राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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२८४ | प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
लिखा-पढ़ी कर उसे यह सुझाया कि दलपतसिंह एक ही जगह का स्वामी रह सकता है, दोनों जगहों का नहीं । इसपर अंग्रेज़ अफ़सरों ने इस विषय को विचारणीय रक्खा; परन्तु जसवन्तसिंह का डूंगरपुर में रहना उपद्रव- जनक समझ उसका वृन्दावन में रहना स्थिर होकर वि० सं० १६०१ (ई० स० १८४५) में वह वृन्दावन भेज दिया गया और एक सहस्र रुपये प्रति मास उसके व्यय के लिए नियत हुए¹। नांदली का ठाकुर हिम्मतसिंह, जो इस उपद्रव का मूल कारण बतलाया गया था, बंदी किया गया और महारावल को बहकानेवाले कुछ आदमी भी बंदी किये गये, जिससे उस समय उपद्रव शांत हो गया । फिर पूर्ववत दलपतसिंह ही, कई बाधाएं उपस्थित होने पर भी, डूंगरपुर का राज्य-कार्य चलाता रहा । वि० सं० १६०२ पौष सुदि ६ (ई० स० १८४६ ता० ३ जनवरी) को महारावल जसवन्तसिंह का वृन्दावन में ही देहान्त हो गया ।
(बाएँ हाशिये का पाठ): महारावल जसवन्तसिंह का वृन्दावन में देहान्त होना और सांवली के ठाकुर के पुत्र उदयसिंह का डूंगरपुर का स्वामी होना
(मुख्य पाठ): महारावत दलपतसिंह प्रतापगढ़ में रहता हुआ डूंगरपुर राज्य को भी अपने अधिकार में रखना चाहता था । यह बात जसवन्तसिंह को अखरती थी, इसलिए उसने दलपतसिंह को डूंगरपुर के राज्य से वंचित रखने के लिए अंग्रेज़ अफ़सरों से प्रकट वा अप्रकट रूप से कई बार अनुरोध भी किया; परन्तु महारावत सामन्तसिंह की विद्यमानता के कारण उस समय इस विषय पर कुछ ध्यान नहीं दिया गया । सामन्तसिंह के देहावसान के पीछे दलपतसिंह के प्रतापगढ़ की गद्दी पर बैठने, डूंगरपुर में जसवन्तसिंह के नांदली के ठाकुर के पुत्र मोहकमसिंह को गोद लेने के बारे में उपद्रव होने और फिर जस- वन्तसिंह का वृन्दावन में देहान्त हो जाने पर उसकी राणियों, सरदारों आदि द्वारा वहां उत्तराधिकारी नियत करने के सम्बन्ध में प्रार्थनाएं होने पर अंग्रेज़ सरकार का इस ओर ध्यान आकृष्ट हुआ । उदयपुर के महाराणा स्वरूपसिंह-द्वारा पोलिटिकल अफ़सरों के पास दलपतसिंह के डूंगरपुर
(१) एचिसन; ट्रीटीज़, एंगेजमेंट्स एण्ड सनद्ज़; जि० ३, पृ० ४४१ ।