राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास सूरमा अभयसिंह और सोलंकी उदयसिंह, जब डूंगरपुर का शासनाधिकार भी उनका स्वार्थ सिद्ध न होता, राज्य में कोई छूटना उपद्रव कर बैठते थे । इससे राज्य-प्रबन्ध में सुधार नहीं हो पाता था और राज्य ऋण-ग्रस्त हो गया। इस ओर पोलिटिकल अफ़सरों के ध्यान दिलाने पर महारावत दलपतसिंह ने सूरमा अभयसिंह और सोलंकी उदयसिंह को कामदार के पद से हटाकर ठाकरड़े के ठाकुर गुलावसिंह और गुलावचन्द गांधी को उस पद पर नियत किया। उन्हीं दिनों अंग्रेज़ सरकार ने भी वहां के शासन-प्रबन्ध को ठीक करने के लिए मुंशी सफ़दरअलीखां को डूंगरपुर भेजा, जिसके वहां पहुंचने पर सूरमा अभयसिंह आदि ने अपना स्वार्थ सिद्ध न होता देख पांच हज़ार भीलों को एकत्रित कर उपद्रव करना चाहा, जिसका खेरवाड़ा से कप्तान ब्रुक ने जाकर दमन किया और कर्नल रॉबिन्सन के लिखने पर उपद्रवियों को दण्ड देने के लिए महारावत दलपतसिंह ने भी प्रतापगढ़ से अपनी सेना भेज दी। कप्तान ब्रुक के साथ मेवाड़ भील-कोर के डूंगरपुर पहुंचने और उस समय प्रतापगढ़ से भी सेना आ जाने से अभयसिंह और उसके साथी भय- भीत हो गये, जिससे वहां का उपद्रव शांत हो गया। अन्त में अभयसिंह और उदयसिंह प्रतापगढ़ जाकर महारावत के पास उपस्थित हुए और उन्होंने पच्चीस हज़ार रुपये महारावत को नज़राने के देकर अपने क़सूरों की माफ़ी चाही और भविष्य के लिए इमानदार बने रहने का इक़रार लिख दिया। उपर्युक्त कार्यवाही के पीछे भी वहां शासन-कार्य में गड़बड़ी होने लगी और लोग अव्यवस्था का सारा दोष महारावत दलपतसिंह के मत्थे मढ़कर उसकी शिकायत कराने लगे। तब कप्तान ब्रुक ने खेरवाड़ा से डूंगरपुर जाकर इस मामले की तहक़ीक़ात की और महारावत के डूंगर- पुर के कार्यों में हस्तक्षेप से ही अव्यवस्था होना बतलाया। इसपर मेवाड़ का पोलिटिकल एजेंट जॉर्ज लॉरेंस डूंगरपुर गया। उस समय सूरमा अभयसिंह आदि ने कई सरदारों और प्रजा आदि को मिलाकर महारावत की शिकायत करवाई। जॉर्ज लॉरेंस ने महारावत को प्रतापगढ़ से डूंगरपुर