतलाया जा चुका है कि उन दिनों प्रतापगढ़ के स्वामी के पास उदयपुर राज्य की तरफ़ से धरियावद् की जागीर थी, जिसके एवज़ में वहां से उदयपुर में सेवा के लिए सेना भेजनी पड़ती थी। सामन्तसिंह की बाल्यावस्था के कारण राजमाता ने उदयपुर में सेना भेजना बंद कर दिया और महारावत ने वय प्राप्त होने पर भी सेना भेजना जारी नहीं किया। उन दिनों उदयपुर राज्य की स्थिति भी अत्यंत कमज़ोर हो गई थी। वि० सं० १८२६ (ई० स० १७७३) में महाराणा अरिसिंह का देहांत होने पर उसके दोनों पुत्रों हम्मीरसिंह (दूसरा) और भीमसिंह के क्रमशः बालक अवस्था में महाराणा होने के कारण राज्यरक्षा के लिए राजपूत- सैनिकों की पूरी आवश्यकता रहती थी। ऐसी स्थिति में महारावत का अपनी सेना उदयपुर में सेवा के लिए न भेजना महाराणा और उसके मुसाहबों आदि को अखरने लगा। वि० सं० १८४० (ई० स० १७८४) में उदयपुर से महाराणा भीमसिंह अपना विवाह करने के लिए दूसरी बार ईडर गया। वहां से पीछा लौटते समय उक्त महाराणा ने डूंगरपुर पर घेरा डाल दिया और फिर वहां से वह बांसवाड़ा की तरफ़ रवाना हुआ। जब माही नदी के तट पर महाराणा की सेना का मुक़ाम हुआ तो बांसवाड़ा के स्वामी महारावल विजयसिंह ने गढ़ी के ठाकुर जोधसिंह की मार्फ़त तीन लाख रुपये दंड के भेजकर महाराणा से सुलह कर ली। उसी स्थान पर महारावत सामंतसिंह ने भी महाराणा की सेवा में अपने वकील के साथ तीन लाख रुपये भेज, धरियावद् की जागीर छोड़ देने का इक़रार लिख भेजा। इसपर महाराणा ने वहां से अपनी राजधानी की ओर प्रस्थान किया और धरियावद की जागीर महाराणा प्रतापसिंह (प्रथम) के वंशधर राणावत रघुनाथसिंह को प्रदान की¹, जिसके वंशजों का अब भी वहां अधिकार है। (१) प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में महारावत सामन्तसिंह-द्वारा धरियावद की ३३