राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
२८२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास दलपतसिंह के प्रतापगढ़ में रहने का अवसर पाकर डूंगरपुर का महारावल जसवन्तसिंह पुनः अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए अप्रत्यक्ष महारावल जसवन्तसिंह का रूप से उद्योग कर रहा था। अब दलपतसिंह के डूंगरपुर से वृन्दावन प्रतापगढ़ का स्वामी होने पर डूंगरपुर से उस (दल- भेजा जाना पतसिंह) का स्वत्व उठाने का उसे पुख़्ता कारण मिल गया। कहा जाता है कि दलपतसिंह को डूंगरपुर के साथ-साथ प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी बनाने में जसवन्तसिंह भी रज़ा- मन्द था, परन्तु फिर उसको कुछ उपद्रवियों ने बहकाया, जो स्वार्थ-साधन में संलग्न थे, जिससे वह प्रत्यक्ष रूप से अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए प्रयत्न कर दलपतसिंह का डूंगरपुर से अधिकार उठाने की चेष्टा करने लगा और डूंगरपुर के स्वत्वाधिकारी भी यह अवसर अपने अनुकूल समझ हक़दारी का दावा पेश करने लगे। महारावल ने परिणाम का कुछ विचार किये बिना ही नांदली के ठाकुर हिम्मतसिंह के पुत्र मोहकमसिंह को गोद लेकर गुप्त रूप से गोदनशीनी का दस्तूर करना चाहा¹। उस समय डूंगरपुर का राज्य-कार्य दलपतसिंह की ओर से सूरमा अभयसिंह और सोलंकी उदयसिंह चलाते थे। उन्होंने एक तरफ़ तो नांदली के ठाकुर के पुत्र को दत्तक लेने के लिए महारावल को सलाह दी और दूसरी तरफ़ महारावत को, महारावल की इस कार्यवाही का विवरण लिख भेजा और खेरवाड़ा जाकर कप्तान हंटर को—जो डूंगरपुर राज्य के राजनैतिक कार्य के लिए पोलिटिकल अफ़सर था—यह सारा हाल बतलाया। दलपतसिंह की डूंगरपुर में गोदनशीनी और डूंगरपुर के साथ-साथ प्रतापगढ़ का स्वामी बनाने की स्वीकृति अंग्रेज़ सरकार ने दे दी थी। अतएव मोहकमसिंह की गोदनशीनी में दलपतसिंह की अनुमति और अंग्रेज़ सरकार की स्वीकृति आवश्यक थी, परन्तु महारावल ने बिना स्वीकृति के यह कार्य किया। इस- लिए कप्तान हंटर महारावल की कार्यवाही को रोकने के लिए मेवाड़ भील कोर के साथ डूंगरपुर पहुंचा और उसने वहां घेरा डाल दिया। इसके ( १ ) मेरा डूंगरपुर राज्य का इतिहास; पृ० १५२।
महारावत दलपतसिंह. २८३ साथ ही सूरमा अभयसिंह और सोलंकी उदयसिंह ने भी राज्य-महलों पर आक्रमण कर दिया, जिससे महारावल का सारा कार्यक्रम निष्फल हो गया और गोदनशीनी की कार्यवाही बंद हो गई। उस समय कर्नल रॉबिन्सन मेवाड़ का पोलिटिकल एजेंट था१। ज्योंही उसके पास यह समाचार पहुंचा, उसने महारावत दलपंतसिंह को शीघ्र ही डूंगरपुर पहुंचने के लिए लिखा। तब वह (दलपतसिंह) भी अपनी सेना-सहित वहां गया। इस अवसर पर जसवन्तसिंह ने उदयपुर के महाराणा के पास अपना आदमी भेज सहायता चाही२। महाराणा ने प्रत्यक्षरूप से तो उसको कोई सहायता न दी और पोलिटिकल एजेंट कर्नल रॉबिन्सन से इस मामले में (१) प्रतापगढ़ राज्य का राजनैतिक सम्बन्ध प्रारम्भ में मालवा के एजेंट गवर्नर-जेनरल के साथ रखा गया। फिर राजपूताना के राज्यों के लिए पृथक् एजेंट गवर्नर-जेनरल का पद निर्धारित होने पर उसकी अधीनता में मेवाड़ में पोलिटिकल एजेंट रखा गया, जो नीमच में रहता था। इसी कारण मेवाड़ के पोलिटिकल एजेंट कर्नल रॉबिन्सन को डूंगरपुर के मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा, क्योंकि डूंगरपुर राज्य का राजनैतिक सम्बन्ध भी मेवाड़ की एजेंसी के अन्तर्गत था। कर्नल रॉबिन्सन ई० स० १८३८ से ४० (वि० सं० १८६५ से १६०७) तक मेवाड़ का पोलिटिकल एजेंट रहा और ई० स० १८४० ता० १७ जून (वि० सं० १६०७ ज्येष्ठ सुदि ८) को उसकी मृत्यु हुई। बांसवाड़ा के महारावल लक्ष्मणसिंह और कुशलगढ़ के राव हमीरसिंह के बीच होनेवाले झगड़े में बांसवाड़ा की तरफ़ से ज्यादती के अतिरिक्त जालसाज़ी भी प्रमाणित हुई। तब वहां मेवाड़ के पोलिटिकल एजेंट का असिस्टेन्ट रहना तय पाया गया, जिसके साथ पीछे से प्रतापगढ़ राज्य का सम्बन्ध भी रखा गया। तदनन्तर मेवाड़ के पोलिटिकल एजेंट के ओह्दे में परिवर्त्तन होकर उसका नाम रेज़िडेन्ट मेवाड़ रखा गया। उस समय बांसवाड़ा में रहनेवाला सरकारी अफ़सर असिस्टेन्ट रेज़िडेन्ट मेवाड़ कहलाने लगा। इसके पीछे असिस्टेन्ट रेज़िडेन्ट मेवाड़ का पद टूटकर उसके स्थान में दक्षिणी राजपूताना के पोलिटिकल एजेंट के नवीन पद की सृष्टि हुई और डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ राज्य तथा कुशलगढ़ ठिकाने का राजनैतिक सम्बन्ध उससे रखा गया, जो इस समय तक जारी है। (२) महारावल जसवन्तसिंह (दूसरा) का उदयपुर राज्य के भूतपूर्व मन्त्री मेहता रामसिंह के नाम का वि० सं० १६०० फाल्गुन वदि १४ (पूर्णिमांत चैत्र वदि १४ = ई० स० १८४४ ता० १७ मार्च) का पत्र।
