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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 326, कुल 534 में से

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पृष्ठ 326

महारावत सामन्तसिंह २६६ जिसको अंग्रेज़-सरकार ने भी स्वीकार कर लिया । इसका कारण यही हो सकता है कि डूंगरपुर के राज-कुटुंब में उस समय योग्य पुरुष का अभाव था और दलपतसिंह में बाल्यकाल से ही प्रतिभा विद्यमान थी । अंग्रेज़ सरकार से संधि होने के पीछे प्रतापगढ़ राज्य बाहरी आक- मणों से तो सुरक्षित हो गया, परंतु भीतरी उपद्रव; भील, मीणों आदि दुर्दम- नीय लोगों की लूट-खसोट या ग़ारतगिरी आदि से सेना-व्यय के एवज़ अंग्रेज़- सरकार को नक़द रुपये देने का क़रार होना मुक्त न था । ऐसे उपद्रवों को मिटाकर शांति स्था- पित करने के लिए सैनिक शक्ति की आवश्यकता ( ई० स० १८२० ) में महारावल जसवन्तसिंह ( दूसरा ) देवलिया आया, तब वह युवा था, तो भी उसने महारावत सामन्तसिंह से भंवर दलपतसिंह को अपने गोद देने - के लिए आग्रह किया। इसपर कई शर्तों के साथ दलपतसिंह डूंगरपुर गोद दे दिया गया, जिसको अंग्रेज़ सरकार के पोलिटिकल अफ़सरों ने भी स्वीकार किया । वि० सं० १८७८ ( ई० स० १८२१ ) में सर जॉन माल्कम उदयपुर गया, उस समय वहां के महाराणा भीमसिंह ने इस गोदनशीनी को ठीक नहीं बतलाया । इसपर उस (सर जान माल्कम)- ने उत्तर दिया कि मैं इतिहास से वाक़िफ़ न था, इसलिए ऐसा हुआ, परन्तु अब यह बात बदली नहीं जा सकती । इससे पाया जाता है कि वि० सं० १८७७ ( ई० स० १८२० ) के आसपास ही दलपतसिंह की गोदनशिनी की बात तय हो चुकी थी, अत- एव उस समय के बाद ही दलपतसिंह का डूंगरपुर में आना-जाना शुरू हुआ होगा और वि० सं० १८८१ से वह वहां स्थायी रूप से रहने लगा । डूंगरपुर राज्य से महारावल जसवन्तसिंह ( दूसरा ) की जन्मपत्री और वर्ष- फल प्राप्त हुए हैं। उनसे पाया जाता है कि उसका जन्म आषाढादि वि० सं० १८४५ शाके १७२१ ( चैत्रादि वि० सं० १८४६ ) अमांत वैशाख वदि १० उपरांत ११, (पूर्णिमांत ज्येष्ठ वदि १० उपरांत ११ = ई० स० १७६६ ता० २६ मई) बुधवार, उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र उपरांत रेवती को हुआ था। अतएव वि० सं० १८७७ में उक्त महा- रावल की आयु २१ वर्ष से अधिक नहीं हो सकती । अभिप्राय यह कि जसवन्तसिंह ने अपनी २१ वर्ष की आयु में ही दलपतसिंह को, जब कि वह केवल १२ वर्ष का था, अपना दत्तक बना लिया था। इतनी अल्प आयु में ही उस(जसवन्तसिंह)का दलपतसिंह को अपना उत्तराधिकारी बनाना निश्चय ही एक प्रकार का भ्रांति-मूलक विचार ही कहा जायगा ।

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