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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 534 में से

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पर अधिकार रहने के सम्बन्ध में विरोध किया गया। इस प्रश्न पर अंग्रेज़ सरकार गंभीरतापूर्वक विचार करने लगी। महारावत दलपतसिंह के उस समय कोई कुंवर न था। इसलिए बहुत कुछ सोच-विचार के पीछे यह निश्चय किया गया कि महारावत दलपतसिंह डूंगरपुर के राजवंश में से किसी व्यक्ति को अपना दत्तक बना लेवे, जो डूंगरपुर का स्वामी रहे । अंग्रेज़ सरकार के इस निर्णय को डूंगरपुर की राजमहिषियों, सरदारों आदि ने भी स्वीकार किया। अन्त में डूंगरपुर के राजवंश में से साबलो के ठाकुर जसवन्तसिंह के तृतीय पुत्र उदयसिंह को वहां की राजमहिषियों तथा सरदारों ने दलपतसिंह की गोद बिठाया और उस (उदयसिंह) को दलपतसिंह के पास भेजा, जिसको उस (दलपतसिंह) ने भी स्वीकार कर अंग्रेज़ सरकार के पास इस निर्णय की स्वीकृति के लिए आकांक्षा प्रकट की। अंग्रेज़ सरकार ने भी उदयसिंह की गोदनशीनी को स्वीकार किया और वि० सं० १९०३ (ई० स० १८४६) में वह (उदयसिंह) डूंगरपुर का स्वामी बनाया गया१; किन्तु उसकी बाल्यावस्था के कारण वहां का शासन दलपतसिंह की सम्मति के अनुसार होना स्थिर हुआ और उसकी विद्यमानता में अंग्रेज़ अधिकारी उस (उदयसिंह) को कुंवर ही लिखते रहे। वि० सं० १९०५ आषाढ वदि १३ (ई० स० १८४८ ता० २६ जून) को महारावत दलपतसिंह के कुंवर उदयसिंह का जन्म हुआ। एक लंबी अवधि के बाद महारावत के यहां कुंवर का जन्म [महाराजकुमार उदयसिंह का जन्म] होने से बड़ा हर्ष मनाया गया और वहां की प्रजा भी प्रफुल्लित हो गई। महारावत ने अपने राज्य की स्थिति के अनुसार इस अवसर पर बहुत कुछ उदारता प्रकट की। डूंगरपुर राज्य का प्रबन्ध महारावत दलपतसिंह की आज्ञानुसार वि० सं० १९०६ (ई० स० १८५२) तक होता रहा, परन्तु वहां के सरदार (१) मेरा डूंगरपुर राज्य का इतिहास; पृ० १६० ।

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