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२८४ | प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
लिखा-पढ़ी कर उसे यह सुझाया कि दलपतसिंह एक ही जगह का स्वामी रह सकता है, दोनों जगहों का नहीं । इसपर अंग्रेज़ अफ़सरों ने इस विषय को विचारणीय रक्खा; परन्तु जसवन्तसिंह का डूंगरपुर में रहना उपद्रव- जनक समझ उसका वृन्दावन में रहना स्थिर होकर वि० सं० १६०१ (ई० स० १८४५) में वह वृन्दावन भेज दिया गया और एक सहस्र रुपये प्रति मास उसके व्यय के लिए नियत हुए¹। नांदली का ठाकुर हिम्मतसिंह, जो इस उपद्रव का मूल कारण बतलाया गया था, बंदी किया गया और महारावल को बहकानेवाले कुछ आदमी भी बंदी किये गये, जिससे उस समय उपद्रव शांत हो गया । फिर पूर्ववत दलपतसिंह ही, कई बाधाएं उपस्थित होने पर भी, डूंगरपुर का राज्य-कार्य चलाता रहा । वि० सं० १६०२ पौष सुदि ६ (ई० स० १८४६ ता० ३ जनवरी) को महारावल जसवन्तसिंह का वृन्दावन में ही देहान्त हो गया ।
(बाएँ हाशिये का पाठ): महारावल जसवन्तसिंह का वृन्दावन में देहान्त होना और सांवली के ठाकुर के पुत्र उदयसिंह का डूंगरपुर का स्वामी होना
(मुख्य पाठ): महारावत दलपतसिंह प्रतापगढ़ में रहता हुआ डूंगरपुर राज्य को भी अपने अधिकार में रखना चाहता था । यह बात जसवन्तसिंह को अखरती थी, इसलिए उसने दलपतसिंह को डूंगरपुर के राज्य से वंचित रखने के लिए अंग्रेज़ अफ़सरों से प्रकट वा अप्रकट रूप से कई बार अनुरोध भी किया; परन्तु महारावत सामन्तसिंह की विद्यमानता के कारण उस समय इस विषय पर कुछ ध्यान नहीं दिया गया । सामन्तसिंह के देहावसान के पीछे दलपतसिंह के प्रतापगढ़ की गद्दी पर बैठने, डूंगरपुर में जसवन्तसिंह के नांदली के ठाकुर के पुत्र मोहकमसिंह को गोद लेने के बारे में उपद्रव होने और फिर जस- वन्तसिंह का वृन्दावन में देहान्त हो जाने पर उसकी राणियों, सरदारों आदि द्वारा वहां उत्तराधिकारी नियत करने के सम्बन्ध में प्रार्थनाएं होने पर अंग्रेज़ सरकार का इस ओर ध्यान आकृष्ट हुआ । उदयपुर के महाराणा स्वरूपसिंह-द्वारा पोलिटिकल अफ़सरों के पास दलपतसिंह के डूंगरपुर
(१) एचिसन; ट्रीटीज़, एंगेजमेंट्स एण्ड सनद्ज़; जि० ३, पृ० ४४१ ।
पर अधिकार रहने के सम्बन्ध में विरोध किया गया। इस प्रश्न पर अंग्रेज़ सरकार गंभीरतापूर्वक विचार करने लगी। महारावत दलपतसिंह के उस समय कोई कुंवर न था। इसलिए बहुत कुछ सोच-विचार के पीछे यह निश्चय किया गया कि महारावत दलपतसिंह डूंगरपुर के राजवंश में से किसी व्यक्ति को अपना दत्तक बना लेवे, जो डूंगरपुर का स्वामी रहे । अंग्रेज़ सरकार के इस निर्णय को डूंगरपुर की राजमहिषियों, सरदारों आदि ने भी स्वीकार किया। अन्त में डूंगरपुर के राजवंश में से साबलो के ठाकुर जसवन्तसिंह के तृतीय पुत्र उदयसिंह को वहां की राजमहिषियों तथा सरदारों ने दलपतसिंह की गोद बिठाया और उस (उदयसिंह) को दलपतसिंह के पास भेजा, जिसको उस (दलपतसिंह) ने भी स्वीकार कर अंग्रेज़ सरकार के पास इस निर्णय की स्वीकृति के लिए आकांक्षा प्रकट की। अंग्रेज़ सरकार ने भी उदयसिंह की गोदनशीनी को स्वीकार किया और वि० सं० १९०३ (ई० स० १८४६) में वह (उदयसिंह) डूंगरपुर का स्वामी बनाया गया१; किन्तु उसकी बाल्यावस्था के कारण वहां का शासन दलपतसिंह की सम्मति के अनुसार होना स्थिर हुआ और उसकी विद्यमानता में अंग्रेज़ अधिकारी उस (उदयसिंह) को कुंवर ही लिखते रहे। वि० सं० १९०५ आषाढ वदि १३ (ई० स० १८४८ ता० २६ जून) को महारावत दलपतसिंह के कुंवर उदयसिंह का जन्म हुआ। एक लंबी अवधि के बाद महारावत के यहां कुंवर का जन्म [महाराजकुमार उदयसिंह का जन्म] होने से बड़ा हर्ष मनाया गया और वहां की प्रजा भी प्रफुल्लित हो गई। महारावत ने अपने राज्य की स्थिति के अनुसार इस अवसर पर बहुत कुछ उदारता प्रकट की। डूंगरपुर राज्य का प्रबन्ध महारावत दलपतसिंह की आज्ञानुसार वि० सं० १९०६ (ई० स० १८५२) तक होता रहा, परन्तु वहां के सरदार (१) मेरा डूंगरपुर राज्य का इतिहास; पृ० १६० ।
