राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
[Header] महारावत सामन्तसिंह २७१
सौंप दिया था, किंतु कुछ स्वार्थी लोगों ने पिता-पुत्र के बीच द्वेष उत्पन्न करा दिया, जिससे राज्य-कार्य में खराबी होने लगी । अपने उग्र स्वभाव के कारण कुंवर ने कतिपय मनुष्यों को, जो उसके कार्य में बाधक थे, मरवा डाला । अंग्रेज़ सरकार ने कुंवर के इस कृत्य से अप्रसन्न होकर उसको राज्य-कार्य से वंचित कर दिया और देवलिया में रहने की आज्ञा दी । तदनुसार कुंवर देवलिया में रहने लगा, परन्तु उसको वहां रहना पसन्द नहीं था, जिससे वह फिर प्रतापगढ़ में जाकर उपद्रव करने लगा । जब उसका उपद्रव चरम सीमा तक पहुंच गया तो अंग्रेज़ सरकार ने उसका दमन करने के लिए अपनी सेना रवाना की, जिसका कुंवर से मुक़ाबला हुआ । थोड़ी लड़ाई के बाद कुंवर अंग्रेज़ी सेना-द्वारा बंदी कर लिया गया¹ । महारावत ने उसको करनोरा (कनोरा) के क़िले में क़ैद रखना चाहा और इस बात का इक़रार भी वि० सं० १८८० मार्गशीर्ष सुदि १ ( ई० स० १८२३ ता० ३ दिसम्बर ) को कप्तान मेक्डॉनल्ड के नाम लिख दिया², परंतु यह बात अंग्रेज़
[Footnotes] (१) अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़ स्टेट; पृ० १६६ । (२) मूल इक़रार की प्रतिलिपि से । जी० वी० मैलिसन ने "हिस्टॉरिकल स्केचिज़ ऑव् दि नेटिव स्टेट्स ऑव् इंडिया" ( पृ० १३३-५ ) में भी कुंवर दीपसिंह को कनोरा के दुर्ग में रखने का उल्लेख किया है । इसी प्रकार 'वक़ाये राजपूताना' ( पृ० ५७७ ), 'हिंद राजस्थान' (गुजराती, अमृतलाल गोवर्द्धनदास शाह और काशीराम उत्तमराम पंड्या कृत; पृ० ६७५ ) आदि में भी ऐसा ही लिखा है । कनोरा प्रतापगढ़ राज्य के अन्तर्गत है, जिससे उसके वहां रहने से फिर वहां उपद्रव होने की संभावना थी । इस दृष्टि से उसका प्रतापगढ़ राज्य से बाहर अचरे की गढ़ी में रखा जाना ही ठीक प्रतीत होता है । बिशप हेबर अपनी यात्रा के समय ई० स० १८२५ ( वि० सं० १८८२ ) में प्रतापगढ़ भी गया था । वह अपनी पुस्तक 'नरेटिव ऑव् ए जर्नी थ्रू दि अपर प्रॉविंसेज़ ऑव् इंडिया' में लिखता है कि दीपसिंह ने तीन वर्ष पूर्व स्वयं अपने हाथ से तथा अन्य व्यक्तियों द्वारा छः आदमियों को मरवा डाला था। उसका पिता, वहां का राजा बड़ा सीधा
२७२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास सरकार को स्वीकार नहीं हुई। अंत में वह ग्वालियर-राज्यान्तर्गत अचेरे की गढ़ी में रखा गया। उन दिनों महारावत ने शासन-कार्य पीछा अपने हाथ में ले लिया था। स्नेहवश उस(महारावत)ने कुंवर का अपराध क्षमाकर उसे पीछा प्रतापगढ़ में बुला लेना चाहा और इसके लिए अंग्रेज़ अफ़सरों से लिखा-पढ़ी भी प्रारंभ की¹। संभव था कि कुंवर का अपराध अंग्रेज़ सरकार भी क्षमा कर देती, पर इसी बीच वि० सं० १८८२ चैत्र सुदि १४ (ई० स० १८२६ ता० २१ अप्रेल) को दीपसिंह की मृत्यु हो गई²। और वृद्ध था एवं उस(दीपसिंह) का दमन नहीं कर सकता था तो भी वह उस(दीप- सिंह)को क़ैद से छुड़ाने के लिए बड़ा व्यग्र था। कुछ लोगों का यह कथन है कि सरकारी सेना से कुंवर का मुक़ाबला होने पर एक अंग्रेज़ अफ़सर भी मारा गया, जिसका स्मारक प्रतापगढ़ क़स्बे के बाहर पश्चिम की ओर बना हुआ है। एक स्थल पर यह भी लिखा मिलता है कि कुंवर दीपसिंह ने कप्तान मेकडॉनल्ड को मार डाला था। वस्तुतः ये सब कथन भ्रांतिमूलक हैं; उपर्युक्त स्मारक बङ्गाल की पैदल सेना के ४६ वीं रेजिमेंट के लेफ़्टेनेन्ट और रामपुरा की देशी बटालियन के एडज्यूटेंट जॉन वायली का है, जिसकी | ई० स० १८२६ ता० १४ अक्टूबर (वि० सं० १८८३ आश्विन सुदि १४) को वहां पर मृत्यु हुई थी; इसके छः मास पूर्व ही कुंवर दीपसिंह का देहावसान हो गया था। इसी प्रकार कप्तान मेकडॉ- नल्ड के वहां मारे जाने और उसका स्मारक सालमगढ़ में होने की बात भी निर्मूल है। कप्तान मेकडॉनल्ड दीपसिंह के बंदी होने के पीछे तक विद्यमान था, जैसा कि संधिपत्रों से निश्चित है। (१) महारावत सामन्तसिंह का मि० वेलेज़ली के नाम का वि० सं० १८८२ फाल्गुन वदि ८ (ई० स० १८२६ ता० १ मार्च) का पत्र। (२) के० डी० अर्सकिन ने अपने प्रतापगढ़ राज्य के गैज़ेटियर में ता० २१ मई ई० स० १८२६ को दीपसिंह की मृत्यु होना लिखा है। इसी प्रकार मैलेसन के "हिस्टोरिकल स्केचिज़","स्केचेज़ राजपूताना" आदि में उसके देहांत की यही तारीख़ दी है, जिसका हिन्दी तिथियों से मिलान करने पर उस दिन वि० सं० १८८३ वैशाख सुदि १४ आती है, किन्तु प्रतापगढ़ राज्य के राजाओं की निधन-तिथियों की सूची में दीपसिंह की निधन-तिथि वि० सं० १८८३ चैत्र सुदि १४ दी है। उसका मिलान करने पर उस
