राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
DevanagariHindipublished534 पृष्ठ
पृष्ठ 342, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 342
छठा अध्याय महारावत दलपतसिंह से वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी तक
दलपतसिंह
महारावत सामन्तसिंह ने अपने जीवनकाल में ही अपने पौत्र दल-
पतसिंह को, उसके डूंगरपुर गोद चले जाने पर भी, प्रतापगढ़ राज्य का
[राज्य-प्राप्ति] स्वामी बनाना स्थिर कर अंग्रेज़ सरकार की स्वी-
कृति ले ली थी । तदनुसार सामन्तसिंह का
परलोकवास होने के पीछे वि० सं० १९०० पौष सुदि १५ ( ई० स० १८४४
ता० ५ जनवरी ) को वह प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी हुआ । उसका जन्म
वि० सं० १८६५ मार्गशीर्ष सुदि ६ ( ई० स० १८०८ ता० २६ नवम्बर )
शनिवार को हुआ था¹ ।
तदनन्तर भारत सरकार की तरफ़ से मेवाड़ का पोलिटिकल एजेंट
कर्नल रॉबिन्सन महारावत की गद्दीनशीनी की खिलअत और गवर्नर जनरल
[अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से गद्दीनशीनी की खिलअत आना] का खरीता लेकर देवलिया गया । वहां उसने
एक दरबार में महारावत को गवर्नर जनरल का
खरीता देकर खिलअत में चांदी के हौदे-सहित
हथिनी, चांदी के ज़ेवर-सहित घोड़ा, मोतियों की
माला, सरपेच, मंदील, शाल जोड़ा, चुगा, शाली, रूमाल, परतले-सहित
तलवार, दुनाली बंदूक, तमंचे की जोड़ी, गोशवारा आदि दिये² ।
---------------------------------------------------------------------------------------------------------
( १ ) देखो; ऊपर पृ० २६३ ।
( २ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६६ ।
३६