२८६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास सूरमा अभयसिंह और सोलंकी उदयसिंह, जब डूंगरपुर का शासनाधिकार भी उनका स्वार्थ सिद्ध न होता, राज्य में कोई छूटना उपद्रव कर बैठते थे । इससे राज्य-प्रबन्ध में सुधार नहीं हो पाता था और राज्य ऋण-ग्रस्त हो गया। इस ओर पोलिटिकल अफ़सरों के ध्यान दिलाने पर महारावत दलपतसिंह ने सूरमा अभयसिंह और सोलंकी उदयसिंह को कामदार के पद से हटाकर ठाकरड़े के ठाकुर गुलावसिंह और गुलावचन्द गांधी को उस पद पर नियत किया। उन्हीं दिनों अंग्रेज़ सरकार ने भी वहां के शासन-प्रबन्ध को ठीक करने के लिए मुंशी सफ़दरअलीखां को डूंगरपुर भेजा, जिसके वहां पहुंचने पर सूरमा अभयसिंह आदि ने अपना स्वार्थ सिद्ध न होता देख पांच हज़ार भीलों को एकत्रित कर उपद्रव करना चाहा, जिसका खेरवाड़ा से कप्तान ब्रुक ने जाकर दमन किया और कर्नल रॉबिन्सन के लिखने पर उपद्रवियों को दण्ड देने के लिए महारावत दलपतसिंह ने भी प्रतापगढ़ से अपनी सेना भेज दी। कप्तान ब्रुक के साथ मेवाड़ भील-कोर के डूंगरपुर पहुंचने और उस समय प्रतापगढ़ से भी सेना आ जाने से अभयसिंह और उसके साथी भय- भीत हो गये, जिससे वहां का उपद्रव शांत हो गया। अन्त में अभयसिंह और उदयसिंह प्रतापगढ़ जाकर महारावत के पास उपस्थित हुए और उन्होंने पच्चीस हज़ार रुपये महारावत को नज़राने के देकर अपने क़सूरों की माफ़ी चाही और भविष्य के लिए इमानदार बने रहने का इक़रार लिख दिया। उपर्युक्त कार्यवाही के पीछे भी वहां शासन-कार्य में गड़बड़ी होने लगी और लोग अव्यवस्था का सारा दोष महारावत दलपतसिंह के मत्थे मढ़कर उसकी शिकायत कराने लगे। तब कप्तान ब्रुक ने खेरवाड़ा से डूंगरपुर जाकर इस मामले की तहक़ीक़ात की और महारावत के डूंगर- पुर के कार्यों में हस्तक्षेप से ही अव्यवस्था होना बतलाया। इसपर मेवाड़ का पोलिटिकल एजेंट जॉर्ज लॉरेंस डूंगरपुर गया। उस समय सूरमा अभयसिंह आदि ने कई सरदारों और प्रजा आदि को मिलाकर महारावत की शिकायत करवाई। जॉर्ज लॉरेंस ने महारावत को प्रतापगढ़ से डूंगरपुर
महारावत दलपतसिंह २८७ में बुलाया और वहां के प्रबन्ध के विषय में महारावत को नौ शर्तें लिखकर दीं, परन्तु महारावत ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। इसपर लॉरेंस ने दलपत- सिंह-द्वारा डूंगरपुर के शासनकार्य में किसी प्रकार का हस्तक्षेप न होने के लिए सदर में रिपोर्ट की, जिसकी स्वीकृति आने पर महारावत का डूंगरपुर से दख़ल उठा दिया गया । भारत के गवर्नर जेनरल लॉर्ड डलहौज़ी की अनुदार नीति के कारण सारे भारत में असंतोष फैल गया था, ऐसे में बंगाल के सैनिकों सिपाही विद्रोह के समय में एक नई बंदूक़, जिसके कारतूस के सिरे को अंग्रेज़ सरकार को प्रताप- दांत से काटना पड़ता था, प्रचार किया गया। गढ़ राज्य से सहायता इस बन्दूक़ के संबंध में ई० स० १८४७ के जनवरी मिलना ( वि० सं० १९१३ माघ) मास में यह अफ़वाह फैली कि इसके कारतूस पर गाय और सूअर की चर्बी लगी है। क्रमशः भारत के प्रत्येक स्थान में फैलती हुई जब यह बात धर्मभीरु भारतीय सैनिकों के कानों तक पहुंची, तब वे धर्मनाश की आशंका से विचलित होकर अंग्रेज़ सरकार के विरुद्ध हो गये । सर्वप्रथम कलकत्ते के पास दम- दम की छावनी में सिपाही विद्रोह के लक्षण प्रकट हुए। फिर शनैः-शनैः बारकपुर, मेरठ, दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, बरेली, झांसी आदि स्थानों के सैनिक भी बिगड़ उठे और इस विद्रोह में अन्य कई व्यक्तियों ने भी, जिनका स्वार्थ सिद्ध न होता था, भाग लिया' । ब्रिटिश भारत के इस सिपाही विद्रोह का प्रभाव राजपूताने की अंग्रेज़ी छावनियों पर भी बहुत कुछ पड़ा और वहां भी अधिकांश स्थानों में सिपाही विद्रोह हो गया। ता० २७ मई ( वि० सं० १६१४ ज्येष्ठ सुदि ४) को मुहम्मदअली नामक सवार के बहकाने से नीमच की सेना भी बाग़ी हो गई और उसने छावनी जलाकर ख़ज़ाना लूट लिया। उस समय मेवाड़ का पोलिटिकल एजेंट कप्तान शावर्स आबू से उदयपुर गया हुआ था। ता० ६ जून (ज्येष्ठ सुदि १४) को यह समाचार पाते ही वह वहां से उदयपुर की (१) मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ०-७६७ ।