: महारावत सामन्तसिंह २७३ महारावत सामंतसिंह के पिछले समय में राज्य का काम शाह नवल- चंद करता था। वह होशियार और पूरा स्वामिभक्त था, अतएव महारावत महारावत का नवलचंद पाड-लिया को कामदार बनाना ने कुंवर दीपसिंह के अंग्रेज़ सरकार-द्वारा अचरे की गढ़ी में भेज दिये जाने पर वि० सं० १८८० पौष सुदि ३ (ई० स० १८२४ ता० ४ जनवरी) रविवार को फिर शाह नवलचंद को कामदार (मुख्य मंत्री) के पद पर नियत किया। दीपसिंह की मृत्यु के पश्चात् महारावत ने अपने ज्येष्ठ पौत्र केसरीसिंह को राज्य-कार्य सौंप दिया। उस (केसरीसिंह) ने भी शाह नवलचंद की पूरी तसल्ली कर उसको उसी पद पर बहाल रखा। उसकी कार्य-शैली अच्छी होने से अंग्रेज़ सरकार के पोलिटिकल अफ़सरों ने भी समय-समय पर उसकी खातिरी कर उसको उत्साहित किया था¹। महारावत के कुंवर दीपसिंह के एक पुत्री प्रतापकुंवरी थी। उसका संबंध बीकानेर के महाराजा रतनसिंह के महाराजकुमार सरदारसिंह के महारावत की पौत्री का बीकानेर के कुंवर सरदारसिंह से विवाह साथ निश्चय होकर वि० सं० १८८६ फाल्गुन वदि ८ (ई० स० १८३३ ता० १२ फ़रवरी) विवाह की तिथि स्थिर हुई²। तदनुसार उक्त महाराजकुमार की बरात प्रतापगढ़ पहुंचने पर पूर्ण आतिथ्य कर महारावत ने बड़े समारोह के साथ विवाह-कार्य सम्पन्न किया। पुत्र शोक का घाव भर भी नहीं पाया था कि ऐसे में वि० सं० १८६१ वैशाख सुदि ४ (ई० स० १८३४ ता० १२ मई) को महारावत के दिन ता० २१ अप्रेल आती है। अतएव दीपसिंह की मृत्यु की कौनसी तिथि सही है, इस सम्बन्ध में निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता; परन्तु गैज़ेटियर आदि में दी हुई तारीख़ ही सही होनी चाहिये, क्योंकि वह तत्कालीन सरकारी काग़ज-पत्रों के आधार पर लिखे गये हैं। (१) शाह नवलचन्द के नाम विलियम बोरथिक का वि० सं० १८८६ ज्येष्ठ वदि ६ (ई० स० १८३२ ता० १६ मई) का ख़त। (२) मेरा बीकानेर राज्य का इतिहास; भाग २, पृ० ४२०। ३५
२७४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास भंवर केसरीसिंह का ज्येष्ठ पौत्र केसरीसिंह का असमय २६ वर्ष की देहावसान युवावस्था में निःसंतान देहांत हो गया। महारावत के शरीर पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। वृद्धावस्था में युवा पुत्र एवं पौत्र की मृत्यु के कठोर दुःख को सहन करना बड़ा कठिन था, फिर भी इन दैविक आपत्तियों को सहन कर उसने धैर्य न छोड़ा और वह राज्य-कार्य बराबर चलाता रहा। वृद्धावस्था, शारीरिक स्थिति की निर्बलता तथा दैविक विपत्तियों के कारण महारावत अपने पिछले समय में राज्य-कार्य में पूर्ण रूप से ध्यान न दे सका। इससे समय-समय पर कुछ शासन में अव्यवस्था होना अव्यवस्था भी उत्पन्न हुई और भील, मीणों, ठगों तथा अन्य जरायम-पेशा लोगों ने अपना धंधा जारी कर दिया, पर राज्य की आर्थिक स्थिति में इससे कुछ अन्तर नहीं हुआ और महारावत के उत्तम आचरण से अंग्रेज़ सरकार ने उसको हर प्रकार से सहायता देकर शासन-व्यवस्था में बाधा न पड़ने दी¹। महारावत सामंतसिंह के छोटे पुत्र दलपतसिंह को डूंगरपुर के महा- रावल जसवतसिंह-द्वारा दत्तक लेने की स्वीकृति अंग्रेज़ सरकार से प्राप्त होने पर वह वहां चला गया था; फिर भी पितृ-प्रेम महारावत का डूंगरपुर से से प्रेरित होकर वि० सं० १८८१ माघ वदि ५ दलपतसिंह को बुलाकर (ई० स० १८२५ ता० ६ जनवरी) को महारावत ने शासन-कार्य सौंपना उसको वार्षिक २४००० रुपये की आय का कल- थाणा का पट्टा प्रदानकर वि० सं० १८८७ (ई० स० १८३०) से उसका खिराज एक हज़ार रुपये लेना स्थिर किया²। प्रारम्भ में दलपतसिंह और महारावल के बीच मेल रहा, परन्तु फिर महारावल के साथ उसकी नहीं निभी। वि० सं० १८८१ (ई० स० १८२४) में वहां भीलों का उपद्रव हो गया, (१) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० ३५८ । (२) महारावत सामन्तसिंह का भंवर दलपतसिंह के नाम का वि० सं० १८८१ माघ वदि ५ (ई० स० १८२५ ता० ६ जनवरी) का परवाना ।
