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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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२७० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास थी। अतएव अंग्रेज़ सरकार की अध्यक्षता में सेना रखना निश्चय होकर वि० सं० १८८० मार्गशीर्ष सुदि ७ ( ई० स० १८२३ ता० ६ दिसंबर ) को संधिपत्र की तीसरी शर्त के अनुसार पचास सवार और दो सौ पैदल सेना रखने के एवज़ में १२[०००] रुपये सालिमशाही वार्षिक देने और वि० सं० १८८३ ( ई० स० १८२६-२७) से चौबीस हज़ार रुपये देते रहने का अंग्रेज़ सरकार के साथ कप्तान ए० मेकडॉनल्ड-द्वारा नीचे लिखा इक़रार- नामा हुआ- अहदनामे में दो सौ पैदल और पचास सवार दर्ज हैं, उनके खर्चे के लिए नियत किश्तों में एक हज़ार रुपये माहवार अर्थात् बारह हज़ार रुपये वार्षिक सरकार को दिये जायंगे। वि० सं० १८८३ ( ई० स० १८२६-७) से दो हज़ार रुपये माहवार अर्थात् चौबीस हज़ार रुपये वार्षिक कंपनी की सरकार को दिये जायेंगे और इससे विपरीत कभी न होगा। रुपये सालिमशाही होंगे १ । उपर्युक्त इक़रारनामे से प्रतापगढ़ राज्य पर चौबीस हज़ार रुपये वार्षिक का बोझ और भी बढ़ गया, जिसको देने में वह समर्थ न था। फिर भी वह किसी प्रकार खिराज आदि नियमित रूप से देकर अपने ऊपर ऋण न बढ़ने देता था। अन्त में वि० सं० १८४७ ( ई० स० १८४० ) में महारावत सामन्तसिंह के पौत्र दलपतसिंह के ( जब कि वह अपने बड़े भ्राता केसरीसिंह की मृत्यु हो जाने के कारण प्रतापगढ़ का भी भावी स्वामी मान लिया गया था ) अंग्रेज़ सरकार से लिखा-पढ़ी करने पर प्रतापगढ़ राज्य को इस बोझ के उठाने में असमर्थ देख इस अहदनामे को मंसूख कर दिया गया २ । महारावत सामंतसिंह ने अंग्रेज़ सरकार से संधि होने के पीछे अपनी वृद्धावस्था का विचार कर राज्य-कार्य अपने कुंवर दीपसिंह को ( १ ) एचिसन; ट्रीटीज़ एंगेजमेंट्स एण्ड सनद्ज़; जि० ३ पृ० ४६३ । ( २ ) एचिसन; ट्रीटीज़ एंगेजमेंट्स एण्ड सनद्ज़; जि० ३, पृ० ४४२ ।