२८८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास सेना के साथ रवाना हुआ। मार्ग में उसने डूंगला गांव में बाग़ियों से घिरे हुए चालीस अंग्रेज़, जिनमें औरतें और बच्चे आदि भी शामिल थे, छुड़वा- कर उदयपुर पहुंचाये। तदनंतर वह नीमच पहुंचा और वहां पुनः अधिकार कर छावनी का प्रबन्ध कप्तान लॉयड को सौंपकर स्वयं बाग़ियों के पीछे रवाना हुआ१। उस समय कप्तान लॉयड के पास छावनी की रक्षा के लिए सैनिकों की पूर्ण आवश्यकता थी, अतएव उसने महारा- वत दलपतसिंह से भी सेना भेजने की दर्खास्त की। इसपर महारावत ने कप्तान लॉयड के पास अपने यहां से सेना भेज दी, जिसने नीमच की रक्षा का अच्छा प्रबंध किया। फिर वहां अंग्रेज़ी सेना पहुंच जाने पर कप्तान लॉयड ने महारावत की सेना को सीख दी। इस सेवा के सम्बन्ध में मेवाड़ के पोलिटिकल एजेंट कप्तान शावर्स ने वि० सं० १६१४ श्रावण सुदि २ (ई० स० १८५७ ता० २३ जुलाई) को महारावत के नाम शुक्रगुज़ारी का खरीता भेजा, जिसका सारांश नीचे लिखे अनुसार है- ".........आपने नीमच के सुपरिन्टेन्डेन्ट कप्तान लॉयड की दर्स्वा- स्त पर अंग्रेज़ सरकार की मित्रता का ध्यान रखते हुए नीमच की छावनी की रक्षार्थ सवार और पैदल भेजे। उन्होंने सरकार की इच्छा के अनुसार बड़े यत्न और होशियारी के साथ काम किया, जिसके लिये हम अनुगृहीत हैं। हम उनकी सेवा से बहुत प्रसन्न रहे। अब सरकारी सेना नीमच की छावनी में आ गई है, इसलिए वहां की सेना को कष्ट देना उचित न समझ- कर विदा करता हूं२।"......... उन्हीं दिनों फ़ीरोज़ नामक एक हाजी अपने को दिल्ली के मुग़ल वंश का शाहज़ादा बतलाकर मंदसोर के पास कचरोद गांव (खाचरोद, ग्वा- लियर राज्य) में पहुंचा और वहां के निवासियों को बहकाकर उसने उपद्रव खड़ा कर दिया, जिसपर मंदसोर के सूबेदार ने उसको वहां से भगा दिया। (१) शॉवर्स; ए मिसिंग चैप्टर ऑव इंडियन म्युटिनी; पृ० ८-३२। (२) महारावत दलपतसिंह के नाम मेवाड़ के पोलिटिकल एजेंट कप्तान शावर्स का हिन्दी खरीता।
महारावत दलपतसिंह २८६ फिर उसने दो हज़ार आदमियों के साथ जाकर ता० ७ सितंबर (आश्विन वदि ४) को मंदसोर पर आक्रमण किया, जिसमें वहां का सूबेदार मारा गया और वहां उसका अधिकार हो गया। फिर निम्बाहेड़ा (वर्त्तमान टोंक राज्य का क़स्बा) का मुसलमान हाकिम नीमच ज़िले के जीरण गांव पर मंदसोर के बाग़ियों को चढ़ा लाया । जब यह ख़बर नीमच पहुंची, तब बाग़ियों का सामना करने के लिए ता० २३ अक्टोवर (कार्तिक सुदि ५) को कप्तान लॉयड, कप्तान सिम्पसन आदि ११ अफ़सरों, चारसौ सिपाहियों और दो तोपों के साथ जीरण पहुंचे, परंतु वहां अंग्रेज़ी सेना की हार हुई । फिर बाग़ी- दल जीरण लूटकर मंदसोर चला गया । ता० ८ नवम्बर (मार्गशीर्ष वदि ७) को उनका नीमच पर आक्रमण हुआ। वहां अंग्रेज़ी सेना से लड़ाई होने पर अंग्रेज़ सैनिक क़िले में चले गये। कप्तान शॉवर्स ने उदयपुर की सेना के साथ बाग़ियों का मुक़ाबला किया, किन्तु सायंकाल हो जाने से लड़ाई बंद हो गई और कप्तान शॉवर्स उदयपुर की सेना के साथ दारू गांव (वर्त्तमान ग्वालियर राज्य) में होता हुआ केसूंदा गांव (मेवाड़ राज्य) में चला गया। दूसरे दिवस बाग़ियों ने छावनी को लूटकर जला दिया। इसके उपरान्त जावद, रतनगढ़, सींगोली आदि नीमच के समीपवर्ती गांवों और क़स्बों में भी विद्रोह हो गया। ज्योंही यह समाचार कप्तान शॉवर्स को मिला, वह तत्काल लेफ्टिनेंट फ़र्क़हर्सन को लेकर वहां से चला और बगाणा तथा निक्सनगंज में बाग़ियों के ठहरने की ख़बर पाकर वहां पहुंचा। फिर बाग़ियों से उसकी लड़ाई हुई, जिसमें बहुत से विद्रोही मारे गये और शेष तितर-बितर हो गये । इस घटना के अनन्तर मालवे की ओर से मध्य भारत का एजेंट गवर्नर-जनरल कर्नल ड्यूरेंड महू के सिपाहियों को साथ लेकर मंदसोर पहुंचा। वहां विद्रोहियों से उसका मुक़ाबला हुआ, जिसमें फ़ीरोज़ तो हारकर भाग गया, पर उसके बहुत से साथी और सिपाही पकड़े गये । मंदसोर से वह (ड्यूरेंड) नीमच गया। उसके पहुंचते ही वहां से भी बागी भाग गये¹। नवम्बर ई० स० १८५७ (मार्गशीर्ष वि० सं० १९१४) में (१) सी० एल० शॉवर्स; ए मिसिंग चैप्टर ऑव् इंडियन म्युटिनी; पृ० ११६-२०। ३७