. महारावत सामन्तसिंह २७५ जिसको महारावल दबा नहीं सका, इसलिए महारावल से अंग्रेज़ सरकार ने शासन-कार्य अपने हाथ में ले लिया । फिर कुछ वर्षों बाद दलपतसिंह की योग्यता का अनुभव कर सब अधिकार उसको सौंप दिये गये । दलपतसिंह ने शासनाधिकार पाकर पट्टे परवानों पर पहले तो महारावल के नाम के साथ अपना नाम लिखना आरम्भ किया, फिर वह केवल अपना ही नाम लिखने लगा। इससे भी दोनों में द्वेष की वृद्धि हुई और यह वैमनस्य यहां तक बढ़ा कि महारावल डूंगरपुर छोड़कर गढ़ी ठिकाने में जा बैठा । ऐसे में प्रतापगढ़ राज्य के स्वत्वाधिकारी केसरीसिंह का, जो दलपतसिंह का ज्येष्ठ भ्राता था, देहांत हो गया । उस समय महारावत सामंतसिंह ने दलपतसिंह को प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी बनाने का विचार- कर उस (दलपतसिंह) को वहां बुलवा लिया और देवलिया में रहते हुए वह डूंगरपुर का शासन-कार्य भी करता रहा । फिर अंग्रेज़ सरकार ने भी महारावत की इच्छा स्वीकार कर दलपतसिंह को प्रतापगढ़ राज्य का भावी महारावत मान लिया । वि० सं० १६०० पौष सुदि १५ (ई० स० १८४४ ता० ५ जनवरी) को महारावत का देहांत महारावत सामन्तसिंह का ७० वर्ष राज्य करने के पश्चात् ७६ वर्ष की आयु में परलोकवास हो गया । महारावत सामन्तसिंह के आठ विवाह हुए थे, जिनसे उसके पद्मसिंह, दीपसिंह और सरदारसिंह नामक तीन कुंवर और प्राणकुंवरी, अजबकुंवरी, रानियां और संतति आदि चिमनकुंवरी, चंदनकुंवरी, तख्तकुंवरी एवं रत्न- कुंवरी नामक छः पुत्रियां हुईं १ । महारावत का एक विवाह किशनगढ़ के महाराजा बहादुरसिंह की पुत्री सरूपकुंवरी से हुआ था२, जिसके उदर से एक कुंवर और प्राणकुंवरी नामक कुंवरी हुई । प्राणकुंवरी का विवाह ईडर के स्वामी गंभीरसिंह के ज्येष्ठ कुंवर उम्मेदसिंह ( १ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ६-१० । प्रतापगढ़ राज्य की पुरानी ख्यात; पृ० १३-४ । ( २ ) बांकीदास; ऐतिहासिक बातें; संख्या १३१३ ।
२७६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास से हुआ तथा उस (सामन्तसिंह) की राठोड़ राणी मेड़तणी के उदर से चिमनकुंवरी नामक पुत्री हुई, जिसका विवाह लूणावाड़ा के सोलंकी महा- राणा फ़तहसिंह से वि० सं० १८७८ (ई० स० १८२१) में हुआ¹। महारावत सामन्तसिंह के दीर्घ शासन-काल में देवलिया के राज- महलों में कई प्रकार का सुधार हुआ। इसी प्रकार प्रतापगढ़ में भी कई [हाशिया: महारावत के समय के बने हुए] मकान और महल बने। उसकी माता कुंदनकुंवरी [हाशिया: देवालय आदि] ने देवलिया में विष्णु आदि के पांच मंदिर बनवाकर बावड़ी बनवाई एवं उन मंदिरों तथा बावड़ी की प्रतिष्ठा के अवसर पर तुलादान भी किया। महारावत ने स्वयं देवलिया में रघुनाथ-द्वारा नामक मंदिर बनवाकर वि० सं० १८४६ (ई० स० १८०२) में बड़े समारोह के साथ उसकी प्रतिष्ठा की। प्रतापगढ़ राज्य के राजकीय देवालयों में आय की दृष्टि से रघुनाथ-द्वारा विशेष स्थान रखता है²। उसकी पुत्री चिमनकुंवरी ने देवलिया में चंद्रशेखर का शिव-मंदिर (१) लूणावाड़ा राज्य की ख्यात; पत्र ८०, पृ० १। (२) देवलिया के रघुनाथ-द्वारे का वि० सं० १८४६ (ई० स० १८०२) में महारावत सामन्तसिंह ने बड़े समारोहपूर्वक प्रतिष्ठा-महोत्सव कर निम्बार्क सम्प्रदाय के साधु रामकृष्णदास को, जो बर्दवान (कलकत्ता) की तरफ़ से आया हुआ भगवद्भक्त था, महन्त बनाकर उक्त देवालय का सारा प्रबन्ध उसको सौंप दिया। फिर उसका शिष्य पोखरदास वहां का महन्त हुआ, जिसने देवलिया के राजप्रासाद के पीछे 'रघुनाथ सागर' नामक जलाशय बनवाया, जो सार्वजनिक दृष्टि से देवलिया के जलाशयों में बड़ा उप- योगी है। पोखरदास के पीछे क्रमशः केशवदास, उदयदास और मनोहरदास वहां के महन्त हुए। वर्तमान महन्त बालमुकुंददास वि० सं० १६६२ (ई० स० १६०५) में वहां की गद्दी का स्वामी हुआ, जो सरल-चित्त और संतोषी पुरुष है। इस देवालय को भुवांसा, कोलवी और दोतड़ गांव प्रतापगढ़ राज्य की तरफ़ से भेंट में दिये गये हैं और सब मिलाकर यहां की आय पांच सहस्र रुपये वार्षिक मानी जाती है। दशहरे के अवसर पर जब महारावत की सवारी रावण-वध के लिए देवलिया जाती है, तब रघुनाथद्वारे से रामचन्द्र आदि की मूर्तियां भी धूम-धाम से सवारी में स्वयं महारावत साथ रहकर ले जाते हैं और फिर वहां रावण-वध की लीला का प्रदर्शन होता है।
