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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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२८२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास दलपतसिंह के प्रतापगढ़ में रहने का अवसर पाकर डूंगरपुर का महारावल जसवन्तसिंह पुनः अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए अप्रत्यक्ष महारावल जसवन्तसिंह का रूप से उद्योग कर रहा था। अब दलपतसिंह के डूंगरपुर से वृन्दावन प्रतापगढ़ का स्वामी होने पर डूंगरपुर से उस (दल- भेजा जाना पतसिंह) का स्वत्व उठाने का उसे पुख़्ता कारण मिल गया। कहा जाता है कि दलपतसिंह को डूंगरपुर के साथ-साथ प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी बनाने में जसवन्तसिंह भी रज़ा- मन्द था, परन्तु फिर उसको कुछ उपद्रवियों ने बहकाया, जो स्वार्थ-साधन में संलग्न थे, जिससे वह प्रत्यक्ष रूप से अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए प्रयत्न कर दलपतसिंह का डूंगरपुर से अधिकार उठाने की चेष्टा करने लगा और डूंगरपुर के स्वत्वाधिकारी भी यह अवसर अपने अनुकूल समझ हक़दारी का दावा पेश करने लगे। महारावल ने परिणाम का कुछ विचार किये बिना ही नांदली के ठाकुर हिम्मतसिंह के पुत्र मोहकमसिंह को गोद लेकर गुप्त रूप से गोदनशीनी का दस्तूर करना चाहा¹। उस समय डूंगरपुर का राज्य-कार्य दलपतसिंह की ओर से सूरमा अभयसिंह और सोलंकी उदयसिंह चलाते थे। उन्होंने एक तरफ़ तो नांदली के ठाकुर के पुत्र को दत्तक लेने के लिए महारावल को सलाह दी और दूसरी तरफ़ महारावत को, महारावल की इस कार्यवाही का विवरण लिख भेजा और खेरवाड़ा जाकर कप्तान हंटर को—जो डूंगरपुर राज्य के राजनैतिक कार्य के लिए पोलिटिकल अफ़सर था—यह सारा हाल बतलाया। दलपतसिंह की डूंगरपुर में गोदनशीनी और डूंगरपुर के साथ-साथ प्रतापगढ़ का स्वामी बनाने की स्वीकृति अंग्रेज़ सरकार ने दे दी थी। अतएव मोहकमसिंह की गोदनशीनी में दलपतसिंह की अनुमति और अंग्रेज़ सरकार की स्वीकृति आवश्यक थी, परन्तु महारावल ने बिना स्वीकृति के यह कार्य किया। इस- लिए कप्तान हंटर महारावल की कार्यवाही को रोकने के लिए मेवाड़ भील कोर के साथ डूंगरपुर पहुंचा और उसने वहां घेरा डाल दिया। इसके ( १ ) मेरा डूंगरपुर राज्य का इतिहास; पृ० १५२।