वाग़ियों का एक दल प्रतापगढ़ की ओर गया । उस समय महारावत स्वयं अपने राजपूतों को साथ लेकर उनके मुक़ाबले के लिए आगे बढ़ा। बागी दल का मुखिया क़ासिमख़ां विलायती अपने ८० आदमियों-सहित मारा गया। कर्नल ड्यरेंड की अधीन सेना को रसद-सामग्री भिजवाने आदि का भी महारावत ने यथेष्ट प्रबंध किया था और बागी दल के मुखिया का मस्तक काटकर महारावत ने कर्नल ड्यूरेंड के पास भेजा। महारावत की इस सेवा से अंग्रेज़ अफ़सरों तथा कर्नल ड्यूरेंड को बड़ी प्रसन्नता हुई और उसने ता० १ दिसंबर (मार्गशीर्ष सुदि १५) मंगलवार को कप्तान शॉवर्स पोलिटिकल एजेंट, मेवाड़ के पास नीचे लिखी सूचना भेजी— “...मैंने प्रतापगढ़ के स्वामी के मोतमिद को एक पत्र दिया है और आपको लिखता हूं कि मैं प्रतापगढ़ के राजा से बहुत प्रसन्न हूं, क्योंकि उन्होंने सेना के लिए रसद (सामान) अच्छी तरह से भिजवाई और अराजकों को सज़ा देने में पूर्ण प्रयत्न किया। वे उन (वागियों) के सरदार को गिरफ़्तार कर भेजते, किन्तु मुक़ाबला करने से उन्होंने उसको मारा और उस (मुखिया) का सिर मेरे पास आया है¹।...” पोलिटिकल एजेंट मेवाड़ द्वारा यह सम्वाद कर्नल जॉर्ज लॉरेंस (स्थानापन्न एजेंट गवर्नर-जेनरल, राजपूताना) को मिलने पर उसने ई० स० १८५८ ता० ५ फ़रवरी (वि० सं० १९१४ फाल्गुन वदि ७) को महारावत के नाम नीचे लिखे आशय का ख़रीता भेज प्रसन्नता प्रकट की— “....इन दिनों मुझको मेवाड़ के पोलिटिकल एजेंट के पत्र से मालूम हुआ है कि आपने सरकारी आदमियों को सहायता देने में बहुत प्रयत्न किया है और कर्नल ड्यूरेंड एजेंट गर्वनर जेनरल, सेंट्रल इंडिया के साथ रहनेवाली सेना को आवश्यक रसद सामग्री पहुंचाने में पूरी सहायता दी है। यह ख़बर सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई और जैसी ख़ैरख्वाही की सरकार को आपसे आशा थी, वैसी प्रकट हुई। अब मैं आपकी (१) मध्यभारत के एजेंट गवर्नर जेनरल कर्नल ड्यूरेंड के पोलिटिकल एजेंट मेवाड़ के नाम के अंग्रेज़ी ख़त का आशय ।
महारावत दलपतसिंह २६१ इस ख़ैरख्वाही की सूचना सदर को कर रहा हूं। साहेब आलीशान आपकी इस मित्रता से बहुत प्रसन्न होंगे'।" क़ासिमख़ां विलायती आदि बाग़ी दल के लोगों के महारावत-द्वारा मारे जाने की रिपोर्ट मालवा तथा सेंट्रल इंडिया के एजेंट गवर्नर-जेनरल-द्वारा भारत के तत्कालीन गवर्नर जेनरल (बड़े लाट) लॉर्ड कैनिङ्ग के पास पेश होने पर उसको बड़ा संतोष हुआ और उसने राजपूताना के एजेंट गवर्नर जेनरल को महारावत के नाम प्रसन्नता-सूचक पत्र भेजने को लिखा। इसपर राजपूताना के एजेंट गवर्नर-जेनरल कर्नल जॉर्ज लारेंस ने वि० सं० १६१५ चैत्र सुदि ६ (ई० स० १८५८ ता० २० मार्च) को महारावत के नाम निम्न- लिखित आशय का खरीता भेजा— "....इन दिनों एजेंट गवर्नर-जेनरल, सेंट्रल इंडिया तथा पोलिटिकल एजेंट, मेवाड़ की तरफ़ से यह रिपोर्ट हुई है कि आपने स्वयं और सेना को साथ में रखकर कर्नल ड्यूरेंड एवं सरकारी सेना को मंदसोर के फ़सादियों को सज़ा देने में यथेष्ट सहायता दी है। आपकी इस ख़ैरख्वाही और उत्तम मित्रता से नब्वाब गवर्नर जेनरल अत्यन्त प्रसन्न हुए तथा मुझको यह आज्ञा मिली है कि उनकी ओर से खुशनूदी मिज़ाज की सूचना दूं और इस ख़त के ज़रिये आपकी सहानुभूति का धन्यवाद करूं२।..." झांसी, सतारा आदि राज्यों के उत्तराधिकारी के अभाव में लॉर्ड डलहौज़ी-द्वारा ज़ब्त हो जाने के कारण कई मरहटे सरदार भी अंग्रेज़ सर- कार से असंतुष्ट थे और भारत में पुनः मरहटा साम्राज्य स्थापित करने का स्वप्न देख रहे थे। इस अवसर से लाभ उठाने के लिए कुछ मरहटे सरदारों ने भी विद्रोह पर कमर बांधी और पेशवा के वंशज राव साहब (१) जॉर्ज लारेंस, एजेंट गवर्नर जेनरल, राजपूताना का महारावत दलपतसिंह के नाम का खरीता। (२) राजपूताने के एजेंट गवर्नर कर्नल जॉर्ज लारेंस के उर्दू खरीते का आशय।
२६२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास तथा उसके सहायक तांतिया टोपी ने विद्रोहियों का नेतृत्व कर ग्वालियर पर अधिकार कर लिया। ई० स० १८५८ के जुलाई (वि० सं० १६१५ आषाढ) मास में सर ह्यूरोज़ ने उनको वहां से निकाल दिया। तब वे पांच हज़ार बागियों के साथ मेवाड़ के पूर्वी भाग में जालिंधरी के घाटे के मार्ग से मांडलगढ़, रतनगढ़ तथा सींगोली होते हुए रामपुरे की ओर रवाना हुए; किंतु ब्रिगेडियर पार्क तथा मेजर टेलर ने उस ओर का रास्ता रोक लिया, तब वे वरल्योवास होते हुए भीलवाड़ा पहुंचे। ता० ६ अगस्त (श्रावण वदि ३०) को सांगानेर के पास कोटेश्वरी नदी के किनारे जेनरल रॉबर्ट्स की सरकारी सेना से उनका मुक़ाबला हुआ, जिसमें वे हारकर भागे और मेवाड़ के पश्चिम की तरफ़ चल दिये। अंग्रेज़ी सेना ने उनका पीछा किया और नाथद्वारा के पास कोठारिया के समीप ता० १४ अगस्त (श्रावण सुदि ६) को बागियों का सरकारी सेना से मुक़ाबला हुआ, जिसमें वे हारकर वहां से भी भागे। अनन्तर