रघुनाथद्वारा, देवलिया
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महारावत सामन्तसिंह २७७ बनवाया। उसकी राणी मेड़तणी दौलतकुंवरी ने देवलिया में युगलकिशोर का विष्णु मंदिर बनवाया। महारावत के समय के शिलालेख, दानपत्र आदि पर्याप्त संख्या में महारावत के समय के शिला- मिलते हैं, परन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से उनमें से लेख और दानपत्र आदि कुछ ही महत्त्वपूर्ण हैं, जिनका सारांश नीचे दिया जाता है— ( १ ) वि० सं० १८३८ माघ सुदि ५ (ई० स० १७८२ ता० १८ जनवरी) शुक्रवार की देवलिया के बड़े जैन मंदिर की प्रशस्ति, जिसमें हूंबड़ जाति और पाडलिया गोत्र के गोविंद आदि का आदिनाथ का प्रासाद बनवाकर उसकी प्रतिष्ठा करने का उल्लेख है। ( २ ) वि० सं० १८४६ आषाढ वदि १३ ( ई० स० १७६६ ता० १ जुलाई ) का प्रतापगढ़ के बाज़ार का शिलालेख, जिसमें प्रतापगढ़ के निवासियों से विना अपराध के दण्ड न लेने का उल्लेख है। ( ३ ) वि० सं० १८५६ माघ सुदि १३ (ई० स० १८०३ ता० ४ फ़रवरी) का ब्राह्मण वेणीराम के नाम का ताम्रपत्र, जिसमें रघुनाथद्वारे की प्रतिष्ठा के अवसर पर गांव अमलावद में १० बीघा ज़मीन पुण्य करने का उल्लेख है। ( ४ ) वि० सं० १८७३ ज्येष्ठ सुदि ४ ( ई० स० १८१६ ता० ३० मई ) सोमवार का द्वारिका के लक्ष्मी, सत्यभामा और राधिका के मंदिरों के पुजारी बालकृष्ण, जयदेव और भंडारी जगन्नाथ के नाम का ताम्रपत्र, जिसमें महारावत की द्वारिका की यात्रा के समय राणी चौहान पूरबणी का अपनी जागीर का चाचाखेड़ी गांव उक्त मंदिरों की भोग सामग्री के लिए भेंट करने और कुंवर दीपसिंह के कथन से उक्त ताम्रपत्र होने का उल्लेख है। ( ५ ) वि० सं० १८७४ द्वितीय श्रावण सुदि १५ ( ई० स० १८१७ ता० २६ अगस्त ) भौमवार का ताम्रपत्र; जिसमें ज्येष्ठ वदि ३० को सूर्य पर्व के समय अपने राज्य में ब्राह्मणों पर, जो "टंकी" की लागत लगती थी, उसके छोड़ने का संकल्प अमलावद के पंडित तारा के नाम होने का उल्लेख है¹। ( १ ) श्रीमन्महाराजाधिराज महारावतजी श्रीसामन्तसिंहजी वचनात्
२७८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास इससे प्रकट है कि वि० सं० १८७४ (ई० स० १८१७.) में महारावत ने द्वारिका की यात्रा की थी और उक्त संवत् के ज्येष्ठ वदि ३० (ता० १६ मई) शुक्रवार को ब्राह्मणों को दी हुई ज़मीन आदि की आय पर टंकी नामक लागत, जो प्रति रुपया एक आना के हिसाब से लगती थी, शंखोद्धार तीर्थ पर छोड़ देने अर्थात् नहीं लेने का संकल्प किया। यह ताम्रपत्र महारावत के कुंवर दीपसिंह के आज्ञा देने पर मेहता वेचरलाल ने लिखा। (६) वि० सं० १८८२ (प्रथम) श्रावण सुदि १५ (ई० स० १८२५ ता० २६ जुलाई) शुक्रवार का भचूंडला, पिपरोड़ा का खेड़ा और माताखेड़ी गांव का ताम्रपत्र, जिसमें उपर्युक्त तीनों गांव द्वारिका में सदाव्रत के लिए कृष्णार्पण करने का उल्लेख है। (७) वि० सं० १८४२ आषाढ सुदि २ (ई० स० १८३५ ता० २६ जून) चन्द्रवार का सेमलखेड़ी गांव का ताम्रपत्र, जिसमें राणी मेड़तणी के बनवाये हुए मंदिर को गांव सेमलखेड़ी भेंट करने का उल्लेख है। कांठलदेश ना समस्त ब्राह्मणां जोग्य अप्रंच श्रीद्वारिकानाथजी नी जात्रा कीदी जदी श्रीबेट शंखोद्धार में ज्येष्ठ विदि ३० अमावस्या रे दिन सूर्य पर्व मध्ये त्राम्वा पत्रिक सर्व ब्राह्मणा ने टंकी लागती हती ते गाम अमलावद नो पंडित तारा साथे हतो तेने हाते श्रीकृष्णार्पण करी दीधी आचन्द्रार्क यावत् उदक अघाट करी सारी लागत वलगट सहित निर्दोष करे दीधी तेनी हमारा वंसनो थई ने ब्राह्मणां थी चोलण करे नहीं चोलण करे जणी ने चित्तोड़ नो पाप छे । अत्र दान वाक्य भूमिं दत्वा भाविनो भूमिपालान् भूयो भूयो याचते रामचंद्रः । सामान्योऽयं दानधर्मो नृपाणां स्वे स्वे काले पालनीयो भवद्भिः ॥ १ ॥ स्वदत्तां परदत्तां वा यो हरेत वसुन्धराम् षष्टि वर्षसहस्राणि विष्ठायां जायते कृमिः । २ । हुकम श्री हजूर नो । दुवे महाराजकुंवरजी श्रीदीपसिंहजी लिखितं मेता वेचर- लाल संवत् १८७४ रा वर्षे मास द्वितीय श्रावण सुदि १५ भौमवासरे। मूल ताम्रपत्र की प्रतिलिपि से।
