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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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महारावत दलपतसिंह. २८३ साथ ही सूरमा अभयसिंह और सोलंकी उदयसिंह ने भी राज्य-महलों पर आक्रमण कर दिया, जिससे महारावल का सारा कार्यक्रम निष्फल हो गया और गोदनशीनी की कार्यवाही बंद हो गई। उस समय कर्नल रॉबिन्सन मेवाड़ का पोलिटिकल एजेंट था१। ज्योंही उसके पास यह समाचार पहुंचा, उसने महारावत दलपंतसिंह को शीघ्र ही डूंगरपुर पहुंचने के लिए लिखा। तब वह (दलपतसिंह) भी अपनी सेना-सहित वहां गया। इस अवसर पर जसवन्तसिंह ने उदयपुर के महाराणा के पास अपना आदमी भेज सहायता चाही२। महाराणा ने प्रत्यक्षरूप से तो उसको कोई सहायता न दी और पोलिटिकल एजेंट कर्नल रॉबिन्सन से इस मामले में (१) प्रतापगढ़ राज्य का राजनैतिक सम्बन्ध प्रारम्भ में मालवा के एजेंट गवर्नर-जेनरल के साथ रखा गया। फिर राजपूताना के राज्यों के लिए पृथक् एजेंट गवर्नर-जेनरल का पद निर्धारित होने पर उसकी अधीनता में मेवाड़ में पोलिटिकल एजेंट रखा गया, जो नीमच में रहता था। इसी कारण मेवाड़ के पोलिटिकल एजेंट कर्नल रॉबिन्सन को डूंगरपुर के मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा, क्योंकि डूंगरपुर राज्य का राजनैतिक सम्बन्ध भी मेवाड़ की एजेंसी के अन्तर्गत था। कर्नल रॉबिन्सन ई० स० १८३८ से ४० (वि० सं० १८६५ से १६०७) तक मेवाड़ का पोलिटिकल एजेंट रहा और ई० स० १८४० ता० १७ जून (वि० सं० १६०७ ज्येष्ठ सुदि ८) को उसकी मृत्यु हुई। बांसवाड़ा के महारावल लक्ष्मणसिंह और कुशलगढ़ के राव हमीरसिंह के बीच होनेवाले झगड़े में बांसवाड़ा की तरफ़ से ज्यादती के अतिरिक्त जालसाज़ी भी प्रमाणित हुई। तब वहां मेवाड़ के पोलिटिकल एजेंट का असिस्टेन्ट रहना तय पाया गया, जिसके साथ पीछे से प्रतापगढ़ राज्य का सम्बन्ध भी रखा गया। तदनन्तर मेवाड़ के पोलिटिकल एजेंट के ओह्दे में परिवर्त्तन होकर उसका नाम रेज़िडेन्ट मेवाड़ रखा गया। उस समय बांसवाड़ा में रहनेवाला सरकारी अफ़सर असिस्टेन्ट रेज़िडेन्ट मेवाड़ कहलाने लगा। इसके पीछे असिस्टेन्ट रेज़िडेन्ट मेवाड़ का पद टूटकर उसके स्थान में दक्षिणी राजपूताना के पोलिटिकल एजेंट के नवीन पद की सृष्टि हुई और डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ राज्य तथा कुशलगढ़ ठिकाने का राजनैतिक सम्बन्ध उससे रखा गया, जो इस समय तक जारी है। (२) महारावल जसवन्तसिंह (दूसरा) का उदयपुर राज्य के भूतपूर्व मन्त्री मेहता रामसिंह के नाम का वि० सं० १६०० फाल्गुन वदि १४ (पूर्णिमांत चैत्र वदि १४ = ई० स० १८४४ ता० १७ मार्च) का पत्र।