आकोला के मार्ग से चित्तोड़ से दक्षिण की तरफ़ होकर जाट और सींगोली को लूटते हुए वे झालावाड़ पहुंचे। वहां भी ब्रिगेडियर पार्क ने उनका पीछा न छोड़ा। तब वे छोटा उदयपुर पहुंचे, जहां उक्त ब्रिगेडियर ने उनको परास्त किया। राव- साहब, देवगढ़ बारिया से पृथक् हो गया था, परंतु तांतिया टोपी कुशलगढ़ के रास्ते से बांसवाड़ा पहुंचा। इधर से कप्तान लियरमाउथ फ़ौज समेत वहां जा पहुंचा, जिससे तांतिया टोपी वहां से भागकर सलूंबर होता हुआ, भींडर की तरफ़ बढ़ा। उसका इरादा उदयपुर जाने का था, किंतु उधर का मार्ग रुका हुआ होने तथा सरकारी सेना-द्वारा नाकेबंदी हो जाने से वह पहाड़ी मार्ग-द्वारा प्रतापगढ़ की तरफ़ बढ़ा। उस समय तीन-चार हज़ार भील भी तांतिया के शामिल हो गये थे। प्रतापगढ़ के महारावत-द्वारा बाग़ी- दल के मुखिया क़ासिमअली आदि के मारे जाने से तांतिया टोपी प्रतापगढ़ के क़स्बे को, जो संपन्न था, लूटना चाहता था; परंतु ठीक समय पर सरकारी सेना के साथ मेजर रॉक वहां पहुंच गया, जिससे बागी दल प्रतापगढ़ को न लूट सका और वहां से वह पौष वदि ३ (ई० स० १८५८ ता० २३ दिसंबर)
को शिकस्त खाकर भागा¹। इस लड़ाई में बागियों के बहुत से आदमी पकड़े तथा मारे गये और उनके हाथी, घोड़े आदि छीन लिये गये। तांतिया टोपी मंदसोर होता हुआ जीरापुर पहुंचा। वहां कर्नल बेंसन से उसकी पराजय हुई; किंतु इसी अवसर पर दो हज़ार आदमियों के साथ बागी फ़ीरोज़शाह उससे जा मिला, जिससे वह माघ सुदि १५ (ई० स० १८५६ ता० १७ फ़रवरी) को फिर मेवाड़ होता हुआ कांकरोली चला गया; पर ब्रिगेडियर सॉमरसेट तथा कप्तान शॉवर्स के पहुंच जाने से उसके वहां पैर न टिके और पहाड़ों में होता हुआ वह पुनः बांसवाड़े के क़रीब जा पहुंचा। ब्रिगेडियर सॉमरसेट उसका पीछा करता हुआ वहां भी गया और उसने बागियों को रास्ते में ही जा दबाया। बागियों के कई सरदार फ़ीरोज़शाह, अबुलशतरखां, पीर हज़ूरअली आदि ने आत्मसमर्पण किया। तांतिया टोपी पेरोन के जंगल में जा छिपा। ता० ७ अप्रेल (वि० सं० १९१६ चैत्र वदि ४) को वहां पकड़ा जाकर वह सिप्री लाया गया, जहां उसे फांसी दी गई²। उपर्युक्त सिपाही-विद्रोह का प्रभाव भारत में लगभग दो वर्ष के ऊपर बना रहा। अंग्रेज़ अधिकारियों की कार्यतत्परता और स्फूर्ति तथा भारत के नरेशों के सहयोग से उसका दमन शीघ्र हो गया। ग़दर के अंतिम दिनों में भारत का शासन-सूत्र ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ से स्वर्गीय महाराणी विक्टोरिया ने अपने हाथ में लेकर भारत के तत्कालीन गवर्नर जेनरल को शासन-कार्य के लिए अपना वाइसरॉय (प्रतिनिधि) बनाया। भारतीय नरेशों और प्रजा वर्ग में संतोष की वृद्धि के लिए महाराणी की ओर से ई० स० १८५८ ता० १ नवम्बर (वि० सं० १९१५ कार्तिक बदि ११) को शाही घोषणापत्र जारी किया गया, जिसमें भारतीय नरेशों की मान मर्यादा बनी रहने, उनके स्वत्वों एवं धार्मिक मामलों में किसी प्रकार का
(१) सी० एल० शॉवर्स; ए मिसिंग चैप्टर ऑफ़ इंडियन म्यूटिनी; पृ० १४०-१। ज्वालासहाय; दि लॉयल राजपूताना; पृ० २४२-३। (२) सी० एल० शॉवर्स; ए मिसिंग चैप्टर ऑफ़ इंडियन म्यूटिनी; पृ० १४३- ४६। ज्वालासहाय; दि लॉयल राजपूताना; पृ० २५२-३।
२६४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास हस्तक्षेप न होने तथा ईस्ट इंडिया कंपनी-द्वारा की गई संधियां बहाल रहने, प्रजा के स्वत्व, इज्जत, ओहदे तथा धर्म को अपने धर्म के समान ही मानने आदि का उल्लेख है¹ । महारावत दलपतसिंह-द्वारा सिपाही विद्रोह के समय पूर्ण सहायता दी गई थी, जिसकी सरकारी अफ़सरों ने भी पूर्ण सराहना की। फिर ग़दर समाप्त हो जाने पर अंग्रेज़ सरकार ने उसके लिए दो हज़ार रुपये के मूल्य की खिलअत भेजना तज़वीज़ किया और वॉइसरॉय लॉर्ड कैनिङ्ग तथा एजेंट गवर्नर जेनरल के महारावत के नाम के खरीते भी मेवाड़ के पोलिटिकल एजेंट मेजर टेलर-द्वारा भेजे गये² तथा उपर्युक्त खिलअत भी उसको यथा- समय प्राप्त हुई। सिपाही विद्रोह के समय महारावत की आज्ञानुसार उसके मन्त्री निहालचंद खासगीवाले, शाह भोजराज और जोधकरण पाडलिया ने अच्छी सेवा बजाई और उन्होंने प्रतापगढ़ क़स्बे की रक्षा का, जो मंदसोर के निकट है, अच्छा प्रबन्ध रखा एवं प्रतापगढ़ के इलाक़े में बाग़ियों-द्वारा कोई हानि न पहुंचने दी, जिसकी महारावत को बड़ी प्रसन्नता हुई और उसने उन लोगों की क़द्र की। अपुत्रावस्था में राज्य