महारावत सामन्तसिंह २७६ महारावत सामन्तसिंह वीर, उदार और बुद्धिमान राजा था। उसके समय में भी अन्य राज्यों की भांति मरहटों का उपद्रव रहा। कभी-कभी [महारावत का व्यक्तित्व] उसके अधीनस्थ राजपूत सरदार भी वहां पारस्प- रिक वैमनस्य के कारण सिर उठाकर बखेड़ा मचाते और भील, मीणे आदि भी अपना पेशा जारी कर देते थे, पर वह उनके बखेड़े को साम, दाम, दंड और भेद नीति का प्रयोग कर बढ़ने नहीं देता था। मरहटे सरदारों को भी वह कुछ दे-दिलाकर चुप करता था और वे भी उसकी सरलता के कारण उसका मान रखते थे। मरहटों के उपद्रव और भीतरी कलह से उसके समय देश ऊजड़ होकर आबादी कम हो गई, जिससे आय के साधन बन्द होकर समृद्धि घट गई, तो भी उसने अपनी स्वाभाविक उदारता में कमी न आने दी। राज्य-रक्षा के लिए पर्याप्त सैनिक शक्ति की आवश्यकता होती है, पर उस समय आर्थिक स्थिति ठीक न होने से महा- रावत अच्छी सेना नहीं रख सकता था तथापि जागीरदारी प्रथा का प्रचार रहने से उसके राज्य की रक्षा के योग्य वहां लड़ाकू राजपूत सेना का अभाव न था। महारावत की सहृदयता से उसके अधीनस्थ राजपूतों को उसपर पूरा विश्वास था और वे उक्त राज्य की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाज़ी लगा देते थे। वह अपने सरदारों, राजकर्मचारियों, भृत्यों आदि को समय-समय पर जागीर, इनाम आदि देकर सम्मानित करता रहता था, जिससे राज्य-व्यवस्था में कोई अन्तर नहीं होने पाया और न उसके राज्य की सीमा में कमी हुई, जब कि कई पुराने और प्रतिष्ठित राज्य नष्ट हो गये। ऐसे समय में उसकी दयालुता और उदारता ने ही उसकी कीर्ति को दूर-दूर तक फैलाया। तीर्थ-यात्रा का प्रेमी होने के कारण उसने द्वारिका की यात्रा के समय वहां अपनी राणी के द्वारा भोग सामग्री के लिए गांव भेंट कराया और वहां अपनी तरफ़ से नियमित रूप से पुण्य होते रहने के लिए सदाव्रत जारी रख तीन गांव दिये। उसके राज्य-काल में देवलिया के राज्य-महलों में सुधार हुआ और वहां कई देवालय भी बने। धार्मिक भावना से प्रेरित होकर उसने रघुनाथ द्वारे की प्रतिष्ठा के समय तुलादान भी
२८० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास किया। प्रजा से वह प्रेम रखता और उससे अन्यायोचित ढंग से द्रव्य लेना बुरा समझता था। इसलिए भविष्य में बिना किसी अपराध के दण्ड न लेने का पाषाण लेख खुदवाकर उसने प्रतापगढ़ में लगवाया। उसके समय में वि० सं० १८४० (ई० स० १८३३) में प्रतापगढ़ राज्य में अकाल पड़ा और दैवी प्रकोप से महामारी की व्याधि उत्पन्न होकर सहस्रों मनुष्य काल- कवलित हो गये। उस समय उसने प्रजा-पालकता का परिचय देकर वहां के निवासियों को धैर्य बंधाया। वह ईश्वर-भक्त, निरभिमानी और मितव्ययी होने के साथ ही शुद्ध हृदयवाला था। अपनी प्रजा, सामंतवर्ग तथा अन्य राज्यों के साथ उसका व्यवहार अच्छा रहा। दैवी विपत्तियों, मरहटों, सरदारों आदि के उपद्रवों के समय वह कभी विचलित नहीं होता और धैर्य- पूर्वक उनको निवारण करने की चेष्टा करता था। राज्य-वृद्धि की लालसा उसमें न थी। स्वात्माभिमान भी उसमें विद्यमान था, इससे उदयपुर के महा- राणाओं के अधीन सामन्तभाव से रहकर उसने धरियावद के परगने का उपभोग करना अपमानजनक समझ, उसे त्याग दिया। उसके एकमात्र कुंवर दीपसिंह ने कई पुरुषों को मार डाला। इस बात को सुनते ही उस- (महारावत) ने अंग्रेज़ अफ़सरों की राय से उस (दीपसिंह) को अधिकार- च्युत् कर देवलिया में रहने की आज्ञा दी, परन्तु कुंवर ने अपना आचरण नहीं सुधारा एवं प्रतापगढ़ में जाकर फिर उपद्रव करने लगा। तब उसने पुत्र-मोह त्यागकर अंग्रेज़ी सेना-द्वारा उसको दबाकर बंदी करवा दिया, जो उसकी न्याय-वृत्ति का द्योतक है। वह विनम्र, प्रसन्न-चित्त और मृदुभाषी होने के साथ ही शांति-प्रिय शासक था। अंग्रेज़ अफ़सर भी उसका पूरा सम्मान करते थे। उस (सामंतसिंह) का शरीर पतला, क़द लंबा, वर्ण गौर और मुंह गोल था।
