राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत दलपतसिंह २८७ में बुलाया और वहां के प्रबन्ध के विषय में महारावत को नौ शर्तें लिखकर दीं, परन्तु महारावत ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। इसपर लॉरेंस ने दलपत- सिंह-द्वारा डूंगरपुर के शासनकार्य में किसी प्रकार का हस्तक्षेप न होने के लिए सदर में रिपोर्ट की, जिसकी स्वीकृति आने पर महारावत का डूंगरपुर से दख़ल उठा दिया गया । भारत के गवर्नर जेनरल लॉर्ड डलहौज़ी की अनुदार नीति के कारण सारे भारत में असंतोष फैल गया था, ऐसे में बंगाल के सैनिकों सिपाही विद्रोह के समय में एक नई बंदूक़, जिसके कारतूस के सिरे को अंग्रेज़ सरकार को प्रताप- दांत से काटना पड़ता था, प्रचार किया गया। गढ़ राज्य से सहायता इस बन्दूक़ के संबंध में ई० स० १८४७ के जनवरी मिलना ( वि० सं० १९१३ माघ) मास में यह अफ़वाह फैली कि इसके कारतूस पर गाय और सूअर की चर्बी लगी है। क्रमशः भारत के प्रत्येक स्थान में फैलती हुई जब यह बात धर्मभीरु भारतीय सैनिकों के कानों तक पहुंची, तब वे धर्मनाश की आशंका से विचलित होकर अंग्रेज़ सरकार के विरुद्ध हो गये । सर्वप्रथम कलकत्ते के पास दम- दम की छावनी में सिपाही विद्रोह के लक्षण प्रकट हुए। फिर शनैः-शनैः बारकपुर, मेरठ, दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, बरेली, झांसी आदि स्थानों के सैनिक भी बिगड़ उठे और इस विद्रोह में अन्य कई व्यक्तियों ने भी, जिनका स्वार्थ सिद्ध न होता था, भाग लिया' । ब्रिटिश भारत के इस सिपाही विद्रोह का प्रभाव राजपूताने की अंग्रेज़ी छावनियों पर भी बहुत कुछ पड़ा और वहां भी अधिकांश स्थानों में सिपाही विद्रोह हो गया। ता० २७ मई ( वि० सं० १६१४ ज्येष्ठ सुदि ४) को मुहम्मदअली नामक सवार के बहकाने से नीमच की सेना भी बाग़ी हो गई और उसने छावनी जलाकर ख़ज़ाना लूट लिया। उस समय मेवाड़ का पोलिटिकल एजेंट कप्तान शावर्स आबू से उदयपुर गया हुआ था। ता० ६ जून (ज्येष्ठ सुदि १४) को यह समाचार पाते ही वह वहां से उदयपुर की (१) मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ०-७६७ ।