ज़ब्त करने की लॉर्ड डलहौज़ी की नीति को विग्रहकारी समझ ग़दर समाप्त होने के पीछे अंग्रेज़ सरकार ने भारत के [गोदनशीनी की सनद मिलना] देशी राजाओं का दत्तक पुत्र रखने का अधिकार वाजिब समझा। तदनुसार महारानी विक्टोरिया की आज्ञानुसार समस्त देशी राज्यों के पास लॉर्ड कैनिङ्ग के हस्ताक्षर-सहित सनदें भेजी गईं। तदनुसार अंग्रेज़ सरकार की ओर से प्रतापगढ़ राज्य में भी ई० स० १८६२ ता० ११ मार्च (वि० सं० १९१८ फाल्गुन सुदि १०) (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १६८०-८८। मेरा उदयपुर राज्य का इति- हास; जि० २, पृ० ७८६ । (२) मेजर टेलर, पोलिटिकल एजेंट, मेवाड़ का महारावत दलपतसिंह के नाम का वि० सं० १९१७ आषाढ वदि १ ई० स० १८६० (ता० ४ जून) का पत्र।
महारावत दलपतसिंह २६५ की लिखित वाइसरॉय लॉर्ड कैनिङ्ग के हस्ताक्षर-सहित यह सनद् पहुंची, जो नीचे लिखे अनुसार है— “श्रीमती महाराणी विक्टोरिया की यह इच्छा है कि भारत के राजाओं तथा सरदारों का अपने-अपने राज्यों पर अधिकार तथा उनके वंश की जो प्रतिष्ठा एवं मान-मर्यादा है, वह हमेशा बनी रहे; इसलिए उक्त इच्छा की पूर्ति के लिए मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि वास्तविक उत्तरा- धिकारी के अभाव में यदि आप या आपके राज्य के भावी शासक हिंदू धर्मशास्त्र और अपनी वंश-प्रथा के अनुसार दत्तक लेंगे तो वह जायज़ समझा जायगा । “आप यह निश्चय जानें कि जब तक आपका घराना सरकार का खैरख्वाह रहेगा और उन अहदनामों, सनदों तथा इक़रारनामों का पालन करता रहेगा, जिनमें अंग्रेज़ सरकार के प्रति उसके कर्त्तव्य दर्ज हैं, तब तक आपके साथ के इस इक़रार में कोई बात बाधक न होगी” । ˙ महारावत दलपतसिंह का वि० सं० १६२० चैत्र वदि ७ ( ई० स० १८६४ ता० ३० मार्च ) को परलोकवास हुआ । उसके चार राणियां थीं [पार्श्व टिप्पणी: महारावत का परलोकवास और राणियां आदि] जिनके नाम प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात में नामली ( रतलाम राज्य ) के सोनिगरा ठाकुर फ़तहसिंह की कुंवरी दौलतकुंवरी, कुशलगढ़ (बांस- वाड़ा राज्य ) के राठोड़ राव ज़ालिमसिंह की पुत्री मोतीकुंवरी एवं उसी ज़ालिमसिंह की पौत्री और हम्मीरसिंह की पुत्री केसरकुंवरी तथा वांसणा ( गुजरात ) ठिकाने के केरणा गांव के राठोड़ ठाकुर दौलतसिंह की पुत्री कल्याणकुंवरी दिये हैं²। उसके केवल एक ही पुत्र महाराजकुमार ( १ ) एचिसन; ट्रीटीज़ एंगेजमेंट्स एंड सनद्ज़; जि० ३, पृ० ४४२ तथा पृ० ३५ । ( २ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ११ । प्रतापगढ़ राज्य से प्राप्त एक ख्यात में उक्त महारावत के चार ही राणियां लिखी हैं; परन्तु उनके नामों में अन्तर है । वहां उसकी दूसरी राणी कुशलगढ़वाली का नाम केसरकुंवरी और उसका राव
२६६ | प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास उदयसिंह था, जिसका जन्म कुशलगढ़वाली राणी के उदर से हुआ था¹ । महारावत दलपतसिंह, प्रतापगढ़ राज्य में नीतिकुशल राजा हुआ है। उसमें राज्य प्रबंध की अच्छी योग्यता थी, अतएव उसने डूंगर- पुर और प्रतापगढ़ राज्य का प्रबंध कुशलतापूर्वक महारावत का व्यक्तित्व | किया । वह मित्रता का निबाहनेवाला राजा था। सिपाही-विद्रोह में स्वयं उसने अपनी सेना के साथ भाग लिया था। वह गुणवानों का सम्मान कर उन्हें पुरस्कृत करता और अपने कार्यकर्त्ता मंत्रियों आदि को पुरस्कार, जागीर आदि देकर सदा उत्साहित करता था। उसकी अपनी प्रजा के साथ गहरी सहानुभूति थी । उसके समय में राज्य-कोप परिपूर्ण था। प्रतापगढ़ राज्य में जो वैभव है, उसका अधिकांश श्रेय उसी को है। उसने देवलिया में सोनेलाव तालाव बनवाकर दलपत- निवास नामक महल बनवाया था। उसकी प्रतिष्ठा के अवसर पर उसने बारहठ चारण लखमणदान को दो गांव और हाथी तथा महाराजकुमार उदयसिंह के जन्म के अवसर पर पांच हाथी, दो सौ घोड़े और पांचसौ सिरोपाव दिये थे एवं उसी अवसर पर उसने लाख पसाव में उपर्युक्त लखमणदान को एक गांव, हाथी, घोड़ा, वस्त्राभूषण और दस सहस्र रुपये देकर उसको अपना कविराज बनाया था। सरदारों आदि के साथ उसका व्यवहार सदा अच्छा रहा। उसके मन्त्री शाह जड़ावचन्द, शाह निहालचंद (खासगीवाला), जोधकरण पाडलिया आदि कार्यनिपुण व्यक्ति थे, जिससे उक्त महारावत के समय प्रजा की आबादी बढ़ी और राज्यश्री में भी वृद्धि हुई। नांदली के ठाकुर हिम्मतसिंह के पुत्र मोहकमसिंह को डूंगरपुर के हमीरसिंह की पुत्री होना दिया है तथा उसी के उदर से कुंवर उदयसिंह का जन्म होना बतलाया है। इसी प्रकार तीसरी राणी कठाणा के पंवार बख़्तावरसिंह की पुत्री भवान- कुंवरी और चतुर्थ राणी भी कुशलगढ़ के राव हमीरसिंह की पुत्री लालकुंवरी लिखी है। इन दोनों राणियों का तो बड़वे की ख्यात में कुछ भी उल्लेख नहीं है। एक स्थान पर उसके छः राणियें भी लिखी हैं और दो विवाह डूंगरपुर में रहते हुए होने का उल्लेख है। (१) प्रतापगढ़ राज्य की एक प्राचीन ख्यात; पृ० १४।