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५. महाराणा उदयसिंह व चित्तौड़ का तृतीय शाका
महारावत दलपतसिंह
छठा अध्याय महारावत दलपतसिंह से वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी तक
दलपतसिंह
महारावत सामन्तसिंह ने अपने जीवनकाल में ही अपने पौत्र दल-
पतसिंह को, उसके डूंगरपुर गोद चले जाने पर भी, प्रतापगढ़ राज्य का
[राज्य-प्राप्ति] स्वामी बनाना स्थिर कर अंग्रेज़ सरकार की स्वी-
कृति ले ली थी । तदनुसार सामन्तसिंह का
परलोकवास होने के पीछे वि० सं० १९०० पौष सुदि १५ ( ई० स० १८४४
ता० ५ जनवरी ) को वह प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी हुआ । उसका जन्म
वि० सं० १८६५ मार्गशीर्ष सुदि ६ ( ई० स० १८०८ ता० २६ नवम्बर )
शनिवार को हुआ था¹ ।
तदनन्तर भारत सरकार की तरफ़ से मेवाड़ का पोलिटिकल एजेंट
कर्नल रॉबिन्सन महारावत की गद्दीनशीनी की खिलअत और गवर्नर जनरल
[अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से गद्दीनशीनी की खिलअत आना] का खरीता लेकर देवलिया गया । वहां उसने
एक दरबार में महारावत को गवर्नर जनरल का
खरीता देकर खिलअत में चांदी के हौदे-सहित
हथिनी, चांदी के ज़ेवर-सहित घोड़ा, मोतियों की
माला, सरपेच, मंदील, शाल जोड़ा, चुगा, शाली, रूमाल, परतले-सहित
तलवार, दुनाली बंदूक, तमंचे की जोड़ी, गोशवारा आदि दिये² ।
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( १ ) देखो; ऊपर पृ० २६३ ।
( २ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६६ ।
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२८२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास दलपतसिंह के प्रतापगढ़ में रहने का अवसर पाकर डूंगरपुर का महारावल जसवन्तसिंह पुनः अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए अप्रत्यक्ष महारावल जसवन्तसिंह का रूप से उद्योग कर रहा था। अब दलपतसिंह के डूंगरपुर से वृन्दावन प्रतापगढ़ का स्वामी होने पर डूंगरपुर से उस (दल- भेजा जाना पतसिंह) का स्वत्व उठाने का उसे पुख़्ता कारण मिल गया। कहा जाता है कि दलपतसिंह को डूंगरपुर के साथ-साथ प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी बनाने में जसवन्तसिंह भी रज़ा- मन्द था, परन्तु फिर उसको कुछ उपद्रवियों ने बहकाया, जो स्वार्थ-साधन में संलग्न थे, जिससे वह प्रत्यक्ष रूप से अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए प्रयत्न कर दलपतसिंह का डूंगरपुर से अधिकार उठाने की चेष्टा करने लगा और डूंगरपुर के स्वत्वाधिकारी भी यह अवसर अपने अनुकूल समझ हक़दारी का दावा पेश करने लगे। महारावल ने परिणाम का कुछ विचार किये बिना ही नांदली के ठाकुर हिम्मतसिंह के पुत्र मोहकमसिंह को गोद लेकर गुप्त रूप से गोदनशीनी का दस्तूर करना चाहा¹। उस समय डूंगरपुर का राज्य-कार्य दलपतसिंह की ओर से सूरमा अभयसिंह और सोलंकी उदयसिंह चलाते थे। उन्होंने एक तरफ़ तो नांदली के ठाकुर के पुत्र को दत्तक लेने के लिए महारावल को सलाह दी और दूसरी तरफ़ महारावत को, महारावल की इस कार्यवाही का विवरण लिख भेजा और खेरवाड़ा जाकर कप्तान हंटर को—जो डूंगरपुर राज्य के राजनैतिक कार्य के लिए पोलिटिकल अफ़सर था—यह सारा हाल बतलाया। दलपतसिंह की डूंगरपुर में गोदनशीनी और डूंगरपुर के साथ-साथ प्रतापगढ़ का स्वामी बनाने की स्वीकृति अंग्रेज़ सरकार ने दे दी थी। अतएव मोहकमसिंह की गोदनशीनी में दलपतसिंह की अनुमति और अंग्रेज़ सरकार की स्वीकृति आवश्यक थी, परन्तु महारावल ने बिना स्वीकृति के यह कार्य किया। इस- लिए कप्तान हंटर महारावल की कार्यवाही को रोकने के लिए मेवाड़ भील कोर के साथ डूंगरपुर पहुंचा और उसने वहां घेरा डाल दिया। इसके ( १ ) मेरा डूंगरपुर राज्य का इतिहास; पृ० १५२।
