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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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२६८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास गवर्नर-जेनरल ने कौंसिल में तस्दीक़ की¹ । (दस्तखत) जे० एडम, गवर्नमेंट का चीफ़ सेक्रेटरी अंग्रेज़ सरकार और देवलिया प्रतापगढ़ राज्य के बीच की यह संधि सूखती हुई कृषि के लिए वर्षा के समान लाभदायक सिद्ध हुई । प्रजा में नवजीवन का संचार हुआ। कृषि-जीवी तथा अन्य प्रतापगढ़ राज्य की आर्थिक व्यवसायी जन, जो उपद्रवों के कारण बाहर चले स्थिति में उन्नति होना गये थे, पुनः अपने देश में आकर बस गये, जिससे चारों तरफ़ खेती लहलहाने लगी। संधि होने के पूर्व इस राज्य की औसत आमदनी दो लाख रुपये थी। संधि होने के वर्ष ही आय में बयालीस हज़ार रुपये और दूसरे वर्ष लगभग पचासी हज़ार रुपये की वृद्धि हुई² । डूंगरपुर का महारावल जसवंतसिंह (दूसरा) दुर्बल-हृदय शासक था। उसके कोई कुंवर न था। निरन्तर विपत्तियों से ग्रसित रहने के कारण युवावस्था में ही उसको शासन-कार्य से दलपतसिंह का डूंगरपुर उदासीनता हो गई और अपना अपुत्र होना गोद जाना खटकने लगा । उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ के नरेश एक ही वंश के हैं, परंतु उदयपुर और प्रताप- गढ़ डूंगरपुर से पीढ़ियों में बहुत दूर जाकर मिलते हैं । प्रचलित रीति के अनुसार आवश्यकता के समय अपने समीपी बंधु-बांधवों में से ही दत्तक पुत्र ग्रहण किया जाता है। इसके विपरीत महारावल ने अपनी अविवेकता और अस्थिर-चित्तता के कारण प्रतापगढ़ के स्वामी सामंतसिंह के द्वितीय पौत्र दलपतसिंह को अपना दत्तक पुत्र बनाया³, (१) एचिसन; ट्रीटीज़ एंगेजमेंट्स ऐंड सनद्ज़; जि० ३, पृ० ४६०-६३ । (२) माल्कम; रिपोर्ट ऑन् दि प्रॉविंस ऑव् मालवा एंड दि एड्जॉइनिंग डिस्ट्रिक्ट्स; पृ० ३३४ । (३) प्रतापगढ़ राज्य से प्राप्त राजकीय पत्रादि से पाया जाता है कि वि० सं० १८७७