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महारावत उदयसिंह
महारावत उदयसिंह २६७ महारावल जसवन्तसिंह (दूसरा) के दत्तक रखने के सम्बन्ध में वहां बखेड़ा होकर हिम्मतसिंह क़ैद किया गया। उसके प्रति भी महारावत ने अपने शासन-काल में सौजन्य दिखलाकर उसको मुक्तकर उसकी जागीर पीछी उसे दे दी, जो उसकी उदार नीति का परिचय देती है। उसकी एक राणी लालकुंवरी ने वृन्दावन में राधावल्लभ का मन्दिर बनवाया था। उदयसिंह महारावत उदयसिंह का जन्म वि० सं० १९०५ आषाढ वदि १३ (ई० स० १८४८ ता० २६ जून) को हुआ था और वह वि० सं० १९२० चैत्र वदि ७ (ई० स० १८६४ ता० ३० मार्च) को जन्म, गद्दीनशीनी और अपने पिता के पीछे प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी पुत्र-जन्म हुआ। उस (उदयसिंह) का प्रथम विवाह भूतपूर्व महारावत दलपतसिंह की विद्यमानता में नामली (रतलाम राज्य) के ठाकुर तख़्तसिंह की पुत्री सरूपकुंवरी से हुआ था, जिसके उदर से कुछ समय बाद ही वि० सं० १९२२ ज्येष्ठ सुदि ५ (ई०स० १८६५ ता० २६ मई) सोमवार को उसके महाराजकुमार हम्मीरसिंह का जन्म हुआ, परंतु पांच वर्ष का होकर उक्त राजकुमार वि० सं० १९२६ (ई० स० १८६६) में काल-कवलित हो गया। राज्यारोहण के समय महारावत की आयु केवल सोलह वर्ष की थी, इसलिए मेवाड़ के पोलिटिकल एजेंट कर्नल ईडन ने राजपूताना के एजेंट गवर्नर जेनरल की स्वीकृति से भूतपूर्व महा- शासन-कार्य चलाने के संबंध में महारावत के नाम पोलिटि- कल एजेंट का खरीता जाना रावत दलपतसिंह की इच्छा के अनुसार शाह जोधकरण पाडलिया और पंडित आपा की सलाह से शासन-कार्य चलाने के लिए महारावत के नाम खरीता भेजा और उन दोनों को भी वि० सं० १९२१ आषाढ सुदि ४ (ई० स० १८६४ ता० ६ जुलाई) को पत्र भेज इसकी सूचना दी¹। (१) कर्नल ईडन का शाह जोधकरण और पंडित आपा के नाम का वि० सं० १९२१ आषाढ सुदि ४ (ई० स० १८६४ ता० ६ जुलाई) का पत्र। ३८
२६८ -प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास इसके थोड़े समय बाद ही वि० सं० १६२२ पौष वदि १४ (ई० स० १८६५ ता० १७ दिसंबर) को राजपूताना के एजेंट गवर्नर जेनरल कर्नल एजेंट गवर्नर-जेनरल का गद्दी- ईडन ने मेवाड़ के पोलिटिकल एजेंट कर्नल निक्सन नशीनी की ख़िलअत लेकर के साथ प्रतापगढ़ जाकर अंग्रेज़ सरकार की ओर जाना से महारावत को गद्दीनशीनी की खिलअत दी और उसी अवसर पर सरकारी तौर से राज्या- धिकार सौंपने की रस्म भी अदा की गई१ । महारावत ने राज्यासीन होते ही शासन-कार्य लगन के साथ करना आरंभ किया। सर्वप्रथम उसने भील, मीणों आदि का दमन करने का निश्चय किया, जो लूट-खसोट कर जनता को कष्ट भील और मीणों को दंड पहुंचाते थे२ । महारावत जहां कहीं अपने राज्य में देना लूट-खसोट का समाचार सुनता, तत्काल घोड़े पर सवार होकर अपने राजपूत सवारों से पहले वहां जा पहुंचता३ और उनसे मुक़ाबला कर उनको ऐसा दंड देता कि वे फिर कभी ऐसा कार्य करने का साहस न करते। उसकी इस तत्परता को देख प्रतापगढ़ राज्य के भील, मीणे आदि उसके नाम से कांपने लगे और अधिकांश ने लूट-खसोट करना बन्द कर दिया, जिससे राज्य में चारों तरफ़ शांति स्थापित हो गई और राज्य की आबादी तथा आय बढ़ने लगी। व्यापार एवं गमनागमन की कठिनाइयों को मिटाने के लिए अंग्रेज़ सरकार ने मालवा की ओर रेल्वे लाइन निकालने का विचार किया और उस समय प्रतापगढ़ राज्य की कोई भूमि यदि रेल्वे निकालने के संबंध में रेल्वे के लिए आवश्यक हो तो देने के लिए महा- अंग्रेज़ सरकार की महारावत रावत से प्रस्ताव किया। इसपर वि० सं० १६२२ से बातचीत (ई० स० १८६५) में महारावत ने कुछ शर्तों के (१) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० २५६ । (२) वही; जि० १, पृ० ५६० । (३) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६६-७ ।
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