महारावत दलपतसिंह. २८३ साथ ही सूरमा अभयसिंह और सोलंकी उदयसिंह ने भी राज्य-महलों पर आक्रमण कर दिया, जिससे महारावल का सारा कार्यक्रम निष्फल हो गया और गोदनशीनी की कार्यवाही बंद हो गई। उस समय कर्नल रॉबिन्सन मेवाड़ का पोलिटिकल एजेंट था१। ज्योंही उसके पास यह समाचार पहुंचा, उसने महारावत दलपंतसिंह को शीघ्र ही डूंगरपुर पहुंचने के लिए लिखा। तब वह (दलपतसिंह) भी अपनी सेना-सहित वहां गया। इस अवसर पर जसवन्तसिंह ने उदयपुर के महाराणा के पास अपना आदमी भेज सहायता चाही२। महाराणा ने प्रत्यक्षरूप से तो उसको कोई सहायता न दी और पोलिटिकल एजेंट कर्नल रॉबिन्सन से इस मामले में (१) प्रतापगढ़ राज्य का राजनैतिक सम्बन्ध प्रारम्भ में मालवा के एजेंट गवर्नर-जेनरल के साथ रखा गया। फिर राजपूताना के राज्यों के लिए पृथक् एजेंट गवर्नर-जेनरल का पद निर्धारित होने पर उसकी अधीनता में मेवाड़ में पोलिटिकल एजेंट रखा गया, जो नीमच में रहता था। इसी कारण मेवाड़ के पोलिटिकल एजेंट कर्नल रॉबिन्सन को डूंगरपुर के मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा, क्योंकि डूंगरपुर राज्य का राजनैतिक सम्बन्ध भी मेवाड़ की एजेंसी के अन्तर्गत था। कर्नल रॉबिन्सन ई० स० १८३८ से ४० (वि० सं० १८६५ से १६०७) तक मेवाड़ का पोलिटिकल एजेंट रहा और ई० स० १८४० ता० १७ जून (वि० सं० १६०७ ज्येष्ठ सुदि ८) को उसकी मृत्यु हुई। बांसवाड़ा के महारावल लक्ष्मणसिंह और कुशलगढ़ के राव हमीरसिंह के बीच होनेवाले झगड़े में बांसवाड़ा की तरफ़ से ज्यादती के अतिरिक्त जालसाज़ी भी प्रमाणित हुई। तब वहां मेवाड़ के पोलिटिकल एजेंट का असिस्टेन्ट रहना तय पाया गया, जिसके साथ पीछे से प्रतापगढ़ राज्य का सम्बन्ध भी रखा गया। तदनन्तर मेवाड़ के पोलिटिकल एजेंट के ओह्दे में परिवर्त्तन होकर उसका नाम रेज़िडेन्ट मेवाड़ रखा गया। उस समय बांसवाड़ा में रहनेवाला सरकारी अफ़सर असिस्टेन्ट रेज़िडेन्ट मेवाड़ कहलाने लगा। इसके पीछे असिस्टेन्ट रेज़िडेन्ट मेवाड़ का पद टूटकर उसके स्थान में दक्षिणी राजपूताना के पोलिटिकल एजेंट के नवीन पद की सृष्टि हुई और डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ राज्य तथा कुशलगढ़ ठिकाने का राजनैतिक सम्बन्ध उससे रखा गया, जो इस समय तक जारी है। (२) महारावल जसवन्तसिंह (दूसरा) का उदयपुर राज्य के भूतपूर्व मन्त्री मेहता रामसिंह के नाम का वि० सं० १६०० फाल्गुन वदि १४ (पूर्णिमांत चैत्र वदि १४ = ई० स० १८४४ ता० १७ मार्च) का पत्र।
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२८४ | प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
लिखा-पढ़ी कर उसे यह सुझाया कि दलपतसिंह एक ही जगह का स्वामी रह सकता है, दोनों जगहों का नहीं । इसपर अंग्रेज़ अफ़सरों ने इस विषय को विचारणीय रक्खा; परन्तु जसवन्तसिंह का डूंगरपुर में रहना उपद्रव- जनक समझ उसका वृन्दावन में रहना स्थिर होकर वि० सं० १६०१ (ई० स० १८४५) में वह वृन्दावन भेज दिया गया और एक सहस्र रुपये प्रति मास उसके व्यय के लिए नियत हुए¹। नांदली का ठाकुर हिम्मतसिंह, जो इस उपद्रव का मूल कारण बतलाया गया था, बंदी किया गया और महारावल को बहकानेवाले कुछ आदमी भी बंदी किये गये, जिससे उस समय उपद्रव शांत हो गया । फिर पूर्ववत दलपतसिंह ही, कई बाधाएं उपस्थित होने पर भी, डूंगरपुर का राज्य-कार्य चलाता रहा । वि० सं० १६०२ पौष सुदि ६ (ई० स० १८४६ ता० ३ जनवरी) को महारावल जसवन्तसिंह का वृन्दावन में ही देहान्त हो गया ।
(बाएँ हाशिये का पाठ): महारावल जसवन्तसिंह का वृन्दावन में देहान्त होना और सांवली के ठाकुर के पुत्र उदयसिंह का डूंगरपुर का स्वामी होना
(मुख्य पाठ): महारावत दलपतसिंह प्रतापगढ़ में रहता हुआ डूंगरपुर राज्य को भी अपने अधिकार में रखना चाहता था । यह बात जसवन्तसिंह को अखरती थी, इसलिए उसने दलपतसिंह को डूंगरपुर के राज्य से वंचित रखने के लिए अंग्रेज़ अफ़सरों से प्रकट वा अप्रकट रूप से कई बार अनुरोध भी किया; परन्तु महारावत सामन्तसिंह की विद्यमानता के कारण उस समय इस विषय पर कुछ ध्यान नहीं दिया गया । सामन्तसिंह के देहावसान के पीछे दलपतसिंह के प्रतापगढ़ की गद्दी पर बैठने, डूंगरपुर में जसवन्तसिंह के नांदली के ठाकुर के पुत्र मोहकमसिंह को गोद लेने के बारे में उपद्रव होने और फिर जस- वन्तसिंह का वृन्दावन में देहान्त हो जाने पर उसकी राणियों, सरदारों आदि द्वारा वहां उत्तराधिकारी नियत करने के सम्बन्ध में प्रार्थनाएं होने पर अंग्रेज़ सरकार का इस ओर ध्यान आकृष्ट हुआ । उदयपुर के महाराणा स्वरूपसिंह-द्वारा पोलिटिकल अफ़सरों के पास दलपतसिंह के डूंगरपुर
(१) एचिसन; ट्रीटीज़, एंगेजमेंट्स एण्ड सनद्ज़; जि० ३, पृ० ४४१ ।
पर अधिकार रहने के सम्बन्ध में विरोध किया गया। इस प्रश्न पर अंग्रेज़ सरकार गंभीरतापूर्वक विचार करने लगी। महारावत दलपतसिंह के उस समय कोई कुंवर न था। इसलिए बहुत कुछ सोच-विचार के पीछे यह निश्चय किया गया कि महारावत दलपतसिंह डूंगरपुर के राजवंश में से किसी व्यक्ति को अपना दत्तक बना लेवे, जो डूंगरपुर का स्वामी रहे । अंग्रेज़ सरकार के इस निर्णय को डूंगरपुर की राजमहिषियों, सरदारों आदि ने भी स्वीकार किया। अन्त में डूंगरपुर के राजवंश में से साबलो के ठाकुर जसवन्तसिंह के तृतीय पुत्र उदयसिंह को वहां की राजमहिषियों तथा सरदारों ने दलपतसिंह की गोद बिठाया और उस (उदयसिंह) को दलपतसिंह के पास भेजा, जिसको उस (दलपतसिंह) ने भी स्वीकार कर अंग्रेज़ सरकार के पास इस निर्णय की स्वीकृति के लिए आकांक्षा प्रकट की। अंग्रेज़ सरकार ने भी उदयसिंह की गोदनशीनी को स्वीकार किया और वि० सं० १९०३ (ई० स० १८४६) में वह (उदयसिंह) डूंगरपुर का स्वामी बनाया गया१; किन्तु उसकी बाल्यावस्था के कारण वहां का शासन दलपतसिंह की सम्मति के अनुसार होना स्थिर हुआ और उसकी विद्यमानता में अंग्रेज़ अधिकारी उस (उदयसिंह) को कुंवर ही लिखते रहे। वि० सं० १९०५ आषाढ वदि १३ (ई० स० १८४८ ता० २६ जून) को महारावत दलपतसिंह के कुंवर उदयसिंह का जन्म हुआ। एक लंबी अवधि के बाद महारावत के यहां कुंवर का जन्म [महाराजकुमार उदयसिंह का जन्म] होने से बड़ा हर्ष मनाया गया और वहां की प्रजा भी प्रफुल्लित हो गई। महारावत ने अपने राज्य की स्थिति के अनुसार इस अवसर पर बहुत कुछ उदारता प्रकट की। डूंगरपुर राज्य का प्रबन्ध महारावत दलपतसिंह की आज्ञानुसार वि० सं० १९०६ (ई० स० १८५२) तक होता रहा, परन्तु वहां के सरदार (१) मेरा डूंगरपुर राज्य का इतिहास; पृ० १६० ।
२८६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास सूरमा अभयसिंह और सोलंकी उदयसिंह, जब डूंगरपुर का शासनाधिकार भी उनका स्वार्थ सिद्ध न होता, राज्य में कोई छूटना उपद्रव कर बैठते थे । इससे राज्य-प्रबन्ध में सुधार नहीं हो पाता था और राज्य ऋण-ग्रस्त हो गया। इस ओर पोलिटिकल अफ़सरों के ध्यान दिलाने पर महारावत दलपतसिंह ने सूरमा अभयसिंह और सोलंकी उदयसिंह को कामदार के पद से हटाकर ठाकरड़े के ठाकुर गुलावसिंह और गुलावचन्द गांधी को उस पद पर नियत किया। उन्हीं दिनों अंग्रेज़ सरकार ने भी वहां के शासन-प्रबन्ध को ठीक करने के लिए मुंशी सफ़दरअलीखां को डूंगरपुर भेजा, जिसके वहां पहुंचने पर सूरमा अभयसिंह आदि ने अपना स्वार्थ सिद्ध न होता देख पांच हज़ार भीलों को एकत्रित कर उपद्रव करना चाहा, जिसका खेरवाड़ा से कप्तान ब्रुक ने जाकर दमन किया और कर्नल रॉबिन्सन के लिखने पर उपद्रवियों को दण्ड देने के लिए महारावत दलपतसिंह ने भी प्रतापगढ़ से अपनी सेना भेज दी। कप्तान ब्रुक के साथ मेवाड़ भील-कोर के डूंगरपुर पहुंचने और उस समय प्रतापगढ़ से भी सेना आ जाने से अभयसिंह और उसके साथी भय- भीत हो गये, जिससे वहां का उपद्रव शांत हो गया। अन्त में अभयसिंह और उदयसिंह प्रतापगढ़ जाकर महारावत के पास उपस्थित हुए और उन्होंने पच्चीस हज़ार रुपये महारावत को नज़राने के देकर अपने क़सूरों की माफ़ी चाही और भविष्य के लिए इमानदार बने रहने का इक़रार लिख दिया। उपर्युक्त कार्यवाही के पीछे भी वहां शासन-कार्य में गड़बड़ी होने लगी और लोग अव्यवस्था का सारा दोष महारावत दलपतसिंह के मत्थे मढ़कर उसकी शिकायत कराने लगे। तब कप्तान ब्रुक ने खेरवाड़ा से डूंगरपुर जाकर इस मामले की तहक़ीक़ात की और महारावत के डूंगर- पुर के कार्यों में हस्तक्षेप से ही अव्यवस्था होना बतलाया। इसपर मेवाड़ का पोलिटिकल एजेंट जॉर्ज लॉरेंस डूंगरपुर गया। उस समय सूरमा अभयसिंह आदि ने कई सरदारों और प्रजा आदि को मिलाकर महारावत की शिकायत करवाई। जॉर्ज लॉरेंस ने महारावत को प्रतापगढ़ से डूंगरपुर